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इस साल पेश हुआ था भारत का पहला काला बजट, जानें क्यों पड़ा था ये नाम

भारत का पहला काला बजट वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने पेश किया था, तब इंदिरा गांधी की सरकार थी. इस बजट में सरकार को करीब 550 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था. जानिए इस बजट का नाम काला बजट क्यों पड़ा और इसके क्या कारण थे.

इस साल पेश हुआ था भारत का पहला काला बजट, जानें क्यों पड़ा था ये नाम
काला बजट कब हुआ था पेश

India First Black Budget: 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण देश का बजट पेश करने वाली हैं. इस बजट से हर किसी को उम्मीद हैं. टैक्स में राहत मिलेगी या महंगाई बढ़ेगी, सैलरीड और किसानों को क्या मिलेगा. ऐसे कई सवालों पर देशभर की निगाहें टिकी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के इतिहास में एक ऐसा बजट भी पेश हुआ था, जिसे आज तक 'काला बजट' के नाम से जाना जाता है. आइए जानते हैं यह पहली बार कब पेश हुआ था और इसका नाम 'काला बजट' क्यों पड़ा.

भारत का पहला काला बजट किस साल पेश हुआ था

देश का पहला काला बजट साल 1973-74 में पेश किया गया था. उस वक्त इंदिरा गांधी की सरकार थी और वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण थे. यह बजट इसलिए खास माना जाता है, क्योंकि इसमें सरकार ने खुले तौर पर घाटे को स्वीकार किया था. आमतौर पर सरकारें संतुलित बजट पेश करने की कोशिश करती हैं, लेकिन उस दौर के हालात इतने मुश्किल थे कि घाटे के बिना काम चलाना नामुमकिन हो गया था.

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'काला बजट' नाम क्यों पड़ा

इस बजट को 'ब्लैक बजट' या 'काला बजट' इसलिए कहा गया, क्योंकि इसमें सरकार के खर्च और आमदनी के बीच बड़ा अंतर साफ नजर आ रहा था. सरकारी खजाने में जितना पैसा आ रहा था, उससे कहीं ज्यादा खर्च करने की मजबूरी थी. तत्कालीन वित्त मंत्री ने खुद संसद में माना था कि देश की आर्थिक हालत बेहद नाजुक हो चुकी है और सख्त फैसले लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बजट में सरकार को करीब 550 करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ा था. आज के हिसाब से यह रकम भले ही कम लगे, लेकिन उस दौर में यह बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी. इसी घाटे की वजह से यह बजट इतिहास में काले बजट के नाम से दर्ज हो गया.

काले बजट के पीछे क्या कारण थे

1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ, जिससे देश पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा. युद्ध के बाद शरणार्थियों की जिम्मेदारी, रक्षा खर्च और पुनर्निर्माण ने सरकार की कमर तोड़ दी. इसके बाद 1973 में मानसून फेल हो गया, जिससे देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ा. खेती पर निर्भर भारत के लिए यह दोहरी मार थी. यशवंतराव चव्हाण ने इस बजट के जरिए साफ कर दिया कि सरकार को खर्चों में कटौती करनी होगी. कई सरकारी योजनाओं पर ब्रेक लगाया गया, कुछ योजनाओं का दायरा छोटा किया गया और गैर-जरूरी खर्चों पर लगाम कसने की कोशिश की गई. मकसद सरकारी खजाने को पूरी तरह खाली होने से बचाना था.

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