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भूकंप के मलबे के नीचे कितने दिन तक जिंदा रह सकता है इंसान?

दुनिया में 10, 17, 27 दिन और कुछ मामलों में इससे भी अधिक समय बाद लोगों को जिंदा बचाने के उदाहरण मौजूद हैं. जानिए कौन से 5 बड़े फैक्टर तय करते हैं जिंदगी और मौत का फैसला.

भूकंप के मलबे के नीचे कितने दिन तक जिंदा रह सकता है इंसान?
वेनेजुएला में आए दोहरे भूकंप की तस्वीर
AFP
  • भूकंप के बाद मलबे में दबे व्यक्ति के जीवित रहने की अवधि तय नहीं होती.
  • हवा, पानी, चोट की गंभीरता, मौसम और मानसिक मजबूती जैसे 5 बड़े कारक जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
  • दुनिया में 10, 17, 27 दिन और कुछ मामलों में इससे भी अधिक समय बाद लोगों को जिंदा बचाने के उदाहरण मौजूद हैं.

वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के छह दिन बाद जॉर्डन की सिविल डिफेंस टीम ने मलबे से 3 साल के बच्चे को जिंदा निकाला. चार दिन बाद एक पिता और उनके बेटे को करीब 96 घंटे तक मलबे में दबे रहने के बावजूद जिंदा बाहर निकाला गया. इससे पहले एक मां और उसके 9 महीने के बच्चे, एक नवजात और 14 दिन के शिशु को भी सुरक्षित बचाया गया. वहीं 21 वर्षीय आरोन को 106 घंटे बाद जिंदा निकाला गया. वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप को छह दिन बीत चुके हैं और मरने वालों की संख्या करीब 2,000 तक पहुंच गई है. हजारों लोग अब भी लापता हैं और अंतरराष्ट्रीय बचाव दल लगातार मलबे में जीवित लोगों की तलाश कर रहे हैं.

ऐसे में इस तरह के रेस्क्यू ऑपरेशन से पूरी दुनिया न केवल हैरान है बल्कि यह भी जानना चाहती है कि आखिर मलबे के नीचे दबा कोई इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है?

जानकारों का कहना है कि इसका कोई तय जवाब नहीं है. यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस हालत में फंसा है, उसे सांस लेने के लिए हवा मिल रही है या नहीं, पानी उपलब्ध है या नहीं, चोट कितनी गंभीर है, उसे कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है या नहीं, जहां वह फंसा/फंसी है वहां तापमान कितना है और सबसे अहम, मलबे के नीचे वह मानसिक और शारीरिक रूप से कितना मजबूत बना रहता है.

Rescue teams sift through the rubble of collapsed buildings in Venezuela, as officials confirmed 189 total structural collapses

Photo Credit: AFP

पहले 24 घंटे सबसे अहम

आपदा विशेषज्ञों के अनुसार, भूकंप के बाद सबसे अधिक लोगों को पहले 24 घंटों के भीतर बचाया जाता है. इसी दौरान जीवित मिलने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है. हालांकि कई बार इसके कई दिन बाद भी लोग जिंदा मिलते हैं, इसलिए बचाव अभियान उम्मीद के साथ जारी रखा जाता है.

संयुक्त राष्ट्र आमतौर पर किसी बड़ी आपदा के पांच से सात दिन बाद खोज और बचाव अभियान समाप्त करने पर विचार करता है. लेकिन यदि बीच-बीच में कोई जीवित व्यक्ति मिलता रहता है, तो अभियान को आगे भी बढ़ाया जा सकता है.

कौन से कारक बढ़ाते हैं जीवित बचने की संभावना? एक्सपर्ट्स ऐसे पांच बड़े कारक बताते हैं जिनकी वजह से मलबे में दबे शख्स के जीवित बचने की संभावना बनी रहती है. चलिए एक-एक कर बताते हैं कि वो कौन से 5 बड़े फैक्टर हैं, जो करते हैं जिंदगी और मौत का फैसला..

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Photo Credit: AFP

1. हवा का पॉकेट सबसे बड़ी उम्मीद

यदि मलबे के नीचे व्यक्ति के आसपास ऐसी जगह बन जाए जहां उसे सांस लेने के लिए पर्याप्त हवा मिलती रहे, तो उसके जीवित रहने की संभावना काफी बढ़ जाती है. तुर्की के खोज एवं बचाव संगठन AKUT के समन्वयक मूरत हारुन ओंगोरेन के मुताबिक, भूकंप के दौरान 'झुकें, छिपें और पकड़कर रहें' यानी ड्रॉप, कवर और होल्ड ऑन की मुद्रा अपनाने से कई बार शरीर के आसपास एक सुरक्षित जगह और हवा का पॉकेट बन जाता है, जो जान बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

2. पानी जीवन की सबसे बड़ी जरूरत

यदि गंभीर चोट नहीं लगी है और व्यक्ति को सांस लेने के लिए हवा मिल रही है, तो उसके बाद सबसे महत्वपूर्ण चीज पानी है. अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय के गहन चिकित्सा विशेषज्ञ प्रोफेसर रिचर्ड एडवर्ड मून बताते हैं कि एक वयस्क व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 1.2 लीटर पानी शरीर से खो देता है. इसमें पेशाब, सांस, पसीना और शरीर से निकलने वाली जलवाष्प शामिल होती है.

जब शरीर से लगभग 8 लीटर या उससे अधिक पानी निकल जाता है, तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में इंसान तीन से सात दिन तक बिना पानी के जीवित रह सकता है, लेकिन यह व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और वातावरण पर निर्भर करता है.

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3. चोट कितनी गंभीर है, यही सबसे बड़ा फर्क पैदा करती है

यदि किसी व्यक्ति के सिर, रीढ़ या छाती में गंभीर चोट लगी हो, या अधिक खून बह गया हो, तो उसके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना काफी कम हो जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के तकनीकी अधिकारी डॉ. जेट्री रेगमी के मुताबिक गंभीर फ्रैक्चर, आंतरिक रक्तस्राव (इनटर्नल ब्लिडिंग) और अंगों की गंभीर चोटें जानलेवा साबित हो सकती हैं.

वे यह भी बताते हैं कि कई बार मलबे से जिंदा निकलने के बाद भी मरीज की मौत हो सकती है. इसकी वजह क्रश सिंड्रोम होता है. लंबे समय तक दबाव में रहने से मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और जहरीले पदार्थ बनते हैं. मलबा हटने के बाद यही पदार्थ पूरे शरीर में फैलकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसलिए रेस्क्यू के बाद तुरंत इलाज भी उतना ही जरूरी होता है.

4. मौसम भी तय करता है जिंदगी और मौत

विशेषज्ञों के मुताबिक मौसम का असर भी बहुत बड़ा होता है. यदि तापमान बहुत कम हो, तो शरीर तेजी से ठंडा होने लगता है और हाइपोथर्मिया का खतरा बढ़ जाता है. यही वजह थी कि 2023 में तुर्की के भूकंप में ठंड ने हालात और कठिन बना दिए थे. दूसरी ओर, यदि मौसम बेहद गर्म हो, तो शरीर तेजी से पानी खोता है. इससे डिहाइड्रेशन बढ़ता है और जीवित रहने की संभावना घट सकती है.

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5. मानसिक मजबूती भी बचा सकती है जान

बचाव विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक शक्ति को अक्सर कम आंका जाता है, जबकि यह भी जीवन बचाने में अहम भूमिका निभाती है. यदि व्यक्ति घबराने के बजाय खुद को शांत रखता है, कम हरकत करता है और अपनी ऊर्जा बचाता है, तो उसके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है.

एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि मलबे में फंसने पर लगातार चीखने या अनावश्यक हरकत करने के बजाय जरूरत पड़ने पर ही आवाज दें और अपनी सांस तथा ऊर्जा को बचाकर रखें.

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दुनिया की कुछ हैरान कर देने वाली रेस्क्यू कहानियां

वेनेजुएला में आए 2026 में दोहरे भूकंप में तो छह दिन बाद भी लोगों को मलबे से जीवित निकाला जा रहा है.

तुर्की (2023): विनाशकारी भूकंप के कई दिन बाद अब्दुलअलीम मुआइनी को मलबे से सुरक्षित निकाला गया.

दक्षिण कोरिया (1995): एक व्यक्ति 10 दिन तक मलबे में फंसा रहा. उसने बारिश का पानी पीकर और गत्ते का डिब्बा खाकर खुद को जिंदा रखा.

बांग्लादेश (2013): फैक्ट्री भवन गिरने के 17 दिन बाद एक महिला को जीवित बचाया गया. उसने सूखा भोजन और पानी के सहारे खुद को जिंदा रखा.

हैती (2010): एक व्यक्ति 12 दिन बाद और दूसरा 27 दिन बाद मलबे से जीवित निकाला गया.

पीओके (2005): नक्शा बीबी नाम की महिला को भूकंप के लगभग दो महीने बाद मलबे से जिंदा निकाला गया. हालांकि वह बेहद कमजोर और गंभीर हालत में थीं.

जानकारों का कहना है कि मलबे के नीचे कोई व्यक्ति कितने समय तक जीवित रहेगा, इसका कोई निश्चित समय तय नहीं किया जा सकता. लेकिन यदि उसे सांस लेने के लिए हवा मिल रही हो, गंभीर चोट न लगी हो, पानी उपलब्ध हो, मौसम अनुकूल हो और वह मानसिक रूप से मजबूत बना रहे, तो कई दिनों बाद भी उसके जीवित मिलने की उम्मीद बनी रहती है. यही कारण है कि बड़े भूकंपों के बाद बचाव दल आखिरी उम्मीद तक मलबे में जिंदगी तलाशते रहते हैं.

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