MP MLA Removal Process: आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने संसद में एक ऐसा मुद्दा उठाया है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है. उन्होंने संसद में कहा कि जनता को जैसे नेता को हायर करने की पावर मिलती है, ठीक इसी तरह उन्हें फायर करने यानी पद से हटाने की ताकत भी होनी चाहिए. इसके लिए युवा सांसद ने 'राइट टू रिकॉल' बिल लाने की मांग कर दी. फिलहाल इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है और राघव चड्ढा की इस मांग को लोगों का समर्थन भी मिल रहा है. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि किसी भी सांसद या फिर विधायक को हटाने की मौजूदा व्यवस्था क्या है. साथ ही ये भी जानेंगे कि आखिर राइट टू रिकॉल क्या होता है.
राघव चड्ढा ने क्या कहा?
राघव चड्ढा ने संसद में बोलते हुए कहा, मौजूदा व्यवस्था में एक बड़ी खामी है. चुनाव से पहले नेता जनता के पीछे होता है और चुनाव के बाद जनता नेता के पीछे... देश में राष्ट्रपति के महाभियोग, उपराष्ट्रपति और जजों को हटाने और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जैसी व्यवस्थाएं हैं, तो फिर जनता को गैर-प्रदर्शन करने वाले सांसदों और विधायकों को हटाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? वोटर्स को अपनी गलती सुधारने का अधिकार मिलना चाहिए. इसके लिए राइट टू रिकॉल जरूरी है. ये नेताओं के खिलाफ हथियार नहीं, बल्कि 'लोकतंत्र का बीमा' है.
क्या है राइट टू रिकॉल?
राइट टू रिकॉल एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार उन्हें वोट करने वाली जनता को होता है. कनाडा और स्विट्जरलैंड जैसे दुनिया के कुछ देशों में ऐसा सिस्टम बनाया गया है. इसमें पहले लोग नेता के खिलाफ एक अभियान चलाकर प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हैं और फिर वोटिंग कराई जाती है. 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट पड़ने पर नेता को हटा दिया जाता है.
क्या है विधायक और सांसद को हटाने का नियम?
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने 20 अगस्त को लोकसभा में तीन बिल पेश किए थे. इनमें मंत्री बने विधायक और सांसद के अलावा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को भी पद से हटाने का प्रावधान था. संसद में पेश हुए 130 संविधान संशोधन बिल में कहा गया था कि किसी मंत्री या फिर प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री पर कोई गंभीर आपराधिक मामला दर्ज होता है और उनकी गिरफ्तारी होती है तो उन्हें कुर्सी से हटा दिया जाएगा. इसमें कुछ शर्तें रखी गईं थीं, जिनमें-
- आपराधिक मामले, जिनमें पांच साल या फिर इससे ज्यादा की सजा होगी, उन्हीं में ये नियम लागू रहेगा.
- किसी विधायक या सांसद को अगर 30 दिन तक जमानत नहीं मिलती है तो उन्हें हर हाल में अपना पद छोड़ना होगा.
- इस्तीफा नहीं देने की स्थिति में 31वें दिन मंत्री या फिर प्रधानमंत्री को पद से खुद ही हटा दिया जाएगा.
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951
इसके अलावा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत भी इसे लेकर नियम बनाए गए हैं. इसकी धारा (1) और (2) में दिए गए प्रावधानों में बताया गया है कि अगर कोई विधायक या सांसद संविधान का अपमान करता है, हत्या जैसे गंभीर मामलों में दोषी पाया जाता है या फिर सामाज में शत्रुता पैदा करता है तो उसकी सदस्यता को रद्द किया जा सकता है. साथ ही धारा(3) में बताया गया है कि दोषी पाए जाने वाले सांसद या विधायक को अगर दो साल से ज्यादा की सजा होती है तो सदस्यता रद्द होने के साथ-साथ 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगाया जाएगा.
जनता को नहीं है अधिकार
फिलहाल भारत में जनता को अपने चुने हुए विधायक या सांसद को हटाने का अधिकार नहीं है. गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाने के बाद विधानसभा या लोकसभा स्पीकर इन नेताओं की सदस्यता खत्म करते हैं. वादों पर खरा नहीं उतरने वाले और भ्रष्ट नेताओं को पांच साल से पहले जनता नहीं हटा सकती है. यानी चुनाव आने तक जनता को इंतजार करना पड़ता है. यही वजह है कि राघव चड्ढा ने संसद में राइट टू रिकॉल की मांग उठाई है.
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