क्या आपने सोचा है कि आज जिस बॉलपॉइंट पेन की मदद से हम कागज पर लिखते हैं, कभी वो अमीरों के लिए लग्जरी हुआ करता था. लेकिन इस छोटे से बॉल पेन ने 1955 से आज 2025 तक दुनिया की साक्षरता दर 35% से बढ़ाकर 90% तक पहुंचा दी है. नॉलेज में आज की कहानी है बॉल पॉइंट पेन की. जिसने न सिर्फ पूरी दुनिया के लोगों के लिखने का तरीका बदला दिया, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की दिशा भी बदल डाली. कहानी शुरू होती है 1988 से. अमेरिकी आविष्कारक जॉन लाउड के मन में विचार आया कि अगर स्याही की ट्यूब के आगे एक बॉल लगा दी जाए और उसे कागज पर घुमाया जाए तो तेजी से लिखने की समस्या हल हो सकती है. उन्होंने एक घूमने वाली स्टील की बॉल को आगे लगा दिया. लेकिन जब पेन कागज पर चलता तो दो बड़ी समस्याएं सामने आने लगीं.

जॉन लाउड, जिन्हें इस बॉलपॉइंट पेन का आइडिया आया.
सबसे पहली समस्या- स्याही का लीक होना. आविष्कारक जॉन लाउड ने जो स्टील की बॉल लगाई वो बहुत ज्यादा गोल नहीं थी. ऐसे में जब बॉल कागज पर घूमती थी तो बहुत सारी स्याही उड़ेल देती थी. दूसरी समस्या- अगर स्याही ज्यादा गाढ़ी होती तो बॉल घूमती ही नहीं थी और अगर ज्यादा पतली होती तो पेन बंद होने के बाद भी स्याही रिसती रहती थी. इससे पूरा कागज और मेहनत खराब जाती. इसी वजह से ये बॉल पेन का आइडिया मार्केट में पॉपुलर नहीं हो पाया.
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पत्रकार ने बनाया सबसे आधुनिक बॉल पेन
साल 1931. बॉल पेन के आइडिया को आए 50 साल बीत चुके थे. हंगरी में अखबार के पत्रकार लास्लो बीरो अपने केमिस्ट भाई के साथ मिलकर बॉल पेन की क्वालिटी सुधारने पर काम कर रहे थे. दोनों भाइयों ने स्याही का सटीक फॉर्मूला और बॉल की गोलाई की तकनीक विकसित कर ली और सबसे उन्नत बॉल प्वाइंट पेन बना डाला. 1938 में उन्होंने हंगरी में इसका पेंटेंट भी हासिल किया. लास्लो ने इस पेन को दुनिया को दिखाने के लिए बुडापेस्ट विश्व मेले में प्रदर्शित किया. इससे प्रभावित होकर अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने अपने देश में आने का न्योता दिया. लास्लो ने अर्जेंटीना में पेन बनाने के लिए वहां कंपनी स्थापित की और 1943 में नया पेंटेंट हासिल किया. द्वितीय विश्व युद्ध जारी था. जर्मन तानाशाह हिटलर, यहूदियों का कत्लेआम कर रहा था. तभी बीरो का ये आविष्कार एक नए हथियार के रूप में उभर रहा था.

वर्ल्ड वॉर में बॉल पेन बना हथियार
अब आपको ये बात सुनने में हैरानी होगी कि इस बॉल पेन का इस्तेमाल आम लोग नहीं, बल्कि वर्ल्ड वॉर में एयरफोर्स कर रही थी. दरअसल, पायलट के फाउंटेन पेन ज्यादा ऊंचाई पर हवा में कम दबाव के कारण लीक हो जाते थे. इससे जरूरी दस्तावेज और नक्शे खराब हो जाते थे. ऐसे में पायलटों ने बॉलपॉइंट पेन का इस्तेमाल शुरू कर दिया. ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स (RAF) ने इस आविष्कार की अहमियत समझी, इसका पेटेंट खरीदा और इसे अपने पायलटों के लिए बनाना शुरू कर दिया.
जंग खत्म, पेन बन गया लग्जरी आइटम
वर्ल्ड वॉर में जर्मन नाजी सेना की हार हुई. यूरोप ने राहत की सांस ली. एयरफोर्स के हाथों से गुजरते हुए ये बॉलपॉइंट पेन अब मार्केट में पहुंच गया था. लेकिन 1945 के करीब एक पेन की कीमत एक मजदूर की आधे महीने की सैलरी के बराबर थी. कहने का मतलब ये कि कि आज के समय से हिसाब लगाएं तो एक पेन उस समय तकरीबन $190 (लगभग 18,000 रुपये) का था. आम आदमी इसे खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता था.

इसके बाद एंट्री होती है फ्रेंच निर्माता मार्सेल बिच की. उन्हें बॉलपॉइंट पेन में संभावना दिखी और $2 मिलियन पेटेंट इसका खरीद लिया. उन्होंने पेन के डिजाइन को सरल बनाया, फालतू की सजावट हटाई और असेंबली लाइन पर बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू कर दिया. कीमत सीधे $2 पर आ गई. यही पेन आगे चलकर मशहूर 'बिच पेन' बना. बाकी सब इतिहास है. 2005 में मार्सेल बिच की कंपनी 100 अरब पेन बेच चुकी थी. अब सोचिए कि एक स्टील की छोटी सी बॉल ने पूरी दुनिया के लिए लिखने का खेल बदल दिया. कभी एक सैन्य हथियार, अमीरों के स्टेटस सिंबल और फिर हर आम आदमी के हाथ तक पहुंचने की ये कहानी अगर आपको अच्छी लगी तो इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें.

(सोर्स: britannica.com, edubilla.com, historyofinformation.com )
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