आज जब आम बजट पेश होता है तो लोग मोबाइल पर हिंदी में बजट की बड़ी बातें आसानी से पढ़ लेते हैं. टैक्स क्या बदला, कौन सी योजना आई और किसे फायदा मिलेगा, ये सब जानकारी तुरंत समझ में आ जाती है. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. एक समय भारत का बजट आम लोगों के लिए काफी मुश्किल चीज हुआ करता था. वजह थी इसकी भाषा. आजादी से पहले और आजादी के कई साल बाद तक बजट सिर्फ अंग्रेजी में छपता और पढ़ा जाता था. गांव देहात और छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के लिए बजट समझना आसान नहीं था. धीरे-धीरे सरकार को लगा कि अगर देश की जनता को बजट से जोड़ना है तो भाषा बदलनी होगी. यहीं से भारत के बजट की भाषा बदलने की कहानी शुरू होती है.
अंग्रेजी में पेश हुआ पहला बजट
भारत का पहला बजट साल 1860 में पेश किया गया था. ये बजट ब्रिटिश सरकार के समय में जेम्स विल्सन ने पेश किया था. उस दौर में सरकार और प्रशासन की भाषा अंग्रेजी थी. इसलिए बजट भी पूरी तरह अंग्रेजी में ही छपता था. उस समय बजट का मकसद जनता को जानकारी देना नहीं बल्कि सरकार के खर्च और टैक्स का हिसाब रखना था. आम लोगों की सुविधा पर तब ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था.
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आजादी के बाद भी जारी रही अंग्रेजी
1947 में देश आजाद हो गया लेकिन बजट की भाषा तुरंत नहीं बदली. आजाद भारत का पहला बजट भी अंग्रेजी में ही पेश किया गया. उस समय देश का प्रशासनिक ढांचा पहले से अंग्रेजी में काम कर रहा था. इसलिए बदलाव धीरे धीरे हुआ. हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद भी बजट जैसे अहम दस्तावेज अंग्रेजी में ही रहते थे.
हिंदी में बजट की शुरुआत
1950 के दशक में हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज हुईं. साल 1955 के बाद बजट से जुड़े कुछ कागज हिंदी में भी आने लगे. फिर 1960 के दशक में बजट के पूरे दस्तावेज हिंदी में जारी होने लगे. इससे आम लोगों को टैक्स, खर्च और सरकारी योजनाओं की जानकारी समझ में आने लगी. हिंदी बजट ने लोगों और सरकार के बीच दूरी कम की.
आज का बजट और जनता
आज भारत का बजट हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध होता है. टीवी, वेबसाइट और सोशल मीडिया के जरिए बजट की बातें आसान शब्दों में समझाई जाती हैं. इससे आम नागरिक खुद को बजट से जुड़ा महसूस करता है. ये दिखाता है कि भाषा बदलने से भरोसा और समझ दोनों बढ़ते हैं.
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