- अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ने कोयलांचल के फहीम खान जैसे स्थानीय गैंगस्टरों को एक नई पहचान दी
- लगभग 20 साल से जेल में बंद फहीम खान ने सुप्रीम कोर्ट में रिहाई की गुहार लगाई है
- झारखंड हाईकोर्ट ने फहीम खान की रिहाई पर विचार का आदेश दिया था, लेकिन राज्य सरकार ने इसे चुनौती दी है
झारखंड के कोयलांचल की स्थानीय गलियों में कभी फहीम खान का नाम सुनते ही लोग कांप उठते थे. आज वही शख्स कोर्ट, अस्पताल और मीडिया के सामने रिहाई की दलीलें दे रहा है. इस इलाके में 1983 से 2001 के बीच चले खूनी गैंगवार, परिवार पर हुए हमले और दर्जनों संगीन मुकदमों के बीच फहीम की जिंदगी ने न्याय और सज़ा की बहस को एक नई दिशा दे दी है, और उस बहस को नई बुलंदी फिल्मी मंच ने दी. इसी फहीम का एक वीडियो सामने आया है जिसने एक बार फिर कोयलांचल की इस फिल्मी कहानी की सच्चाई को सुर्खियों में ला दिया है.
फहीम से प्रभावित थी गैंग्स ऑफ वासेपुर
फहीम पर हत्या, रंगदारी और साजिश जैसे करीब 3 दर्ज़न से अधिक गंभीर मामले दर्ज हैं. परिवार पर हुए हमलों ने उसे बदले की ओर धकेला. 1998 में हिल कॉलोनी के मज़ार कैंपस में हुई नजीर हत्या अभी भी कोयलांचल की कहानी का सबसे चर्चित अध्याय है. वर्षों तक स्थानीय धरपकड़, टकराव और घात-प्रतिघात का पर्याय रहे फहीम की छवि को फिल्मी पर्दे ने एक अलग तरह का रूप दे दिया. अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ने उस क्षेत्र की कड़वी सच्चाइयों, जातीय झड़पों और बदले की रस्मों को जो दमदार सिनेमाई भाषा मिली, उसने फहीम जैसे असल चरित्रों को वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म पर ला दिया.
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वासेपुर के फहीम खान को अनुराग कश्यप की फिल्म ने एक अलग हस्ती बना दिया
Photo Credit: NDTV
फिल्म के आने के बाद कोयलांचल की कुख्यात नाटकीयता और स्थानीय दहशत बदलकर सार्वजनिक बातचीत का हिस्सा बन गई. पाठक-पक्ष, समीक्षक और अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों ने उस धरातल से निकली कहानियों पर ध्यान दिया; वास्तविक जीवन के फसाने बड़े पर्दे का लेंस बनकर नए अर्थ दे गए. परिणामस्वरूप, स्थानीय गैंगस्टर जैसे लोग अब सिर्फ अपराधी नहीं रहे—उनकी पहचान फिल्म-प्रसिद्धि के जरिये एक तरह के 'लोककथा' में तब्दील हो गई.
आज वही फहीम, जिनकी काली गाथा ने पर्दे पर फैज़ल का रूप पा लिया, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य फलक पर अपनी रिहाई की गुहार लगा रहे हैं. झारखंड हाईकोर्ट ने 1984 की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई पर विचार करने का निर्देश दिया था; राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और अगली सुनवाई जुलाई में है.

फहीम खान को हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी
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फहीम की अपील
फहीम की यह दलील देते हुए कहा है कि उसकी सजा अवधि समाप्त होने के बाद भी रिहाई रोकी जा रही है. फहीम ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की है. हाल ही में रांची के रिम्स हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजी वार्ड से उन्होंने भावुक अपील की और कहा, "क्या मैं जीवन भर अपराधी रहूँगा? मेरे बच्चे हैं, मुझे मौका दिया जाए." उन्होंने अपने किए को बदले की भावना से जोड़कर बताया और दया की गुहार लगाई.
फहीम के बेटे इक़बाल खान ने कहा कि उनके पिता को रिहा किया जाना चाहिए. इक़बाल खान ने कहा, "मेरे पिता 20 साल से अधिक जेल में हैं, अब उनकी उम्र और ख़राब सेहत उन्हें अपराध में लौटने की अनुमति नहीं देती, इसलिए सरकार और अदालत से बस एक ही निवेदन है उन्हें माफी देकर रिहा किया जाए."

फहीम खान के बेटे इक़बाल खान ने भी पिता की रिहाई की अपील की है
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फहीम खान के खिलाफ मामले
फहीम खान पर 1989 में सागिर नामक व्यक्ति की हत्या के बाद फहीम पर मुकदमा चला और हाईकोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इस मामले में निचली अदालत ने पहले फहीम को बरी किया था, पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को खारिज कर आजीवन सजा कायम की.
फहीम के खिलाफ अब करीब 90% मामले खत्म हो चुके हैं. कुछ मामलों में सजाएँ दी गईं जो पूरी हो चुकी हैं. एक मामले में ट्रायल अभी चल रहा है और एक अन्य मामले में चार्जशीट अब तक दाखिल नहीं हुई है.
क्या कहते हैं कानूनी जानकार
कानूनी विशेषज्ञ इस मामले को सिर्फ किसी एक व्यक्ति की रिहाई का प्रश्न नहीं मानते; उनके मुताबिक यह न्याय, सार्वजनिक सुरक्षा और मीडिया-निर्मित मिथकों के बीच टकराव है.
फहीम के वकील मो. शाहबाज और धनबाद की सिविल कोर्ट के सीनियर अधिवक्ता शुभाशीष चटर्जी ने बताया कि हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान फहीम की कड़ी उम्र (75 वर्ष) और बिगड़ती सेहत को तौलते हुए राहत देने का आदेश दिया था. लेकिन पिछले साल राज्य सरकार ने रिट याचिका दायर कर रिहाई से इनकार कर दिया था जबकि कोर्ट ने कस्टडी के 20 वर्ष पूरे होने और मेडिकल स्थितियों को देखते हुए स्थिति को गंभीरता से लिया.

क्रिमिनल मामलों के वकील मोहम्मद जावेद
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वही झारखंड के क्रिमिनल लॉयर विशेषज्ञ एडवोकेट मोहम्मद जावेद ने सरकार से अनुरोध किया है कि वे आरोपी की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति और उम्र को ध्यान में रखते हुए नरमी बरतें.
वकील मो. जावेद ने कहा,"अभियुक्त अपनी उम्र की उस संवेदनशील दहलीज़ पर पहुँच चुका है जहाँ अनेक गंभीर बिमारियाँ और गुर्दे की क्रियाशीलता में गिरावट जैसी हालतें मौजूद हैं, और उन्हें लंबी अवधि के उपचार की आवश्यकता है. अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए दोषों का निवारण और सजा-प्रक्रिया अलग विषय हैं, परंतु अदालतों द्वारा जारी आदेशों और चिकित्सीय परिस्थितियों के मद्देनजर सरकार को मानवीय एवं संवैधानिक टूट-फूट का ध्यान रखना चाहिए."
जहां फिल्म ने एक वास्तविक कहानी को ग्लैमर और पब्लिसिटी दी, वहीं सच्ची ज़िंदगी के हक़ीक़त और पीड़ितों की यादें अनछुई रह गयीं. जुलाई में तय होने वाली सुनवाई तय करेगी कि क्या पर्दे पर मिली पहचान फहीम के लिए मुक्ति का रास्ता खोलेगी या वास्तविक अदालत और समाज उसकी पुरानी सूरत को बरकरार रखेंगे.
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