- नितिन कामत और निखिल कामत यानी 'जीरोधा' के फाउंडर. रात-रात भर कॉल सेंटर में गला सुखाते थे.
- जेरोधा ने 2015 में जीरो ब्रोकरेज पर ट्रेडिंग की घोषणा करके बाजार में तहलका मचा दिया
- आज जेरोधा का यूजर बेस एक करोड़ से अधिक है और कंपनी बिना बाहरी निवेश के करोड़ों रुपए का मुनाफा कमा रही है
यह कहानी है दो ऐसे भाइयों की, जिन्होंने बंद कमरों और कॉल सेंटर की रात वाली शिफ्ट से निकलकर देश के बिजनेस जगत में तहलका मचा दिया. नितिन कामत और निखिल कामत यानी 'जेरोधा' के फाउंडर. एक ऐसा परिवार, जहां नौकरी के अलावा कुछ और सोचना भी पाप माना जाता था. वहां से निकले दो लड़के, जो कभी सिर्फ आठ हजार रुपये के लिए रात-रात भर कॉल सेंटर में गला सुखाते थे, आज 30 हजार करोड़ की सल्तनत के मालिक हैं. कोई जादू नहीं, बल्कि पक्के इरादे और जी तोड़ मेहनत का नतीजा है. आज नितिन कामत की नेटवर्थ $4.7 बिलियन और छोटे भाई निखिल कामत की नेटवर्थ $3.1 बिलियन है. फाइनेंशियल ईयर 2026 में कंपनी का प्रॉफिट 4,300 करोड़ रुपए है.
जब पढ़ाई से ज्यादा धंधा भाया
कहानी शुरू होती है कर्नाटक के एक साधारण से मध्यमवर्गीय परिवार से. पिता बैंक में थे, तो तबादले होते रहे. साल 1986 में यह परिवार बेंगलुरु में बस गया. बड़े भाई नितिन का मन किताबों से ज्यादा मारवाड़ी दोस्तों की बैठकों में लगता था, जहां सिर्फ और सिर्फ 'धंधे' की बातें होती थीं. नितिन को लगने लगा कि पढ़-लिखकर तो सिर्फ दूसरों की गुलामी ही की जा सकती है; अगर खुद मालिक बनना है, तो लीक से हटकर चलना होगा.
महज 17 साल की उम्र में मां के नाम पर ट्रेडिंग अकाउंट खोला और शेयर बाजार के समंदर में गोता लगा दिया. शुरुआत में जेब गर्म हुई, तो नशा और बढ़ गया. लेकिन शेयर बाजार का यह समंदर जितना दिखता है, उतना शांत नहीं होता. साल 2001 के मार्केट क्रैश में नितिन के तीन लाख रुपये डूब गए. सब कुछ साफ. कर्ज का बोझ बढ़ा, पर हौसला नहीं डगमगाया. वे बाजार की रग-रग को समझने में जुटे रहे.
रात को नौकरी, दिन में ट्रेडिंग
जेब खाली थी, तो कॉल सेंटर की नाइट शिफ्ट पकड़ ली ताकि दिन में ट्रेडिंग कर सकें. उधर छोटे भाई निखिल तो दो कदम आगे निकले. उन्होंने 10वीं में ही पढ़ाई को 'बाय-बाय' कह दिया और कॉल सेंटर में काम करने लगे. लेकिन छोटे भाई के दिमाग का लोहा पिता भी मानते थे, तभी तो अपनी जीवनभर की पूंजी उन्हें सौंप दी. निखिल ने उस पूंजी को ऐसे चमकाया कि सिर्फ 18 साल की उम्र में वे दूसरों का पोर्टफोलियो संभालने लगे.
₹25 लाख का वो एक चेक और जिद
साल 2004 में दोनों भाई साथ आए और नौकरी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. उनकी किस्मत तब बदली, जब एक अमीर अमेरिकी उनके काम से इतना इम्प्रेस हुआ कि सीधे 25 लाख रुपये का चेक उनके हाथ में थमा दिया. यहीं से नींव पड़ी 'कामत एसोसिएट्स' की.
पर राह इतनी आसान कहां थी? साल 2010 आया. जब देश के तमाम स्टार्टअप्स बड़े-बड़े निवेशकों से करोड़ों बटोरकर विज्ञापनों में फूंक रहे थे, तब इन दोनों भाइयों के पास न तो कोई बड़ा इन्वेस्टर था और न ही कोई विज्ञापन का बजट. उन्होंने अपनी खुद की जमा-पूंजी लगाई और 15 अगस्त 2010 को जन्म दिया 'जेरोधा' का, जिसका सीधा सा मतलब है 'बिना किसी बाधा के'.
वो एक मास्टरस्ट्रोक, जिसने बदल दी बाजी
शुरुआती साल संघर्षों से भरे थे. न कोई आलीशान दफ्तर, न भारी-भरकम स्टाफ. लेकिन कामत भाइयों का मूल मंत्र साफ था, जमीन से जुड़े रहो और फालतू का दिखावा मत करो. साल 2015 में दोनों भाइयों ने एक ऐसा पत्ता फेंका जिसने पूरे शेयर बाजार को हिलाकर रख दिया. उन्होंने ऐलान किया 'जीरो ब्रोकरेज'. यानी डिलीवरी ट्रेडिंग पर कोई कमीशन नहीं.
देखते ही देखते ग्राहकों की ऐसी सुनामी आई कि बड़े-बड़े दिग्गज पानी मांगने लगे. साल 2015 में जिन ग्राहकों की संख्या सिर्फ 30 हजार थी, वह 2020 तक आते-आते 14 लाख पार कर गई.
और फिर जब कोविड के दौर में पूरी दुनिया घरों में कैद थी, तब लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल ने जेरोधा को आसमान पर पहुंचा दिया. आज इनका यूजर बेस एक करोड़ से भी ज्यादा है.
बिना किसी बाहरी पैसे के, बिना किसी शोर-शराबे वाले विज्ञापन के, आज यह कंपनी हर साल 2000 से 4000 करोड़ से ज्यादा का शुद्ध मुनाफा कमा रही है. यह कहानी गवाह है दोस्तों, कि अगर आपके इरादों में दम हो और आप अपनी मिट्टी से जुड़े रहें, तो कामयाबी आपके कदम चूमने पर मजबूर हो जाती है.
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