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कैसी होती है 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी', जिसकी दिल्ली LG कर रहे पैरवी... एक साल में ऐसी 100 कॉलोनियां और बनेंगी

दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने MCD को 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी' को बढ़ावा देने का निर्देश दिया है. इसके लिए उन्होंने CSR फंडिंग पर भी जोर दिया है.

कैसी होती है 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी', जिसकी दिल्ली LG कर रहे पैरवी... एक साल में ऐसी 100 कॉलोनियां और बनेंगी
दिल्ली में अभी 650 से ज्यादा जीरो-वेस्ट कॉलोनी हैं.
नई दिल्ली:

जिस दिल्ली से हर रोज हजारों टन कचरा निकलकर लैंडफिल साइट्स तक पहुंच रहा है, उसी दिल्ली में कुछ कॉलोनियां ऐसी भी हैं, जहां से बिल्कुल भी कचरा नहीं निकलता. ऐसी कॉलोनियों में कचरे का निपटान वहीं पर हो जाता है. इन्हें 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी' कहा जाता है. 

इन्हीं कॉलोनी में से एक है- नवजीवन विहार, जहां मंगलवार को उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू पहुंचे. उन्होंने दिल्ली नगर निगम (MCD) से कहा है कि 'जीरो वेस्ट-कॉलोनी' मॉडल को पूरी दिल्ली में लागू किया जाए. इसके लिए उन्होंने MCD से कहा है कि वह कॉलोनियों में 'जीरो-वेस्ट' को बढ़ावा दे. इसके साथ ही उन्होंने कॉर्पोरेट घरानों से कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के जरिए ऐसी कॉलोनियों की मदद करे.

अगर पूरी दिल्ली में इस तरह की कॉलोनियां बन जाती हैं तो राजधानी में कचरे की समस्या का काफी हद तक समाधान निकल सकता है. यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसी दिल्ली में हर दिन 11,862 टन कचरा निकलता है, लेकिन इसमें से सिर्फ 63% ही प्रोसेस हो पाता है. बाकी का कचरा या तो लैंडफिल साइट्स में जा रहा है या फिर सड़कों पर पड़ा रहता है.

एलजी ने क्या आदेश दिए?

दिल्ली के एलजी तरनजीत सिंह संधू ने MCD को निर्देश दिया है कि वह शहर भर में, खासकर अनधिकृत और छोटी कॉलोनियों में 'जीरो-वेस्ट' प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा दें और उन्हें लागू करने में मदद करे.

उन्होंने अधिकारियों से यह भी कहा कि वे सीमित संसाधनों वाले इलाकों में कम्पोस्टिंग यूनिट और रिड्यूस-रीयूज-रिसाइकल (RRR) सेंटर जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए CSR फंडिंग के विकल्पों पर विचार करें.

अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली की नवजीवन विहार कॉलोनी ने सोर्स पर ही कचरे को अलग कर कम्पोस्टिंग और रिसाइकलिंग के जरिए लैंडफिल साइट्स पर जाने वाले 10 लाख किलो से ज्यादा कचरे को वहां जाने से रोका है. नवजीवन विहार कॉलोनी 8 सालों से 'जीरो-वेस्ट' पर काम कर रही है. 

एलजी संधू ने कॉलोनी के RRR सेंटर, एरोबिक कम्पोस्टिंग फैसेलिटी और रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का निरीक्षण किया. उन्होंने कहा कि इस मॉडल को दूसरी जगहों पर भी अपनाया जा सकता है.

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लेकिन क्या हैं ये 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी'?

इसका मतलब हुआ कि ऐसी कॉलोनियां जहां से कचरा कम या फिर बिल्कुल नहीं निकलता. ऐसी कॉलोनियों में घरों से निकलने वाले कचरे का निपटान वहीं पर हो जाता है.

जीरो-वेस्ट कॉलोनी में कचरे को गीले कचरे, सूखे कचरे, सैनिटरी कचरे, घर से निकलने वाले खतरनाक कचरे और ई-वेस्ट में अलग-अलग किया जाता है. कचरे की प्रोसेसिंग कॉलोनी के अंदर ही की जाी है. गीले कचरे को जहां डिसेंट्रलाइज्ड कम्पोस्टिंग के जरिए ठिकाने लगाया जाता है तो वहीं सूखे कचरे को रिसायकलर्स को दे दिया जाता है.

ऐसी कॉलोनियों में क्या खास होता है?

  • सोर्स पर ही 100% कचरे को अलग-अलग किया जाता है.

  • गीले और बागवानी से निकले कचरे से खाद बनाई जाती है.

  • रिसाइक्लिंग और ठोस कचरे का डिसेंट्रलाइज्ड मैनेजमेंट किया जाता है.

  • ऐसी मशीनों से सफाई की जाती है, ताकि धूल न उड़े.

  • कॉलोनियों से लैंडफिल में बहुत कम या बिल्कुल भी कचरा नहीं भेजा जाता है.

  • रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और वहां रहने वालों की सक्रिय भागीदारी होती है.

इससे फायदा क्या होता है?

MCD के मुताबिक, आज के समय में दिल्ली में 650 से ज्यादा ऐसी कॉलोनियां हैं, जिन्हें 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी' घोषित किया जा चुका है. ऐसी कॉलोनियों को MCD की ओर से इंसेंटिव मिलता है. ऐसी कॉलोनियां प्रॉपर्टी टैक्स का कुछ हिस्सा विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं.

पिछले साल, MCD ने रेसिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के लिए 'सहभागिता स्कीम' शुरू की थी. इसके तहत सोर्स पर ही कचरे को अलग-अलग करने वालीं RWAs को विकास कार्यों के लिए इंसेंटिव के तौर पर जमा किए गए प्रॉपर्टी टैक्स का 10% हिस्सा मिलता है. इसके अलावा, अगर कचरे को सोर्स पर ही 100% अलग-अलग किया जाता है तो जमा टैक्स का 5% एक्स्ट्रा इंसेंटिव भी मिलेगा.

दिल्ली सरकार ने अगले साल मई तक 100 और कॉलोनियों को 'जीरो-वेस्ट कॉलोनी' में तब्दील करने की योजना बनाई है. ऐसी कॉलोनियां बनने से दिल्ली में कचरे की समस्या से छुटकारा मिलने की उम्मीद है.

कॉलोनियों के अलावा, सरकार अपने 'जीरो-वेस्ट' प्लान को दिल्ली के 9 अस्पतालों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है. ऐसा होने पर अस्पताल से निकलने वाले बायोमेडिकल कचरे को अस्पतालों में ही प्रोसेस किया जा सकेगा. दिल्ली सरकार के मुताबिक, अभी हर रोज अस्पतालों से 13,641 किलो बायोमेडिकल कचरा निकलता है. 

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