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बंगाल और असम में बीजेपी की जीत से निकला देश में चुनावी राजनीति का टेंपलेट?

यूपी में चुनाव जीतने के लिए जरूरी समीकरण पूरे देश से अलग हैं. यहां जाति और धर्म के बीच हमेशा कांटे की टक्कर रहती है. यहां पर ध्रुवीकरण की राजनीति को जाति से लड़ना पड़ता है. वक्त के साथ बीजेपी ने इस जाति को तोड़ने और समाज को जोड़ने के कई प्रमुख दांव आजमाए हैं.

बीजेपी को अब जीत का फॉर्मूला मिल गया है.
  • बीजेपी असम और बंगाल की चुनावी रणनीति को पूरे देश में 2027 के विधानसभा चुनावों में लागू करने की तैयारी में है.
  • असम और बंगाल में ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव प्रचार में हिंदू वोटों को मजबूत करने की रणनीति अपनाई गई है.
  • विपक्षी दलों में मुस्लिम विधायक संख्या अधिक होने से विपक्ष को अक्सर एंटी-हिंदू और एंटी-सरकार बताया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि अब बीजेपी पूरे देश में असम और पश्चिम बंगाल की चुनावी टेंपलेट पर चुनाव लडेगी. ऐसे में सवाल है कि ये टेंपलेट क्या है? उसमें ऐसा क्या है कि जो वहां भी चल गया और वो यूपी सहित 7 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी सक्सेसफुल रहेगा? फरवरी-मार्च 2027 से नवंबर-दिसंबर 2027 के बीच में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसमें पंजाब और यूपी के अलावा पांच राज्यों में बीजेपी की ही सरकारें हैं. तो क्या है देश में चुनावी राजनीति का भविष्य? जानिए इस रिपोर्ट में...

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असम-पश्चिम बंगाल का चुनावी डबल इंजन

चुनाव की राजनीति हिन्दू और मुसलमान के हाईवे पर आ गई है. इसे 2027 में उत्तर प्रदेश से गुजरना है, लेकिन इसमें एक सवारी पहले से सवार है और वो है महिला आरक्षण बिल पर बीजेपी की हार. इसका कॉकटेल ही असम और पश्चिम बंगाल की टेंपलेट कहा जा रहा है, जिसे पूरे देश के चुनावों में लागू किया जाएगा. पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नतीजों के तुरंत बाद कहा,“ बिहार में तेजस्वी यादव, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की छुट्टी हो चुकी है और अब यूपी में अखिलेश यादव का सफाया होगा.” कहने का मतलब ये कि राज्यों में रीजनल पार्टियों को हटाने के लिए बीजेपी ने पूरी तैयारी कर ली है और उसकी प्रयोगशाला रहे हैं असम और पश्चिम बंगाल. बंगाल विजय के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा, “संसद में महिला आरक्षण बिल का साथ नहीं देने की सजा यूपी में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को मिलेगी.”

धर्म और जाति का विजयी मिश्रण

असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिमंता बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी ने अपने चुनाव प्रचार में जमकर और खुलकर हिन्दू-मुस्लिम किया है. हर चुनावी रैली में घुसपैठ, बांग्लादेशी मुसलमान को मुद्दा बना कर डंके की चोट पर कहा...

हिन्दू EVM का वोट मुझे मिला है और मुस्लिम EVM का वोट ममता बनर्जी को मिला है. हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, मारवाड़ी, पूर्वांचली, हिन्दू बंगाली यहां तक कि CPM के हिन्दू वोटर ने भी अपना वोट मुझे ट्रांसफर कर दिया, लेकिन मुसलमानों ने हिजाब पहन कर ममता को वोट दिया. मेरी जीत हिन्दुत्व की जीत है. बंगाल की जीत है. जय श्रीराम.

शुभेन्दु अधिकारी

सीएम, पश्चिम बंगाल

हिमंता बिस्वा सरमा ने असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान वोटर्स के बीच बार बार ऐसी बातों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया, जिन्हें ध्रुवीकरण में सहायक बताया गया.

मुझे बांग्लादेशी मुसलमान का वोट लेकर सीएम नहीं बनना है. बांग्लादेशी मुस्लिम का वोट लेकर सीएम बना तो कुछ नहीं कर पाऊंगा. मुझे मुसलमान का वोट नहीं चाहिए, मुझे सनातन का वोट चाहिए.

हिमंता बिस्वा सरमा

सीएम, असम

हिन्दुत्व के त्रिदेव

यूपी के योगी, पश्चिम बंगाल के शुभेंदु और असम से हिमंता हिन्दुत्व के पोस्टर बॉय हो गए हैं. त्रिदेव की राजनीति पर एक्सपर्ट का दावा है कि इन्होंने एक पुराने नारे को सच साबित कर दिया है.

“जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा”

योगी, शुभेंदु और हिमंता जो कहते हैं, वो कर देते हैं. इनके दावों में शब्द बेपर्दा होते हैं और शैली बहुत देसी. लहजा बहुत क्रूड रहता है. औपचारिकता और राजनीतिक शिष्टाचार का अनुशासन को तोड़ने की यहां भरपूर आजादी है. त्रिदेव की शैली में बात जब विकास के बाहर आती है तो फिर उसमें उसमें दो ही लेंस हैं- हिन्दू और मुसलमान. मकसद सबका एक है-वो ये कि हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण इतना ज्यादा हो जाए कि मुस्लिम वोटों की विक्ट्री वैल्यू किसी काम की नहीं रहे. मुस्लिम वोटों के दम पर कोई जीत नहीं पाए. सत्ता तक नहीं पहुंच पाए.

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हिन्दू ध्रुवीकरण का प्रयोग

प्रचंड हिन्दू पोलराइजेशन की पॉलिटिक्स भारत के चुनाव में नयी है. ये बीजेपी का बड़ा राजनीतिक प्रयोग माना जाता है, क्योंकि बीजेपी के विरोधी राजनीतिक दल मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण का इस्तेमाल विक्ट्री वोट के लिए करते आए हैं. विक्ट्री वोट का मतलब है ऐसा वोट, जिसकी वजह से हार-जीत का फैसला होता है. सत्ता मिलती है या छूट जाती है. योगी आदित्यनाथ ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान साफ-साफ कहा कि “कोई मौलाना क्या बक रहा है, ये चिंता करने की जरूरत नहीं है. आने दीजिए बीजेपी की डबल इंजन की सरकार को, ये आपकी चाटुकारिता करते नजर आएंगे. सड़कों पर झाड़ू लगाते नजर आएंगे. देखो, यूपी में कितना परिवर्तन हो गया है. कोई सड़क पर नमाज नहीं पढ़ सकता है.”

शुभेंदु अधिकारी ने वोटिंग के बाद ईवीएम के बारे में कहा कि “ हिन्दू ईवीएम का वोट मुझे मिला और मुस्लिम ईवीएम का वोट टीएमसी को, ममता बनर्जी को मिला है.”

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हिमंता बिस्वा सरमा ने प्रचार के दौरान कहा कि “असम में मैंने बांग्लादेशी मुस्लिम का पोलिटकली टांग तोड़ कर रखा है. इस बार मैंने बोलकर रखा है कि भाई मुझको वोट मत देना. मुझे तुम्हारा वोट नहीं चाहिए. चुनाव के बाद मैं तुम्हारा कमर भी तोड़ने वाला हूं. मैं देश का अकेला ऐसा मुख्यमंत्री हूं, जो कहता है कि मुझे बांग्लादेशी मुसलमान का एक भी वोट नहीं चाहिए. मुझे एक वोट भी नहीं चाहिए.अगर मैं बांग्लादेशी मियां का वोट लेकर सीएम बना तो कुछ नहीं कर पाऊंगा. इसीलिए मुझे बांग्लादेशी मियां का वोट नहीं चाहिए. मुझे भारत के नागरिक का वोट चाहिए. सनातनी हिन्दू का वोट चाहिए.”

जो मेरे साथ, मैं उसके साथ

भारत की चुनावी राजनीति में मुस्लिम वोट बायकॉट की घोषणा पहले सीमित थी. छोटे नेता और फ्रिंज दल चुनाव के दौरान अपने मंच से नारा लगाते थे. जबकि बड़े नेता और केन्द्रीय पार्टी आधिकारिक रूप से सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का दावा करती थीं. मगर अब क्लियर और लाउड तरीके से शुभेंदु अधिकारी कहते हैं कि जो हमारे साथ, हम उसके साथ. चुनाव के समय नेताओं के बहुत क्लियर और स्ट्रेट हो जाने का ट्रेंड लागातार बढ़ता जा रहा है. उसके रिजल्ट भी बहुत साफ सामने आ रहे हैं. बंगाल और असम विधानसभा चुनाव में ये साफ दिखता है.

विपक्ष या मुस्लिम विधायक?

असम विधानसभा में 126 विधायक हैं. मैजिक नंबर 64 है. BJP+ को 102 सीट और 50% वोट मिला है. कांग्रेस और अन्य गैर NDA दलों को 24 विधायक और करीब 44% वोट मिला है. विरोधी खेमें में कुल 24 विधायक हैं. इसमें 22 मुस्लिम हैं. मतलब 92% विपक्ष मुस्लिम हैं. केवल कांग्रेस का देखें तो असम में 95% कांग्रेस के विधायक मुस्लिम हैं. वेस्ट बंगाल में 100% कांग्रेसी विधायक मुस्लिम हैं. केरल में 13% विधायक मुस्लिम हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के करीब 40% विधायक मुस्लिम हैं. असम में 100% विधायक मुस्लिम.

अब अगर इन आंकड़ों को ध्यान में रखकर आप विधानसभा की तुस्वीर को देखें तो पता चलेगा कि विपक्ष में बड़ा हिस्सा मुस्लिम का है. असम में तो विपक्ष का मतलब मुस्लिम हो गया है. ऐसे में जैसे ही सरकार के किसी नीति-निर्णय का विरोध होगा तो हर चीज में हिन्दू मुस्लिम खोजने वाले, राजनीतिक दलों के लिए नरेटिव तैयार करने वाले फौरन विपक्ष को एंटी हिन्दू, एंटी गवर्नमेंट घोषित कर देंगे. ऐसी स्थिति में राजनीति का चेहरा बहुत बदल जाएगा.

“मुस्लिम लीग माओवादी कांग्रेस”

असम में चुनाव के बाद AIUDF पार्टी के नेता बदरूद्दीन अजमल ने कहा कि “ कांग्रेस ने मुसलमानों का डराने का काम किया. मुख्य विपक्षी दल डराता नहीं है. जनता के साथ डराने वाले के खिलाफ खड़ा होता है. कांग्रेस ने कहा कि हिमंता बिसवा सरमा आ गया तो तुम्हें खा जाएगा. हमें वोट दो. हमारा सीएम होगा तो तुम बच जाओगे. तो ना नौ मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी. कांग्रेस ने गड्ढा खोदा और खुद उसमें गिर गई. कांग्रेस मुस्लिम लीग हो गई है इसका मुझे दुख है.” कहने का मतलब ये कि केवल मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी से कोई फायदा नहीं होगा लेकिन कांग्रेस की चुनावी रणनीति यही दिखती है.

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खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कांग्रेस को “मुस्लिमलीग माओवादी कांग्रेस” कहते हैं. उनका दावा है कि इसकी वजह से “इंदिरा और राजीव गांधी के साथ काम करने वाले कांग्रेसी बहुत उलझन में हैं. कांग्रेस के भीतर एक बड़ा धड़ा तैयार हो गया है, जो मौजूदा कांग्रेस की इन नीतियों से सहमत नहीं है.” इस राजनीतिक सोच और विचार को योगी आदित्यनाथ के यहां अंजाम में देखा गया जबकि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में कहा कि “बंगाल की धरती तो काबा की धरती नहीं बनने देना है. बंगाल की धरती तो काली की धरती रहेगी, मां दुर्गा की धरती रहेगी, वंदेमातरम् की धरती रहेगी, हर हर महादेव का उदघोष लगातार चलना चाहिए, यही कहने मैं आया हूं.”

प्रचार के दौरान ही हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि “जो लोग काबा मदीना की बात करते हैं उन्हें परमानेंटली काबा और मदीना चले जाना चाहिए. आप अयोध्या का बात बोलो, इच्छा है तो अजमेर शरीफ का बात बोलो, लेकिन कहां काबा मदीना बोल रहे हो.” काली और काबा की लड़ाई तब शुरू हुई जब टीएमसी की सांसद ने दिल में मदीना नाम का एक गाना अपने प्रचार के दौरान गाया. बाद में उन्हें अपनी जनसभाओं मे हनुमान चालीसा पढ़ना पड़ा था.मतलब मुस्लिम तुष्टिकरण की कोई भी कोशिश अब चुनावी राजनीति में उल्टी ही पड़े इसको सुनिश्चित किया गया है. वहीं चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाओं में और बीजेपी के कार्यकर्ता सम्मेलन में जय श्रीराम के नारे का जमकर इस्तेमाल किया गया. बंगाल के चुनाव में राम मंदिर मुद्दा बनाया गया.

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अमित शाह ने अपने एक भाषण में कहा कि “मोदी जी ने 500 साल से इंतजार कर रहे राम मंदिर का निर्माण करवाया, लेकिन यहां बंगाल में ममता बनर्जी का चमचा हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद बनाना चहता है. जब तक बीजेपी का एक भी कार्यकर्ता जीवित है बाबरी मस्जिद के निर्माण का सपना पूरा नहीं हो सकता है.” हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी एक जनसभा में कहा कि “आज आप देखिए, कहीं से आ गया कोई हुमांयू कबीर कि हम यहां पर एक बाबरी मस्जिद बनाऊंगा. अरे तुम्हारा बाप का जगह है क्या?”

विपक्ष मतलब मुसलमान की चुनावी चाल का अलर्ट

भविष्य की इस राजनीति का अंदाजा हर उस राजनीतिक किरदार को है, जो इसका सामना करने वाला है. अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में इस दुधारी चुनावी रणनीति के लिए तैयार हैं. अखिलेश यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीजेपी पर चुनावी घोटाले का आरोप लगाया और चौंकाने वाली बात कही. उन्होंने कहा, “बंगाल का जो अनुभव है, उससे बड़ा काम उत्तर प्रदेश में करेंगे, जो मल्टीलेयर इलेक्शन माफिया है वो मिलकर कोई नई तैयारी करेंगे यूपी में चुनाव की. क्योंकि बंगाल वाला तो एक्सपोज हो गया है कि चुनाव को किया है प्रभावित. आपने तो चुनाव ही पलट दिया है.”

यूपी में खेला होबे!

असम और वेस्ट बंगाल इलेक्शन की समीक्षा हुई तो मेजोरिटी पोलराइजेशन सबसे ताकतवार चीज बताया गया. इसके लिए भय से मुक्ति. गुंडा राज से मुक्ति. घुसपैठ से मुक्ति को मुद्दा बनाया गया. इसके अलावा स्पेशल इंटेशिव रिवीजन की भी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके दम पर ममता बनर्जी की फ्रीबीज योजनाओं जैसे महिला को डायरेक्ट बेनिफिट देने वाली योजनाओं को ठंडा कर दिया गया. कहने को ये भी कहा गया कि पश्चिम बंगाल में ममता की सरकार से नाराजगी का इस्तेमाल लोगों को बीजेपी के पक्ष में मोड़ने के लिए किया गया, लेकिन असम में तो बीजेपी पलट कर आ गई. वहां हर एंटी फैक्टर बेकार साबित हुआ. ऐसी स्थिति में असम और पश्चिम बंगाल का मॉडल यूपी में कैसे लागू होगा? जहां धर्म के खिलाफ जाति बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती आयी है.

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भय,भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ बुलडोजर

उत्तर प्रदेश में योगीराज है. इसे पूरे देश में बुलडोजर और हाफ एनकाउंटर की विशिष्ट पहचान मिली है. बीजेपी शासित राज्यों में इस मॉडल की नकल की गयी है. टारगेट सबका एक है भय से मुक्ति. भय के चेहरे राज्यों के हिसाब से बदलते हैं, लेकिन उनमें एक चेहरा हमेशा कॉमन होता है. इस चेहरे के दम पर ही हिन्दू वोटों के पोलराइजेशन किया जाता है. योगी आदित्यनाथ का विधानसभा में कहा गया एक बयान सोशल मीडिया में खूब प्रचलित है, “दंगा कैसे होता है और दंगाई का उपचार कैसे होना है तो बरेली के मौलाना से पूछ लो,अब यहां न कर्फ्यू है, न दंगा है, यहां सब चंगा है, ये है नया यूपी.”

ध्रुवीकरण और बहुसंख्यक वोट के मंदिर

मौलाना, मदरसा, मस्जिद, मांस की दुकान, खुले में नमाज, लव जेहाद, लैंड जेहाद, मुस्लिम तुष्टिकरण... ऐसे की वर्ड हैं जिनकी मदद से बहुसंख्यक वोटों का पोलेराजेशन किया जाता है. यूपी में राम मंदिर, काशी विश्वनाथ और मथुरा के कृष्ण मंदिर के प्रति भी बहुसंख्यक वोटरों में भावनात्मक अपील का असर होता है. इसलिए यूपी में अब तक मस्जिद के लिए कटघरे में खड़े होने वाले राजनीतिक दलों ने चुनावी वैतरणी में मंदिर की पूंछ पकड़ ली है. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव इटावा में केदार नाथ मंदिर का हमशक्ल तैयार कर रहे हैं. इसे वो उस शिवशक्ति रेखा पर स्थापित बताते हैं जिस पर देश के प्रमुख शिवमंदिर होने का दावा किया जाता है. वैसे मंदिर निर्माण का प्रयास तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने भी किया था. उन्होंने पुरी के जगन्नाथ मंदिर का हमशक्ल दीघा में तैयार करवा दिया था, लेकिन उससे उन्हें खास सफलता नहीं मिली. ममता मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दू उपेक्षा के चुनावी चक्रव्यूह में फंस गयीं. शुभेंदु अधिकारी ने खुलेआम दावा किया कि हिन्दुओं के वोट ने उन्हें जिता दिया. हालांकि अमित शाह हिंदू ध्रुवीकरण के दावे को नजरों का दोष मानते हैं.अमित शाह का दावा है कि “घुसपैठ और उससे पैदा होने वाला खतरा देश और देश के लोगों के लिए खतरनाक है. महिला-पुरूष और युवा इसे समझते हैं इसीलिए इससे मुक्ति देने वाले की बात सुनते हैं. जिनकी आंखों के लेंस पीले हैं, उन्हें इसमें घ्रुवीकरण दिखता है.”

ध्रुवीकरण या साम-दम-दंड-भेद?

जीत ध्रुवीकरण का नतीजा है? विकास की भूख है? डबल इंजन सरकार के प्रति बढ़ता भरोसा है? बीजेपी के खिलाफ किसी अल्टरनेटिव के नहीं होने का परिणाम है? मुस्लिम आक्रामकता के प्रति भय से रक्षा की गारंटी है? डेमोग्राफिक असंतुलन से रक्षाकवच है? या फिर विपक्ष का आरोप सही है कि “बीजेपी चुनावी जीत के लिए साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करती है”.समाजवादी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अपने ताजा हमले में “मल्टीलेयर इलेक्शन माफिया उर्फ दस नंबरी” का जिक्र करना शुरू किया है.

मल्टीलेयर इलेक्शन माफिया उर्फ दस नंबरी

अखिलेश यादव इलेक्शन मैन्युप्यूलेशन के लिए जिस 10 नंबरी मल्टी लेयर इलेक्शन माफिया की बात कर रहे हैं. उसमें वो इलेक्शन कमीशन, सरकारी कर्मचारी, मीडिया, ईवीएम, इलेक्शन फाइनेंशर, इलेक्शन मैनेजर सहित हर उस चीज को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं जो चुनाव की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. हालांकि बीजेपी इसका विरोध करती है. उसका दावा है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की ऊर्जा और दोनों के नेतृत्व में देश का विश्वास व बीजेपी वर्कर की मेहनत का नतीजा है चुनाव में हो रही लगातार जीत.

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Photo Credit: (Photo: PTI)

मिलो, मिटो या शांत हो जाओ?

कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से अरूणाचल तक बीजेपी या NDA की सरकारों का विस्तार हो रहा है. खास बात ये है कि इस प्रयास में क्षेत्रीय दल या तो बीजेपी के साथ हैं या फिर वो सत्ता के मानचित्र से गायब हैं. बीजेपी के बाद देश के सबसे बड़े केंद्रीय दल कांग्रेस की सरकार हिमाचल, तेलंगाना,कर्नाटक और केरल के अलावा अब और कहीं नहीं हैं. ऐसे में ये नक्शा यूपी या आने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनाव में NDA की ताकत भी है और चुनौती भी. साथ ही यूपी में काम कर रहे अनेक जाति आधारित क्षेत्रीय दलों के लिए चेतावनी भी. क्योंकि बीजेपी गंगोत्री से गंगासागर तक भगवा की ताकत दिखा रही है.

बीजेपी का विस्तार और SIR

विपक्ष का दावा है कि स्पेशल इंटेशिव रिवीजन की वजह से बिहार और पश्चिम बंगाल में नतीजे NDA के मुताबिक हैं. इस पर बीजेपी का कहना है कि जब SIR का एस भी नहीं था तो 2024 के लोकसभा चुनाव, आंध्र प्रदेश.अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओड़ीशा में NDA क्यों जीता? दिल्ली में बीजेपी की जीत क्यों हुई? बिहार चुनाव से पहले राहुल गांधी ने कई बड़े खुलासों के आधार पर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया. पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान अभिषेक बनर्जी ने चुनाव प्रक्रिया पर आरोप लगाए. वोटिंग के बावजूद ईवीएम की बैट्री के कम नहीं होने का दावा किया. मशीन के नंबर बदलने का दावा किया. सीसीटीवी फुटेज पब्लिक करने का दावा किया. अखिलेश यादव भी लगातार चुनाव आयोग और सरकार पर इलेक्शन रिगिंग का आरोप लगाते आए हैं. जबकि चुनाव आयोग का दावा है कि हर चरण पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल रहते हैं. हर चरण पर वीडियोग्राफी होती है. देश में ऐसी कोई दूसरी सरकारी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें स्टेकहोल्डर्स की इतनी सहभागिता और पारदर्शिता हो.

ट्रिक नहीं “सोशल स्मार्ट” पॉलिटिक्स

चुनावी हार जीत की लड़ाई में वोटिंग मशीन, वोटर लिस्ट, चुनाव आयोग, खलनायक बनाए जाते हैं लेकिन बीजेपी अपनी जीत के लिए वक्त के मुताबिक “स्मार्ट” राजनीति को जिम्मेदारी मानती है. बीजेपी का दावा है कि देश की जनता को उसके नेताओं पर भरोसा है. सोशल मीडिया के जंगल में जनप्रसिद्धि का ये मंगल बहुत जोरों से चलता है. इसमें नेताओं के प्रति वोटर की दीवानगी ठीक वैसे ही दिखती है जैसे किसी फिल्म स्टार के लिए होती है. ऐसे वीडियो की भरमार है, जिसमें नेता अपने सपोर्टर को जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी की तरह मिलते हैं.

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स्मार्ट फोन वोटर का नया दौर

सोशल मीडिया की फीड में रील और शॉट्स के मैदान में हर दल की सायबर सेनाएं जोर-शोर से लगी रहती है. अब चुनाव में स्मार्ट फोन एक बहुत बड़ा फैक्टर है. नेताओं की छवि बनाने और बिगाड़ने में रीलयोद्धा बड़ी लड़ाई लड़ते हैं. वोटर का मन बनाने और बिगाड़ने, नैरिटिव को घर-घर पहुंचाने में भी स्मार्ट फोन और डिजिटल कंटेंट दिन पर दिन निर्णायक होता जा रहा है. ऐसी स्थिति में नयी पीढ़ी के वोटर और स्मार्ट फोन यूजर्स आने वाले चुनावों के लिए राजनीतिक दलों की बड़ी सुविधा और चुनौती दोनों हैं.

यूपी में का बा?

यूपी में चुनाव जीतने के लिए जरूरी समीकरण पूरे देश से अलग हैं. यहां जाति और धर्म के बीच हमेशा कांटे की टक्कर रहती है. यहां पर ध्रुवीकरण की राजनीति को जाति से लड़ना पड़ता है. वक्त के साथ बीजेपी ने इस जाति को तोड़ने और समाज को जोड़ने के कई प्रमुख दांव आजमाए हैं. इसमें बड़ी जातियों के खिलाफ उनकी उपजातियों के वोटबैंक, महिला वोटबैंक, सवर्णों में गरीबों के वोटबैंक को खड़ा करने के प्रयास हुए हैं. वो कभी सफल होते हैं कभी असफल. पश्चिम बंगाल में 90 लाख वोट कटे मतलब कुल वोट का 12% तो 80 से 150 सीट पर असर का दावा किया जा रहा है. SIR ने यूपी में देश के सबसे ज्यादा वोटर काटे हैं. जो 2 करोड़ 89 लाख हैं. चार सौ तीन सीट पर अगर पश्चिम बंगाल के असर को दोहरा दें तो यूपी में 2027 की तस्वीर क्या होगी? देश और राजनीतिक दलों के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है.

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