- पश्चिम बंगाल में महिलाओं की भूमिका राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में दशकों में निर्णायक रूप से बदलकर सशक्त हुई
- रूपश्री योजना के तहत 22 लाख से अधिक महिलाओं को विवाह के समय वित्तीय सहायता प्रदान की गई है
- कन्याश्री योजना ने करीब एक करोड़ छात्राओं को शिक्षा जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग दिया है
पश्चिम बंगाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका बीते एक दशक में बेहद ही निर्णायक रूप से बदली है. आज महिलाएं महज मतदाता ही नहीं, बल्कि नीतियों की दिशा तय करने वाली सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रही हैं. राज्य सरकार की कई लक्षित पहलों ने महिला सशक्तीकरण को कल्याण के दायरे से निकालकर राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ा है.
ममता सरकार की योजनाओं का जमीनी असर
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में शुरू की गई योजनाओं का असर जमीनी स्तर पर साफ दिखता है. रूपश्री योजना के तहत अब तक 22.02 लाख महिलाओं को विवाह के समय 25,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी गई है. इस योजना पर राज्य सरकार 5,558.66 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. सरकार का दावा है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं को सम्मानजनक शुरुआत का सहारा मिला है.
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कन्याश्री योजना बालिका शिक्षा का नया आधार
इसी तरह, कन्याश्री योजना ने बालिकाओं की शिक्षा को नया आधार दिया है. लगभग 1 करोड़ छात्राओं को पढ़ाई जारी रखने के लिए वित्तीय सहायता दी जा चुकी है, जिस पर 16,554 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च हुआ है. इस योजना को देश-विदेश में बालिका शिक्षा और ड्रॉपआउट रोकने की एक सफल मिसाल माना जाता है. आर्थिक मोर्चे पर भी बंगाल की महिलाएं अग्रणी भूमिका निभा रही हैं.
राज्य महिलाओं के स्वामित्व वाले MSME में नंबर वन
राज्य महिलाओं के स्वामित्व वाले एमएसएमई में राष्ट्रीय स्तर पर पहले स्थान पर है, जहां भारत के कुल महिला-स्वामित्व वाले एमएसएमई का 23.42 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम बंगाल में है. कुल एमएसएमई की संख्या के मामले में भी राज्य शीर्ष पर बना हुआ है. यह आंकड़े संकेत देते हैं कि महिलाएं अब केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि रोजगार सृजन और आर्थिक विकास की चालक शक्ति बन रही हैं.
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हाशिए पर खड़ी महिलाओं के लिए योजना
सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ी और संकटग्रस्त महिलाओं के लिए मुक्तिर आलो योजना के तहत व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया है. साल 2025 तक इस योजना पर 1.47 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जिससे हजारों महिलाओं को कौशल विकास और आत्मनिर्भरता का अवसर मिला है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन योजनाओं का प्रभाव केवल सामाजिक बदलाव तक सीमित नहीं है. महिलाएं आज चुनावी राजनीति में भी निर्णायक मतदाता के रूप में उभरी हैं.
राज्य मजबूत, समावेशी अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर
पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक, महिला मतदाताओं की भागीदारी और मतदान प्रतिशत ने सत्ता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है. सरकार का तर्क रहा है कि महिला सशक्तिकरण केवल कल्याण नहीं, बल्कि विकास की रणनीति है. शिक्षा, कौशल, उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाकर राज्य एक मजबूत और समावेशी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है.
राज्य की महिलाएं आखिर क्यों ममता सरकार की मुरीद
इस सबके साथ लक्ष्मी भंडार योजना ने महिलाओं को हर महीने जो पैसे पहुंचाए है वो पांच साल के अंदर महिलाओं को ममता का मुरीद बनाने का काम कर देती है. ममता को बंगाल की महिलाओं से प्यार और वोट दोनों मिलता रहा है. कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में महिला सशक्तिकरण की यह यात्रा बताती है कि जब नीतियां महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं, तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे राज्य की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखती हैं.
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