सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और लेबर कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी को बकाया वेतन के साथ काम पर वापस रखने के लिए कहा गया था. कोर्ट ने कहा कि जो कर्मचारी बिना इजाजत के काम से गैर-हाजिर रहा और अपने दावों को साबित नहीं कर पाया, उसे ऐसी राहत नहीं दी जा सकती.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मेसर्स रिफिलिस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड की अपील को मंजूरी दी और कर्मचारी अर्जुन गुप्ता के दावे को खारिज कर दिया.
गुप्ता का आरोप था कि जून 2012 में ड्यूटी पर लौटने की कोशिश करने के बाद उन्हें गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से निकाल दिया गया था.
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब अगस्त 2006 से मोल्डर के तौर पर काम कर रहे कर्मचारी ने 14 मई 2012 से काम पर आना बंद कर दिया. कंपनी का दावा था कि वह बिना बताए गैर-मौजूद रहे और 18 मई 2012 को उनके पते पर एक नोटिस भेजा गया था.
शुरुआत में लेबर कोर्ट ने फरवरी 2022 में कर्मचारी के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाया था. मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट गया. उसके बाद अक्टूबर 2023 में लेबर कोर्ट ने फिर से कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें 50 प्रतिशत बकाया वेतन और उससे जुड़े लाभों के साथ नौकरी पर बहाल करने का आदेश दिया. बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा.
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सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने लेबर कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने बिना किसी ठोस सबूत के राहत देने में गलती की थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस तर्क को खारिज करते हुए कि कंपनी ने गुप्ता को गौतमबुद्ध नगर स्थित उनके निवास के बजाय बिहार में उनके स्थायी पते पर नोटिस भेजा था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी को अपने रिकॉर्ड में कर्मचारी की तरफ से दिए गए पते पर भरोसा करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, 'कंपनी से केवल उसी पते पर कर्मचारी से संपर्क करने की उम्मीद की जा सकती है जो कर्मचारी ने दिया है. अगर कर्मचारी ने अपना निवास स्थान बदल लिया था तो बदलाव की जानकारी कंपनी को देने की जिम्मेदारी उसी की थी. उसे इस मामले में लापरवाही का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.'
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कर्मचारी को क्यों नहीं मिली राहत?
सुप्रीम कोर्ट को कर्मचारी के इस दावे का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं मिला कि वह अपनी मां की गंभीर बीमारी के कारण अनुपस्थित रहा था या उसने जाने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'यह दावा पूरी तरह से निराधार है. इसके समर्थन में रिकॉर्ड पर कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया है.'
कोर्ट ने आगे कहा कि गैर-मौजूदगी की अवधि के दौरान कर्मचारी ने अपनी अनुपस्थिति का कारण बताते हुए या छुट्टी मांगते हुए कोई लिखित सूचना नहीं भेजी थी. सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि वह 8 जून, 2012 को वापस आया था और उसने ड्यूटी पर लौटने की कोशिश की थी, लेकिन उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी गई. कोर्ट ने कहा कि इस आरोप के समर्थन में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था.
फैसले में कहा गया, 'हमने पाया कि कर्मचारी बिना इजाजत के अनुपस्थित रहा, अनुपस्थिति के दौरान अपनी कंपनी को कोई लिखित सूचना नहीं दी, अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया, और ड्यूटी पर लौटने की कोशिश का भी कोई सबूत नहीं दिया.'
इसका मतलब क्या हुआ?
यह मानते हुए कि लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के राहत देकर गलती की थी, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की अपील स्वीकार कर ली और लेबर कोर्ट के अक्टूबर 2023 के फैसले और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मार्च 2024 के फैसले को रद्द कर दिया.
नतीजतन, नौकरी पर बहाल करने, बकाया वेतन और नौकरी से जुड़े अन्य सभी लाभों के निर्देश रद्द कर दिए गए और कर्मचारी का दावा खारिज कर दिया गया.
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