- संजय निषाद ने निषाद और उसकी उपजातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग फिर से उठाई है
- 2012 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में निषाद जाति को एससी सूची में जोड़ने की याचिका दाखिल की गई थी
- हाई कोर्ट ने कहा कि एससी सूची में संशोधन का अधिकार केवल संसद के पास है, सरकार या अदालत का नहीं
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री संजय निषाद ने एक बार फिर से आरक्षण के मसले पर तेवर दिखाए हैं. बीते कई सालों से निषाद और उसकी उप-जातियों केवट, मल्लाह और बिंद को अनुसूचित जाति की सूची में डालने की मांग फिर से उठाई है. उनका कहना है कि निषाद और उसकी उपजातियों को SC लिस्ट में डालना चाहिए और उन्हें ओबीसी से काटकर 9 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए. यही नहीं उन्होंने अपनी इस मांग के लिए मंत्री पद छोड़ने तक की धमकी दी है और सरकार से अलग राह अपनाने की बात भी दोहरा रहे हैं. यूपी चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने यह मांग उठाई है तो इसके राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं. आइए जानते हैं, आखिर यह मामला क्या है...
निषाद और उसकी उपजातियों को अनुसूचित जाति में आरक्षण देने की मांग को लेकर अर्जी 2012 में दाखिल हुई थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह याचिका चंद्रशेखर निषाद ने दाखिल की थी. उनका कहना था कि अनुसूचित जाति को लेकर 1950 में जारी अधिसूचना में मझवार जाति को अनुसूचित जाति की लिस्ट में रखा गया है. यह बिरादरी निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट और कश्यप के ही समान है. इसलिए इन जातियों को भी SC लिस्ट में शामिल करना चाहिए. अर्जी में कई अन्य राज्यों का जिक्र करते हुए कहा कि यदि वहां पर इन जातियों को SC लिस्ट में रखा जा सकता है तो फिर यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता.
इस पर हाई कोर्ट ने जून में ही फैसला दिया था और मांग खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट की बेंच में शामिल जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय ने अपने फैसले में कहा था कि कोई अदालत या फिर राज्य की सरकारें किसी बिरादरी को एससी लिस्ट में नहीं जोड़ सकतीं. अदालत का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत संसद ही एससी लिस्ट में संशोधन कर सकती है या फिर नई जातियों को शामिल कर सकती है. अदालत ने कहा कि 1950 की अधिसूचना में मझवार को एससी लिस्ट में रखा गया है. इस सूची में निषाद, मल्लाह, केवट, कश्यप और बिंद शामिल नहीं हैं.
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया- संसद पर ही सूची को अपडेट करने का अधिकार
अब यदि इन जातियों को सूची में शामिल करना है तो इसका अधिकार संसद के पास ही है. यही कारण है कि अब संजय निषाद ने सरकार पर दबाव फिर से बनाने की कोशिश की है. उनका कहना है कि निषाद समाज को एससी में शामिल करना चाहिए और ओबीसी का 9 फीसदी कोटा वहां डालना चाहिए. उनका यह भी कहना है कि ओबीसी कोटे का बड़ा हिस्सा कुछ जातियां ही ले जाती हैं. ऐसे में निषाद समाज को एससी लिस्ट में डाल दिया जाए. उनका कहना है कि भाजपा ने उनसे इस बारे में वादा किया था, लेकिन अब तक निषादों को अलग से आरक्षण देने की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है.
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