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This Article is From Aug 20, 2025

Mumbai Monorail: कैसे बन गई सफेद हाथी? क्यों न जीत सकी मुंबई वालों का दिल?

मुंबई में चलने वाली मोनोरेल आजाद भारत की सबसे पहली मोनोरेल है और अपने किस्म की पहली है. साल 2014 में शुरू हुई है मोनोरेल मुंबई के उत्तर पूर्वी उपनगर चेंबूर को मध्य मुंबई के सात रास्ता इलाके से जोड़ती है.

  • मुंबई की मोनोरेल मंगलवार को 40 फुट ऊंचाई पर अचानक रुक गई, जिससे करीब साढ़े पांच सौ यात्री फंस गए.
  • मोनोरेल में बिजली चली गई और एसी बंद हो गया, जिससे यात्रियों को दो घंटे तक परेशानी का सामना करना पड़ा.
  • मोनोरेल तकनीकी खराबी और बार-बार हादसों की वजह से यात्रियों के लिए भरोसेमंद यातायात माध्यम साबित नहीं हो पाई.
मुंबई:

मुंबई की मोनोरेल फिर एक बार खबरों में है और हर बार की तरह इस बार भी एक गलत वजह को लेकर यह चर्चा में आई है. मंगलवार के दिन करीब साढ़े पांच सौ मुसाफिरों की जान सांसत में फंस गई जब 40 फुट की ऊंचाई पर चल रही मोनोरेल अचानक रास्ते में बंद हो गई. मोनोरेल के भीतर बिजली चली गई और एसी ने काम करना बंद कर दिया जिसकी वजह से यात्री बेहाल हो गए. करीब 2 घंटे की मशक्कत के बाद दमकलकर्मियों ने सभी यात्रियों को मोनोरेल से बाहर निकाला. 

मुंबई में चलने वाली मोनोरेल आजाद भारत की सबसे पहली मोनोरेल है और अपने किस्म की पहली है. साल 2014 में शुरू हुई है मोनोरेल मुंबई के उत्तर पूर्वी उपनगर चेंबूर को मध्य मुंबई के सात रास्ता इलाके से जोड़ती है. करीब 11 सालों तक अपनी सेवाएं देने के बावजूद मोनोरेल मुंबई वालों का दिल नहीं जीत सकी. अब तो इसे मुंबई का सफेद हाथी माना जाता है. आईए जानते हैं कि क्या कारण रहे हैं जो मुंबई में मोनोरेल का प्रोजेक्ट असफल साबित हुआ. 

हादसों का शिकार 

मुंबई मोनोरेल ने जब से चलना शुरू किया तब से कई बार इसके साथ हादसे हो चुके हैं. मंगलवार को जिस तरह का हादसा हुआ वैसे हादसे कई बार पहले भी हो चुके हैं जब मोनोरेल बीच राह में अटक गई और फिर दमकलकर्मियों को बुला कर मुसाफिरों की जान बचाई गई. साल 2017 में तो एक सुबह चलते चलते मोनोरेल के दो डिब्बों में आग लग गई. गनीमत रही कि उस वक्त डिब्बे खाली थे और किसी की जान नहीं गई. ऐसी घटनाओं से मोनो रेल के यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होते हैं. 

अक्सर तकनीकी खराबी 

अगर कोई घर से दफ्तर के बीच नियमित तौर पर मोनोरेल इस्तेमाल करना चाहे तो ये एक भरोसेमंद माध्यम नहीं साबित हो सकी है. अक्सर इसके पुर्जे खराब हो जाते हैं फिर एक ट्रेन के पुर्जे को निकाल कर दूसरी ट्रेन में लगा दिया जाता है. बार बार तकनीकी खराबी आने के कारण ट्रेनों के संचालन पर असर पड़ता है. 

फ्रिक्‍वेंसी भी कम 

मुंबई की लोकल ट्रेन हर 3 से चार मिनट पर उपलब्ध है. मेट्रो ट्रेन भी इतनी ही देर में मिल जाती हैं लेकिन मोनोरेल के बारे में ऐसा नहीं है. एक मोनोरेल निकल गई तो दूसरी मोनोरेल पकड़ने के लिए 20- 30 मिनट तक का इंतजार करना पड़ता है. मुंबई जैसे भागते दौड़ती शहर में इस तरह की कमजोर बारंबारता मोनोरेल को एक अलोकप्रिय यातायात माध्यम बनाती है.

बेहद खराब प्लानिंग

मुंबई मोनोरेल नेटवर्क की पूरी प्लानिंग ही बिना इसके व्यवहारिक उपयोग को देखते हुए की गई. कई स्टेशन कैसे हैं जो कि आबादी से काफी दूर है. एक मिसाल है भक्ति पर मनोरी स्टेशन की. भक्ति पार्क निवासी इस मोनोरेल का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे. वजह है कि मोनोरेल स्टेशन तक पहुंचने के लिए ही उन्हें 2 किलोमीटर तक बस या टैक्सी का सहारा लेना पड़ता है. मोनोरेल को दिखाकर इस इलाके के बिल्डरों ने अपनी इमारतों में फ्लैट के दाम बढ़ा कर बेचे लेकिन इन इमारतों में रहने वाली लोगों का मोनोरेल से कोई फायदा नहीं होता. 

दूसरे माध्यमों से संपर्क नहीं 

अगर सिर्फ हार्बर लाइन के वडाला रेल स्टेशन को छोड़ दें तो किसी दूसरे रेल स्टेशन या मेट्रो स्टेशन के करीब कोई भी मोनोरेल स्टेशन नहीं है. ये भी मोनोरेल के असफल होने का एक कारण है. मोनोरेल को महाराष्ट्र सरकार की संस्था मुंबई मेट्रोपोलिटन क्षेत्र विकास प्राधिकरण चलाती है. माना जा रहे कि लगातार घाटे में चल रही मोनोरेल को या तो बंद कर दिया जाए या फिर नए तरीके से इसे संरचित किया जाए. 

लेखक के बारे में
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जीतेंद्र दीक्षित
Senior Journalist
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