केंद्र सरकार ने संसद के बजट सत्र को समाप्त नहीं किया है, बल्कि केवल स्थगित किया है. अब सरकार 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद की पुनः बैठक बुला रही है. इन तीन दिनों के विशेष सत्र में एक अहम विधेयक में संशोधन लाने की तैयारी है. यह विधेयक नारी वंदन अधिनियम, 2023 है, जिसे आम तौर पर महिला आरक्षण कानून कहा जाता है.
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने इस विशेष सत्र को लेकर कहा, 'हम 16 अप्रैल को एक महत्वपूर्ण विधेयक ला रहे हैं. इसे किसी राजनीतिक पहल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. महिला आरक्षण बिल में कुछ संशोधन किए जाने हैं और इसे 2029 से लागू करने का इरादा है.'
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महिला आरक्षण बिल में क्या संशोधन प्रस्तावित है?
सरकार महिला आरक्षण कानून में उस प्रावधान में बदलाव करना चाहती है, जिसमें परिसीमन और जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाना है. प्रस्ताव के मुताबिक, परिसीमन के लिए चल रही या आने वाली जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जा सकता है. इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या बढ़ाने का भी प्रस्ताव है.
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सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा सकती है. अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी. वहीं बिहार में सीटें 40 से बढ़कर 60 और तमिलनाडु में सीटों की संख्या 39 से बढ़कर 58 हो सकती है.
इस तरह लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 816 तक पहुंच सकती हैं, जिनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.
विपक्ष का आरोप: चुनावी फायदा उठाने की कोशिश
सरकार के इस कदम को विपक्ष चुनावी राजनीति से जोड़कर देख रहा है. कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने एनडीटीवी से कहा, 'सरकार ने विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फायदा उठाने के लिए सत्र की अवधि बढ़ाकर महिला आरक्षण विधेयक लाने का फैसला किया है.'
कांग्रेस का कहना है कि महिला आरक्षण की शुरुआत उसी ने की थी. पार्टी के मुताबिक, सोनिया गांधी की पहल पर भारी विरोध के बावजूद महिला आरक्षण बिल को आगे बढ़ाया गया था. कांग्रेस का दावा है कि उसने सरकार से 29 अप्रैल के बाद इस मुद्दे पर संसद में चर्चा की मांग की थी, लेकिन सरकार ने विपक्ष की बात नहीं मानी.
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पिछड़ी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग
समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने महिला आरक्षण बिल में पिछड़ी जातियों की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग को दोहराया है. राजद सांसद संजय यादव ने कहा, 'सरकार बंगाल चुनाव को देखते हुए यह बिल लेकर आ रही है. पहले जो कानून बना, उसका क्या हुआ? हमारे नेता लालू प्रसाद यादव की पुरानी मांग है कि एससी-एसटी के साथ-साथ ओबीसी महिलाओं को भी अलग से आरक्षण मिलना चाहिए. हम सरकार को इस पर बाध्य करेंगे.'
वहीं कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा, 'सरकार महिला मतदाताओं को साधने के लिए महिला आरक्षण विधेयक लेकर आ रही है. यह पूरी तरह राजनीतिक लाभ की कोशिश है. महिला आरक्षण का समर्थन कांग्रेस राजीव गांधी के समय से करती आ रही है. बीजेपी को इसका राजनीतिक फायदा नहीं मिलेगा.'
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पारित होने के लिए चाहिए दो-तिहाई बहुमत
चूंकि महिला आरक्षण विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. हालांकि किसी भी पार्टी के खुले तौर पर महिला आरक्षण का विरोध करने की संभावना कम है, लेकिन विपक्ष सरकार को चुनावी समय पर संशोधन लाने, परिसीमन के आधार और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर घेर सकता है. विशेष सत्र के दौरान इस विधेयक पर तीखी राजनीतिक बहस के आसार हैं.
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