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Explainer: कितना भी तनाव हो, भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के परमाणु ठिकानों को क्यों नहीं बनाते निशाना? समझिए

भारी तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों के बावजूद भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं करते. आखिर इसके पीछे की वजह क्या है?

Explainer: कितना भी तनाव हो, भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के परमाणु ठिकानों को क्यों नहीं बनाते निशाना? समझिए
भारत और पाकिस्तान के बीच न्यूक्लियर को लेकर है दुर्लभ समझौता
  • भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे के न्यूक्लियर इंस्टॉलेशनों पर हमला न करने का एग्रीमेंट 1991 से लागू किया
  • दोनों देशों के बीच हर साल न्यूक्लियर फैसिलिटी की लिस्ट का आदान-प्रदान लगातार 30 सालों से जारी
  • भारत-पाकिस्तान का यह समझौता वैश्विक स्तर पर न्यूक्लियर स्थिरता का अनोखा मॉडल है
नई दिल्ली:

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के डायरेक्टर जनरल राफेल ग्रॉसी का कहना है कि 'न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला करना वर्जित होना चाहिए.' ऑस्ट्रिया के वियना में स्थित यह एजेंसी दुनिया भर में न्यूक्लियर मामलों की निगरानी करती है. ग्रॉसी का यह बयान आधुनिक संघर्षों में आम नागरिकों के इस्तेमाल वाले न्यूक्लियर ठिकानों पर मंडरा रहे खतरों और दुनिया भर में बढ़ती चिंता को दर्शाता है.

न्यूक्लियर ठिकानों पर बढ़ रहे हमले

पूरी दुनिया में न्यूक्लियर ठिकानों को युद्धों में निशाना बनाया जाना आम बात बनती जा रही है. यह अब कमजोर पड़ रही है. न्यूक्लियर पावर प्लांट और ठिकाने, जिन्हें कभी युद्ध के समय भी हमले से दूर रखा जाता था, अब संघर्ष की चपेट में आ रहे हैं. यूक्रेन के जापोरिज्जिया न्यूक्लियर पावर प्लांट से लेकर ईरान में नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे ठिकानों तक, न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले या नुकसान के खतरे ने एक्सपर्ट्स और नीति-निर्माताओं के बीच चिंता पैदा कर दी है. ईरान के बुशहर न्यूक्लियर प्लांट और संयुक्त अरब अमीरात के बराक एटॉमिक रिएक्टरों को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं. इससे यह व्यापक चिंता सामने आई है कि आम नागरिकों के इस्तेमाल वाला न्यूक्लियर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर अब रणनीतिक हमलों से सुरक्षित नहीं रहा है.

इस पैटर्न का एक इतिहास रहा है. इजरायल ने पहले के दशकों में इराक और सीरिया में न्यूक्लियर ठिकानों को निशाना बनाया था. हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने ईरान में न्यूक्लियर से जुड़े कई ठिकानों पर हमले किए हैं और बंकर-बस्टर बमों का भी इस्तेमाल किया है. इन घटनाओं ने वैश्विक सुरक्षा के लिए एक खतरनाक नया पहलू पैदा कर दिया है.

ऊर्जा और रिसर्च के लिए बनाई गई आम नागरिकों के इस्तेमाल वाली न्यूक्लियर फैसिलिटी अब टकराव का केंद्र बनने के खतरे का सामना कर रही हैं. इसके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं क्योंकि ऐसी फैसिलिटी को किसी भी तरह का नुकसान होने पर रेडिएशन फैलने का खतरा होता है, जो सीमाओं की परवाह नहीं करता.

IAEA क्यों जता रहा चिंता?

ग्रॉसी इस बात पर जोर देते हैं कि यह चिंता वास्तविक और तत्काल है. उनका कहना है कि न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमले एजेंसी के लिए गहरी चिंता का विषय हैं और IAEA केवल चेतावनी ही नहीं देता, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई भी करता है. दुर्घटनाओं को रोकने और खतरों को कम करने के लिए इसके एक्सपर्ट्स को यूक्रेन जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया है. साथ ही, वे इस बात पर जोर देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून का एक ऐसा हिस्सा मौजूद है जो बताता है कि न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमला नहीं किया जाना चाहिए और इस सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए.

भारत और पाकिस्तान का मामला सबसे अनोखा

बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत और पाकिस्तान का मामला बेहद खास है. ये दोनों देश एक-दूसरे के दुश्मन और न्यूक्लियर हथियारों से लैस पड़ोसी हैं, जिनके बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है. उन्होंने कई युद्ध लड़े हैं और कई मोर्चों पर एक-दूसरे के विरोधी बने हुए हैं, साथ ही कुछ समय से उनके बीच कोई कूटनीतिक बातचीत भी नहीं हुई है. हाल ही में, वे 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के नाम से जाने जाने वाले चार दिवसीय सैन्य टकराव में शामिल थे. फिर भी, तनाव और सक्रिय दुश्मनी के क्षणों में भी, संयम का एक ऐसा पहलू रहा है जो मजबूती से कायम है. न तो भारत और न ही पाकिस्तान ने एक-दूसरे के परमाणु फैसिलिटी को निशाना बनाया.

भारत और पाकिस्तान ने ग्लोबल ट्रीटी ऑन द नॉन-प्रोलिफरेशन ऑफ न्यूक्लियर वेपन्स (NPT) पर साइन नहीं किए हैं. हालांकि वे 31 दिसंबर 1988 को साइन किए गए न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन और फैसिलिटीज पर हमले पर रोक लगाने के एग्रीमेंट से बंधे हैं. यह एग्रीमेंट, जो प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पीएम बेनजीर भुट्टो की लीडरशिप से जुड़ा था, जनवरी 1991 में लागू हुआ. इसका मेन कमिटमेंट साफ है. दोनों पक्ष वादा करते हैं कि वे दूसरे देश में न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन को नुकसान पहुंचाने या खत्म करने के मकसद से कोई भी एक्शन नहीं लेंगे, उसे बढ़ावा नहीं देंगे, या उसमें हिस्सा नहीं लेंगे.

इस एग्रीमेंट के सबसे अहम ऑपरेशनल एलिमेंट्स में से एक न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन की लिस्ट का सालाना एक्सचेंज है. हर साल 1 जनवरी को, भारत और पाकिस्तान एक साथ नई दिल्ली और इस्लामाबाद में डिप्लोमैटिक चैनलों के ज़रिए इन लिस्ट का एक्सचेंज करते हैं. यह प्रैक्टिस 1992 में शुरू हुई थी और बिना किसी रुकावट के जारी है. 2026 में भी दोनों देशों ने ऐसी लिस्ट का लगातार 35वां एक्सचेंज पूरा किया.

भारत-पाक हर साल शेयर करते हैं न्यूक्लियर फैसिलिटी की लिस्ट

इन लिस्ट में सिविलियन न्यूक्लियर फैसिलिटी शामिल हैं, जिनमें पावर रिएक्टर, रिसर्च फैसिलिटी, फ्यूल फैब्रिकेशन यूनिट और दूसरे लिस्टेड एटॉमिक इंस्टॉलेशन शामिल हैं. लिस्ट को इतनी क्लैरिटी के साथ शेयर किया जाता है कि हर पक्ष किसी भी झगड़े की स्थिति में इन इंस्टॉलेशन को पहचान सके और उनसे बच सके. इस मैकेनिज्म ने एक ऐसे रिश्ते में भी अंदाजा लगाने की क्षमता और भरोसा बनाया है जो पहले से ही तनावपूर्ण था.

पूर्व राजदूत और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य डी बी वेंकटेश वर्मा इसकी अहमियत को लेकर कहते हैं, 'न्यूक्लियर नॉन-अटैक पर भारत-पाक एग्रीमेंट दुनिया में अनोखा है. ग्लोबल न्यूक्लियर ऑर्डर में ऐसा कमिटमेंट काफी रेयर होता है. 

UN को भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व राजदूत सैयद अकबरुद्दीन भी इस एग्रीमेंट को दोनों ओर से अनोखा बताते हैं. उन्होंने कहा कि दुनिया खतरनाक ट्रेंड देख रही है, जिसमें न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन को सीधे या इनडायरेक्टली खतरे में डाला जा रहा है. लेकिन भारत-पाकिस्तान इससे इतर है जो दशकों से काम कर रहा है. खास बात यह है कि यह समझौता बहुत बड़े संकट और तनाव के समय में भी बना रहा. यह एग्रीमेंट दोनों देशों को लिस्टेड न्यूक्लियर फैसिलिटी के खिलाफ फोर्स का इस्तेमाल न करने के लिए मजबूर करता है और यह पक्का करता है कि जानकारी का सालाना एक्सचेंज प्रैक्टिकल तरीके से उस समझौते को मजबूत करे.

अकबरुद्दीन ने बताया कि 1990 के दशक के आखिर में इस्लामाबाद में अपने समय के दौरान, उन्होंने खुद सालाना एक्सचेंज में हिस्सा लिया था. उस समय यह रूटीन लगता था, लेकिन अब पीछे मुड़कर देखने पर इसका महत्व साफ है. इसने एक स्थाई और भरोसेमंद तरीका बनाया है जो न्यूक्लियर डोमेन में बढ़ने से रोकता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी, जब तनाव बहुत ज्यादा था और मिलिट्री एक्शन चल रहा था, न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन को टारगेट न करने का यह सिद्धांत बना रहा.

भारत-पाकिस्तान मॉडल दुनिया के लिए मिसाल

भारत-पाकिस्तान मॉडल स्थिरता की एक दुर्लभ मिसाल पेश करता है. दोनों देशों के बीच अक्सर तनाव की स्थिति रहती है, इसके बाद भी दोनों देशों ने दिखाया है कि लगातार संयम बरतना मुमकिन है. हर साल लिस्ट का आदान-प्रदान, हमला न करने का साफ वादा और तीन दशकों से ज्यादा समय से परमाणु हमले न करने के समझौते का उल्लंघन न होना, ये सब एक सही ढंग से काम कर रहे सिस्टम की ओर इशारा करते हैं.

आने वाले सालों में जब भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को काफी बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना बना रहा है, तो ऐसे सुरक्षा उपाय और भी अहम हो जाते हैं. ये जोखिम को कम करते हैं, निवेशकों और बीमा कंपनियों की चिंताओं को दूर करते हैं और यह पक्का करते हैं कि टकराव से अहम बुनियादी ढांचे को नुकसान न पहुंचे.

अकबरुद्दीन ने एक और बड़ी बात की ओर भी किया. उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान ने आम नागरिकों के इलाकों को निशाना बनाने से भी परहेज किया है. हालांकि वे दोनों देशों के रिश्तों की जटिलताओं को मानते हैं, लेकिन वे परमाणु क्षेत्र को एक ऐसे दायरे के तौर पर देखते हैं जहां से सकारात्मक सबक लिए जा सकते हैं. ऐसी दुनिया में जहां परमाणु फैसिलिटी पर खतरा बढ़ रहा है, संयम बरतने का विचार और भी अहम हो जाता है.

भारत-पाकिस्तान समझौता दोनों देशों के बीच के सभी मुद्दों को हल नहीं करता है. यह न तो टकराव को खत्म करता है और न ही तनाव को मिटाता है. लेकिन यह दिखाता है कि दुश्मनी भरे रिश्तों में भी, खास और केंद्रित समझौते लंबे समय तक चलने वाली स्थिरता ला सकते हैं. जैसे-जैसे दुनिया भर में परमाणु जोखिम बढ़ रहे हैं, यह सबक बहुत कीमती साबित हो सकता है.

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लेखक के बारे में
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पल्लव बागला
विज्ञान संपादक
Pallava Bagla. A highly respected voice on Indian television, he is a leading Indian science communicator, widely respected for his deep understanding... और पढ़ें
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