- अमेरिका-ईरान पीस डील के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 5% गिरकर 82-83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया.
- इसके बावजूद तेल कंपनियों को LPG पर 700, डीजल पर 27 और पेट्रोल पर 3 रुपये प्रति यूनिट अंडर-रिकवरी हो रही है.
- लिहाजा फिलहाल पेट्रोल, डीजल और LPG के दामों में तुरंत राहत की संभावना कम दिख रही हैं.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के एलान के बाद तेल बाजार में राहत का माहौल बना है और सोमवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 5 फीसदी टूटकर 82-83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. इसके साथ ही दुनिया के कई शेयर बाजारों में भी तेजी लौटती दिखाई दे रही है.
लेकिन पिछले 108 दिनों से कच्चे तेल और गैस की बढ़ी हुई कीमतों के असर से भारतीय तेल कंपनियां अब भी जूझ रही हैं. सोमवार को पेट्रोलियम मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने बताया कि तेल कंपनियां आज भी भारी अंडर-रिकवरी का सामना कर रही हैं.
स्थिति यह है कि हर LPG सिलेंडर पर करीब 700 रुपये की अंडर-रिकवरी बनी हुई है. वहीं हर लीटर डीजल पर लगभग 27 रुपये और हर लीटर पेट्रोल पर करीब 3 रुपये की अंडर-रिकवरी है.

भारत के ऑयल रिफाइनरी
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कीमतें बढ़ाए जाने के बाद भी घाटे में हैं तेल कंपनियां
कई दौर की कीमत बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियां पूरी लागत वसूल नहीं कर पा रही हैं.
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पिछले सप्ताह तक देश की सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और LPG बेचने पर हर दिन करीब 652 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा था. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई ताजा गिरावट का फायदा तुरंत ग्राहकों तक पहुंचता दिखाई नहीं दे रहा है.
एलपीजी की स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. अनुमान है कि घरेलू LPG पर अंडर-रिकवरी एक साल पहले के 41,338 करोड़ रुपये से बढ़कर अब करीब 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है.
लेकिन सवाल वही है जो हर भारतीय के मन में है- क्या अब पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम कम होंगे? फिलहाल इसका जवाब इतना आसान नहीं है.
दरअसल, पिछले 108 दिनों से मध्यपूर्व एशिया में जारी संघर्ष का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर पड़ा है. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल, 50 फीसदी LNG और 60 फीसदी LPG विदेशों से खरीदता है. युद्ध के दौरान तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई, जिससे आयात का खर्च तेजी से बढ़ गया.
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सरकार ने वित्तीय बोझ उठाया
युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने तेल और गैस खरीदने के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया. सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर नए देशों और नए बाजारों से पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने शुरू किए ताकि देश में सप्लाई बनी रहे. लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी, क्योंकि नए रास्तों और नए स्रोतों से आयात करना पहले की तुलना में काफी महंगा साबित हुआ.
इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद भारतीय तेल कंपनियों पर दबाव अभी भी बना हुआ है.
सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिए पहले ही बड़ा वित्तीय बोझ उठाया है. मध्यपूर्व संकट के दौरान बढ़ी हुई कीमतों का असर सीधे जनता पर न पड़े, इसके लिए सरकार ने शुरुआती 78 दिनों में तेल कंपनियों को करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये की सहायता दी. इसमें पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती भी शामिल थी, जिससे सरकार ने अपना टैक्स राजस्व कम करके कंपनियों के घाटे को कम करने की कोशिश की.
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क्या तेल की कीमतों में कटौती की उम्मीदें हैं?
हालांकि अब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नीचे आ रही हैं, तो उम्मीद जरूर बढ़ी है कि आने वाले हफ्तों में हालात और बेहतर हो सकते हैं. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कंपनियां पहले अपने घाटे की भरपाई पर ध्यान देंगी. ऐसे में पेट्रोल, डीजल और LPG के दामों में तत्काल बड़ी राहत मिलने की संभावना सीमित दिखाई देती है.
यानी कच्चा तेल सस्ता होने की खबर अच्छी जरूर है, लेकिन आम आदमी की जेब तक इसका फायदा पहुंचने में अभी थोड़ा वक्त लग सकता है.
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