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कहां पहुंची है सरकार और मेटा की बातचीत, किन मुद्दों पर फंसा हुआ है पेंच

पेपरलीक के विरोध में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच कुछ सोशल मीडिया पोस्ट पर विवाद हो गया था. मेटा ने पीएम मोदी का एक वीडियो हटा दिया था. उसने इसे तकनीकी गलती बताते हुए माफी मांगी थी. मेटा और सरकार में सोशल मीडिय पर कंटेट को लेकर बातचीत चल रही है.

कहां पहुंची है सरकार और मेटा की बातचीत, किन मुद्दों पर फंसा हुआ है पेंच
नई दिल्ली:

वाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे मैसेजिंग और सोशल मीडिया प्लेटफार्म चलाने वाली कंपनी मेटा और सरकार के बीच बातचीत दूसरे सप्ताह में पहुंच गई है. अब यह विवाद कुछ अहम सवालों पर केंद्रित हो गया है. इनमें सबसे बड़ा सवाल है कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक या गैरकानूनी कंटेंट की निगरानी में इंसानों की कितनी भूमिका होनी चाहिए. सवाल यह भी है कि कंटेंट की समीक्षा करने वाले कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं, भारतीय राजनीति और स्थानीय परिस्थितियों की कितनी समझ होनी चाहिए. डीपफेक यानी नकली या बदली हुई तस्वीरों (मॉर्फ्ड फोटो) और वीडियो पर किस तरह का लेबल लगाया जाए, गैरकानूनी कंटेंट कितनी जल्दी हटाया जाए और क्या मेटा का कंटेंट सुझाने वाला सिस्टम उसकी कानूनी जिम्मेदारी बढ़ा सकता है. सरकार और मेटा के बीच बातचीत इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द चल रही है.

इस मामले से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक कानूनी विशेषज्ञों की राय सरकार की शक्तियों और मेटा की जिम्मेदारियों को लेकर अलग-अलग है. लेकिन ज्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि असली विवाद इस सवाल पर है कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खुद किसी कंटेंट को लोगों तक पहुंचाने और ज्यादा लोगों को दिखाने का काम करता है, तो उसे कितनी कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए. सवाल यह भी है कि क्या किसी पोस्ट को अपने आप लोगों तक पहुंचाने वाला एल्गोरिदम प्लेटफॉर्म को 'प्रकाशक'(एडमिन) बना सकता है? क्या सरकार मौजूदा कानून के तहत इंसानी निगरानी और एल्गोरिदम की जांच अनिवार्य कर सकती है? क्या जल्द से जल्द कंटेंट हटाने की शर्त अभिव्यक्ति की आजादी और उचित कानूनी प्रक्रिया के साथ संतुलित की जा सकती है?

मेटा की ओर से भारतीय भाषाओं में कंटेंट की निगरानी के लिए किए जा रहे निवेश, डीपफेक पर लेबल लगाने के कानूनी और संवैधानिक असर और दुनिया भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी जिम्मेदारी में हो रहे बदलाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

इस पूरे विवाद से जुड़े पांच प्रमुख कानूनी और नीतिगत सवाल ये हैं-

सवालों के घेरे में मेटा का एल्गोरिदम

सरकार की जांच का सबसे अहम हिस्सा यह है कि क्या मेटा अभी भी भारतीय कानून के तहत सोशल मीडिया मध्यस्थ यानी इंटरमीडियरी के रूप में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की शर्तें पूरी करता है. इस मामले से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सरकार यह जांच रही है कि मेटा इंटरमीडियरी से जुड़ी कानूनी शर्तों का पालन कर रहा है या उसके काम करने के कुछ तरीके उसकी 'सेफ हार्बर' सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं.

सरकार का तर्क है कि अगर कोई प्लेटफॉर्म यह तय करता है कि किस व्यक्ति को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाएगा, तो यह कुछ हद तक प्रकाशक की भूमिका निभाने जैसा हो सकता है. यही सवाल तब भी उठता है जब मेटा का सिस्टम यह तय करता है कि किस यूजर को कौन-सी पोस्ट दिखाई जाए या किसी पैसे देकर प्रचारित कंटेंट को ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए.
अधिकारियों का कहना है कि अगर प्लेटफॉर्म खुद यह तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट लोगों को दिखाया जाएगा, तो उन्हें उसके लिए जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए.

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपर गुप्ता सरकार की इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 79(2)(b) में किसी सूचना को किस व्यक्ति तक पहुंचाया जाए, इस बारे में इंसानी चुनाव की बात है. जबकि आज के ऑटोमेटेड एल्गोरिदम लाखों पोस्ट को यूजर की पसंद और गतिविधियों के आधार पर तय नियमों के मुताबिक रैंक करते हैं. गुप्ता के मुताबिक, अगर ऑटोमेटेड रिकमेंडेशन को कंटेंट चुनने के बराबर मान लिया गया तो इसका असर केवल मेटा पर नहीं पड़ेगा. इससे सर्च इंजन की रैंकिंग, स्पैम फिल्टर, ऐप स्टोर और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के रिकमेंडेशन सिस्टम भी कानूनी सुरक्षा खो सकते हैं. उनका कहना है कि भारतीय कानून में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए अलग से 'पब्लिशर' की श्रेणी नहीं है. कानून के मुताबिक प्लेटफॉर्म को उसके काम करने के तरीके के आधार पर इंटरमीडियरी माना जाता है.गुप्ता के मुताबिक, अगर मेटा को धारा 79 के तहत मिलने वाली सुरक्षा नहीं मिलती है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि वह अपने आप 'पब्लिशर' बन जाएगा. बल्कि उसे सामान्य कानूनी जिम्मेदारी का सामना करना पड़ सकता है.

सरकार का कहना है कि भारत में काम करने वाली कंपनियों को भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा.

सरकार का कहना है कि भारत में काम करने वाली कंपनियों को भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा.
Photo Credit: PTI

टेक-पॉलिसी की स्वतंत्र शोधकर्ता ज्योति पांडे का कहना है कि इंटरमीडियरी से जुड़े कानून मूल रूप से टेक कंपनियों को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए थे. उस समय प्लेटफॉर्म को केवल एक निष्क्रिय माध्यम या 'डंब पाइप' माना जाता था, जो केवल लोगों की सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है. भारत में भी यह सुरक्षा कुछ शर्तों पर मिलती है. अगर किसी प्लेटफॉर्म को कानून के तहत बताए गए गैरकानूनी कंटेंट की जानकारी मिलती है तो उसे तय समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होती है. पांडे के मुताबिक दुनिया भर में इंटरमीडियरी की कानूनी जिम्मेदारी लगातार बदल रही है. मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी प्लेटफॉर्म का रिकमेंडेशन सिस्टम केवल कंटेंट को होस्ट कर रहा है या वह गैरकानूनी सामग्री को खुद चुनने, प्राथमिकता देने और ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का काम भी कर रहा है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की अभिव्यक्ति क्या है

अमेरिका में TikTok से जुड़े एक मामले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां अदालतों ने यह सवाल भी देखा है कि एल्गोरिदम द्वारा की गई रिकमेंडेशन क्या खुद प्लेटफॉर्म की अभिव्यक्ति मानी जा सकती है. हालांकि अमेरिका और भारत के कानून अलग हैं. अमेरिका में Section 230 के तहत दूसरे लोगों द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए प्लेटफॉर्म को सुरक्षा मिलती है. लेकिन यह सुरक्षा प्लेटफॉर्म की अपनी रिकमेंडेशन या अभिव्यक्ति से जुड़े मामलों में हमेशा लागू नहीं होती.
अधिकारियों ने कहा कि सरकार केवल यह नहीं देख रही कि यूजर क्या पोस्ट करते हैं, बल्कि यह भी देख रही है कि मेटा के सिस्टम उस कंटेंट के साथ क्या करते हैं. हालांकि, किसी प्लेटफॉर्म को इंटरमीडियरी माना जाए या पब्लिशर, इसका अंतिम फैसला अदालतों को करना होगा.

क्या इंसान के जरिए कंटेट की समीक्षा अनिवार्य हो सकती है

क्या सरकार इंसानी समीक्षा अनिवार्य कर सकती है? क्या कंटेंट की समीक्षा करने वालों को भारतीय भाषाएं और राजनीति समझनी चाहिए? बातचीत में सरकार की सबसे प्रमुख मांग कंटेंट मॉडरेशन में इंसानों की ज्यादा भागीदारी की है.
सरकार का मानना है कि केवल ऑटोमेटेड सिस्टम कई बार यह समझने में असफल हो सकते हैं कि कोई कंटेंट वास्तव में खतरनाक या गैरकानूनी है या वह राजनीतिक व्यंग्य, टिप्पणी अथवा सामान्य अभिव्यक्ति हैं. इसलिए सरकार चाहती है कि कंटेंट की समीक्षा करने वाले लोगों को भारतीय भाषाओं, भारतीय राजनीति और देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की अच्छी समझ हो. खास तौर पर जब किसी प्रमुख नेता या सार्वजनिक व्यक्ति से जुड़ा कंटेंट हो, तब सरकार इंसानी निगरानी चाहती है. अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे मामलों में ऑटोमेटेड कार्रवाई से पहले इंसान द्वारा कंटेंट की समीक्षा होनी चाहिए. प्रमुख हस्तियों से जुड़े कंटेंट की समीक्षा में कम से कम दो लोगों को शामिल करने की मांग भी की गई है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारतीय भाषाओं, राजनीति और स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी रखने वाले लोगों की जरूरत इसलिए है क्योंकि ऑटोमेटेड सिस्टम कई ऐसी बारीकियों को नहीं समझ सकते जिन्हें भारत की परिस्थितियों से परिचित इंसान आसानी से समझ सकता है. वहीं अपर गुप्ता का कहना है कि मौजूदा आईटी कानून के तहत सरकार कुछ हद तक इंसानी निगरानी अनिवार्य कर सकती है, लेकिन इससे आगे जाने की उसकी कानूनी शक्ति पर सवाल उठते हैं. उनके मुताबिक, आईटी कानून का नियम 4(4) कुछ विशेष प्रकार के कंटेंट, जैसे बलात्कार और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी तस्वीरों के मामले में ऑटोमेटेड टूल्स के इस्तेमाल के साथ इंसानी निगरानी की बात करता है.

नियम 4(1)(ए) के तहत बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भारत में रहने वाले मुख्य अनुपालन अधिकारी की भी व्यवस्था है. लेकिन गुप्ता का कहना है कि मौजूदा कानून हर ऑटोमेटेड फैसले की इंसान से समीक्षा अनिवार्य नहीं करता.
उनके मुताबिक सरकार को प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम की रैंकिंग वेट या पूरा सोर्स कोड मांगने का अधिकार भी मौजूदा कानून से स्पष्ट रूप से नहीं मिलता. सरकार का कहना है कि इंसानी हस्तक्षेप केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए. समीक्षा करने वाले व्यक्ति में भारतीय संदर्भ और परिस्थितियों को समझने की क्षमता होनी चाहिए. यह मुद्दा तब और महत्वपूर्ण हो गया जब सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी एक पोस्ट पर मेटा की कार्रवाई पर आपत्ति जताई.

प्लेटफार्म और सरकार के नियम अलग-अलग हों तो

अगर कोई कंटेंट मेटा की नीति का उल्लंघन नहीं करता लेकिन भारतीय कानून तोड़ता है, तो मेटा की क्या जिम्मेदारी है?

सरकार ने ऐसे कंटेंट को लेकर भी चिंता जताई है, जो मेटा की अपनी कम्युनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन नहीं करता, लेकिन भारतीय कानून के तहत समस्या पैदा कर सकता है. अधिकारियों के मुताबिक, बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री यानी CSAM, सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली सामग्री और अन्य संभावित गैरकानूनी कंटेंट इस चर्चा का हिस्सा हैं. सरकार का कहना है कि मेटा की अपनी कम्युनिटी गाइडलाइन यह तय नहीं कर सकती कि कोई कंटेंट भारतीय कानून के तहत कानूनी है या गैरकानूनी.

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सरकार ने मेटा को स्पष्ट किया है कि वह भारत में काम करता है और उसे भारतीय कानून का पालन करना ही होगा, भले ही किसी खास पोस्ट ने मेटा की अपनी कम्युनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन न किया हो. हालांकि अधिकारियों ने यह भी माना कि सरकार द्वारा चिन्हित हर कंटेंट जरूरी नहीं कि गैरकानूनी ही हों.

हैदराबाद में दर्ज एक एफआईआर से जुड़े कुछ मामलों में अधिकारियों के मुताबिक ज्यादातर कंटेंट कानूनी आदेशों के बाद हटा दिया गया. लेकिन कुछ कंटेंट मेटा की नीतियों का उल्लंघन नहीं करते थे. कुछ यूजर्स पर कथित रूप से बदली हुई तस्वीरें यानी मॉर्फ्ड फोटो पोस्ट करने के मामले दर्ज किए गए. कुछ मामलों में डीपफेक थे, जबकि कुछ में राजनीतिक व्यंग्य था. राजनीतिक व्यंग्य को मेटा की फ्री-स्पीच नीति के तहत सुरक्षा मिल सकती है. मेटा ने कहा कि वह संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है.इस मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, ज्यादातर चिन्हित कंटेंट हटा दिया गया, लेकिन जिन पोस्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या राजनीतिक व्यंग्य का मामला था, उन्हें नहीं हटाया गया.

यही अंतर सरकार की इंसानी समीक्षा पर जोर देने की मांग को और मजबूत करता है. अपर गुप्ता का कहना है कि आईटी कानून के अलावा मेटा की भारत में अपने यूजर्स के प्रति पारदर्शिता और जवाबदेही की भी जिम्मेदारी है. उन्होंने भारतीय भाषाओं में कंटेंट की समीक्षा के लिए मेटा के निवेश पर भी सवाल उठाया. उनका दावा है कि कंपनी के पास अंग्रेजी भाषा के गलत सूचना वाले कंटेंट की पहचान के लिए ज्यादा संसाधन हैं. हालांकि, गुप्ता का यह भी कहना था कि ऑनलाइन सूचना व्यवस्था की सभी समस्याओं के लिए केवल टेक कंपनियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. सरकार और उसकी नीतियों की भी इसमें भूमिका है. वहीं सरकार का कहना है कि मामला केवल मेटा की अपनी नीतियों का नहीं बल्कि भारतीय कानून के तहत उसकी जिम्मेदारियों का है.

डीपफेक पर किस तरह का लेबल होना चाहिए?

डीपफेक सरकार की चिंताओं का एक बड़ा मुद्दा है. डीपफेक में तस्वीर, वीडियो या ऑडियो को तकनीक और AI की मदद से इस तरह बदला जाता है कि वह असली दिखाई दें. अधिकारियों के मुताबिक सरकार मेटा के बदले हुए और कृत्रिम तरीके से बनाए गए कंटेंट पर लेबल लगाने की व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. सरकार का कहना है कि मेटा ने अभी तक इस दिशा में आंशिक कदम उठाए हैं और कंपनी ने प्रमुख हस्तियों पर ज्यादा ध्यान देने की बात कही है. लेकिन सरकार का मानना है कि डीपफेक की समस्या केवल कुछ बड़े नेताओं या मशहूर लोगों तक सीमित नहीं हो सकती. इसलिए मेटा को डीपफेक के खिलाफ ज्यादा व्यापक व्यवस्था बनाने को कहा गया है. सरकार का मानना है कि डीपफेक तेजी से फैल सकते हैं और इससे कानून-व्यवस्था, राजनीतिक बहस और लोगों के भरोसे पर असर पड़ सकता है. सरकार यह भी देख रही है कि मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं और क्या एल्गोरिदम की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए.

अपर गुप्ता का कहना है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर पहले से ही कंटेंट को लेबल करने की व्यवस्था मौजूद है. उन्होंने फरवरी 2026 में आईटी कानून में किए गए बदलावों का भी उल्लेख किया. इन बदलावों में AI से बनाए गए या बदले गए कंटेंट से जुड़े नियम शामिल किए गए हैं. उनके मुताबिक, नए नियमों में ऐसे कंटेंट पर प्रमुख रूप से लेबल लगाने और उसके स्रोत से जुड़ी स्थायी जानकारी रखने की व्यवस्था की गई है. बड़े प्लेटफॉर्म को कुछ मामलों में यूजर द्वारा दी गई जानकारी को प्रकाशित करने से पहले सत्यापित करना भी जरूरी किया गया है.

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने इन नियमों पर चिंता जताते हुए कहा है कि गलत तकनीकी पहचान के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.

Meta PM Modi Facebook Post

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सरकार यह भी विचार कर रही है कि एल्गोरिदम की स्वतंत्र जांच को सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए या नहीं.दोनों पक्षों की तकनीकी टीमें मेटा की ऑटोमेटेड मॉडरेशन व्यवस्था, डीपफेक की पहचान और उन्हें लेबल करने की प्रक्रिया पर आगे चर्चा करेंगी.

क्या सरकार 3 घंटे में कंटेंट हटाने के लिए कह सकती है 

सरकार ने गैरकानूनी कंटेंट को तेजी से हटाने की अपनी मांग दोहराई है.फरवरी 2026 में आईटी कानून में बदलाव के बाद कुछ परिस्थितियों में तीन घंटे के भीतर कंटेंट हटाने की व्यवस्था चर्चा में है. सरकार का कहना है कि गैरकानूनी कंटेंट, खासकर डीपफेक और AI से बनाए गए कंटेंट, बहुत तेजी से फैल सकते हैं. इसलिए उन पर जल्द कार्रवाई जरूरी है.
मेटा के साथ बातचीत में भी तीन घंटे की समय सीमा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. सरकार का कहना है कि बड़े प्लेटफॉर्म के पास ऐसी कार्रवाई के लिए जरूरी तकनीक और संसाधन मौजूद हैं. लेकिन दूसरी ओर सवाल यह है कि इतनी कम समय सीमा में कोई प्लेटफॉर्म कानूनी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील कंटेंट की सही तरीके से जांच कैसे करेगा.

यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी चुनौती है, सरकार तेजी से कार्रवाई चाहती है, लेकिन साथ ही इंसानी समीक्षा और भारतीय परिस्थितियों की बेहतर समझ भी चाहती है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि तीन घंटे की समय सीमा संशोधित नियमों के तहत बताए गए विशेष गैरकानूनी कंटेंट को हटाने से जुड़े निर्देशों पर लागू होती है.

टेक-पॉलिसी शोधकर्ता ज्योति पांडे के मुताबिक, इंटरमीडियरी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा कुछ शर्तों पर निर्भर करती है. इनमें तय समय सीमा के भीतर कुछ प्रकार के गैरकानूनी कंटेंट पर कार्रवाई करना भी शामिल है. वहीं अपर गुप्ता का कहना है कि सरकार इंटरमीडियरी से जुड़े नियमों के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कई पहलुओं को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है.इससे सरकार की नियामक शक्तियों की सीमा को लेकर सवाल उठते हैं. हालांकि तीन घंटे की समय सीमा अब संशोधित नियमों का हिस्सा है. सरकार ने कहा है कि वह प्लेटफॉर्म से इसका पालन चाहती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी पोस्ट पर मेटा की कार्रवाई के बाद इंसानी समीक्षा की मांग और तेज हो गई. मेटा के चीफ ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल कपलान ने इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी की पोस्ट को प्रतिबंधित करने की गलती के लिए केंद्रीय मंत्री से मेटा की ओर से माफी मांगी थी.

क्या सरकार दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों से करेगी पूछताथ

सरकार अब व्यापक व्यवस्था पर विचार कर रही है. सरकार की जांच केवल मेटा तक सीमित नहीं है. अधिकारियों के मुताबिक दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है. सरकार यह देखना चाहती है कि ये प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत इंटरमीडियरी की परिभाषा में आते हैं या नहीं और क्या वे इस स्थिति से जुड़ी कानूनी जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं. सरकार के मुताबिक यह मामला केवल सरकार और एक टेक कंपनी के बीच विवाद नहीं है. इसका संबंध भारत में काम करने वाले सभी बड़े वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से है.

सरकार का कहना है कि भारत में काम करने वाली वैश्विक कंपनियों को देश के कानून और संविधान का सम्मान करना होगा. उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कानून लागू करने के नाम पर वैध और उचित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक रोक न लगे. अधिकारियों के मुताबिक कानून का शासन और संविधान सरकार के दृष्टिकोण के केंद्र में हैं. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोगों का भरोसा बनाए रखना भी बेहद जरूरी है.

मेटा के वैश्विक स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ दो दौर की बैठक हो चुकी है. अब बातचीत का अगला चरण मेटा की भारत और तकनीकी टीमों के बीच होगा. इन बैठकों में कंटेंट मॉडरेशन, इंसानी निगरानी, डीपफेक से सुरक्षा और ऑटोमेटेड सिस्टम के फैसलों पर तकनीकी नियंत्रण जैसे मुद्दों पर आगे चर्चा होगी.

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