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ईरान के सुप्रीम नेता खामेनेई की मौत की भारत ने निंदा क्यों नहीं की?

सरकारी सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी परमाणु समझौते की वार्ता के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने IAEA (2005, 2006 और 2009) में ईरान के खिलाफ तीन बार मतदान किया था. तब भारत पर दबाव डालने के लिए तेहरान ने 1 लाख करोड़ रुपये के एलएनजी सौदे को लेकर धमकियां दी थीं.

ईरान के सुप्रीम नेता खामेनेई की मौत की भारत ने निंदा क्यों नहीं की?
भारत के साथ खामेनेई का इतिहास विवादों से भरा रहा है.
  • ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत सरकार ने संयम और तनाव कम करने की अपील की है
  • अमेरिका, इजरायल और कई पश्चिमी देशों ने खामेनेई की मौत पर नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की और शोक नहीं जताया
  • मुस्लिम देशों और खाड़ी सहयोगी देशों ने या तो चुप्पी साधी या सीमित शोक संवेदना व्यक्त की है

1 मार्च, 2026 को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने भारत में राजनीतिक बहस छेड़ दी है. विपक्ष सरकार से औपचारिक शोक संवेदना की मांग कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के बीच संयम और तनाव कम करने की अपील करते हुए चुप्पी साध रखी है. यह रुख अधिकांश प्रमुख वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया को दर्शाता है, जिन्होंने या तो चुप्पी साध रखी है या फिर लंबे समय तक सत्ता में रहे ईरानी नेता के निधन का खुलेआम जश्न मनाया है.

किन देशों ने खुशी मनाई

अब तक दुनिया भर से आई प्रतिक्रियाओं में एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है. जी7 देशों में से किसी ने खामेनेई की मौत पर शोक संवेदना व्यक्त नहीं की है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई को "इतिहास के सबसे दुष्ट लोगों में से एक" बताया. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने घोषणा की, "47 वर्षों तक खामेनेई शासन ने 'इजरायल मुर्दाबाद' के नारे लगाए. न्याय मिल गया है." अर्जेंटीना के जेवियर मिलेई ने उन्हें "अब तक के सबसे दुष्ट, हिंसक और क्रूर व्यक्तियों में से एक" करार दिया. यूक्रेन की सरकार ने पोस्ट किया, "तानाशाह की मौत से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता." ब्रिटेन के रक्षा सचिव जॉन हीली ने कहा कि एक "दुष्ट शासन" के नेता की मौत पर शायद ही कोई शोक मनाएगा. ऑस्ट्रेलिया के एंथोनी अल्बानीज ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों और परोक्ष समर्थन का हवाला दिया, जबकि फ्रांस की सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि वे "केवल उनकी मौत से ही संतुष्ट हो सकते हैं." कनाडा के मार्क कार्नी ने ईरान को मध्य पूर्व में "अस्थिरता का मुख्य स्रोत" बताया.

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यूरोपीय संघ की काजा कल्लास तटस्थ रहीं और इसे एक संभावित रूप से बदले हुए ईरान के लिए "निर्णायक क्षण" के रूप में बताया.

मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया

खाड़ी देशों, जो भारत के प्रमुख सहयोगी हैं और 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की मेजबानी करते हैं, ने या तो शत्रुतापूर्ण प्रतिक्रिया दी या चुप्पी साधे रखी. सऊदी अरब ने ईरान के हमलों के खिलाफ जीसीसी की आपातकालीन बैठक के दौरान मौन धारण किया. ईरान के मिसाइल हमले का शिकार हुए संयुक्त अरब अमीरात ने तेहरान में अपना दूतावास बंद कर दिया और अपने राजदूत को वापस बुला लिया. जापान और जर्मनी ने स्थिरता और तनाव बढ़ने पर चिंता व्यक्त की, लेकिन शोक संदेश जारी नहीं किया. इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के 57 सदस्यों में से 10 से भी कम देशों ने शोक व्यक्त किया—ये शोक संदेश ईरान के सहयोगी देशों जैसे रूस (व्लादिमीर पुतिन ने इसे "घृणित हत्या" कहा), चीन (विदेश मंत्री वांग यी ने हत्या को "अस्वीकार्य" बताया), उत्तर कोरिया, शिया-बहुल इराक (तीन दिन का शोक), तुर्की (रेसेप एर्दोगन ने दुख व्यक्त किया), पाकिस्तान (शहबाज शरीफ ने नियमों का उल्लंघन बताया) और मलेशिया में शोक अनवर इब्राहिम तक ही सीमित थे.

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भारत का रुख

भारत का रुख इन राष्ट्रीय हितों से प्रेरित प्रतिक्रियाओं के अनुरूप है. विदेश मंत्रालय ने संयम और संवाद का आग्रह किया और यूएई के सहयोगियों पर ईरान के हमलों की निंदा की. यह ऐसे समय हुआ, जब ईरानी नागरिक तेहरान, कराज, इस्फ़हान और शिराज की सड़कों पर जश्न मना रहे थे. विपक्ष द्वारा भारत की चुप्पी को सांप्रदायिक करार देने की कोशिश को मुस्लिम बहुल देशों में भी समर्थन नहीं मिल रहा है.

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खामेनेई-भारत संबंध

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत के साथ खामेनेई का इतिहास विवादों से भरा रहा है. 2017 से 2024 के बीच उन्होंने चार बार भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया, जिसके चलते विदेश मंत्रालय ने हर बार ईरानी राजदूतों को तलब किया. 2017 में उन्होंने "दबे-कुचले" कश्मीरियों के लिए खामेनेई ने मुसलमानों को एकजुट होने को कहा, जो पाकिस्तान की शैली से मिलता-जुलता था. 2019 में अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद उन्होंने "न्यायपूर्ण नीति" की मांग की. 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान उन्होंने #IndianMuslimsInDanger हैशटैग का इस्तेमाल करते हुए ट्वीट किया कि "चरमपंथी हिंदुओं द्वारा मुसलमानों का नरसंहार" किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने हिंदू पीड़ितों की अनदेखी की और पाकिस्तानी दृष्टिकोण को दोहराया. ईरान की संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम को मुस्लिम विरोधी करार दिया. सितंबर 2024 में उन्होंने 27 लाख फॉलोअर्स को संबोधित एक ट्वीट में भारत की तुलना गाजा और म्यांमार से की, जिसे विदेश मंत्रालय ने "गलत जानकारी" पर आधारित बताया.

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तेल खरीद से तौबा क्यों

सरकारी सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी परमाणु समझौते की वार्ता के दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने IAEA (2005, 2006 और 2009) में ईरान के खिलाफ तीन बार मतदान किया था. तब भारत पर दबाव डालने के लिए तेहरान ने 1 लाख करोड़ रुपये के एलएनजी सौदे को लेकर धमकियां दी थीं. आईएईए में पारित प्रस्तावों में ईरान को समझौते का उल्लंघन करने वाला पाया गया, मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को भेजा गया और कोम में गुप्त रूप से तेल संवर्धन की निंदा की गई. अमेरिकी अधिकारी स्टीफन राडेमेकर ने दबाव डालने की बात स्वीकार की. इन सब के बाद भी एनडीए ने 2022 में मतदान से परहेज किया. जून 2025 में इजरायली हमलों के बाद दक्षिण अफ्रीका परिषद के बयान में भारत ने इजरायल विरोधी प्रस्ताव को खारिज कर दिया और तनाव कम करने का आह्वान किया. 2018 में जेसीपीओ से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद, काटसा और पेमेंट प्रॉब्लम के कारण ही भारत ने ईरानी तेल आयात को 10-12% से घटाकर लगभग शून्य किया.

इजरायल एकजुट

दूसरी ओर, अब तक लड़ रहे इजरायल के विपक्ष ने एकता का उदाहरण पेश किया है. बेनी गैंट्ज ने आईडीएफ/मोसाद की तारीफ करते हुए सुरक्षा संबंधी जानकारी देते हुए कहा, "हम एक राष्ट्र हैं और हमारा एक ही हित है - अस्तित्व." गादी आइजेनकोट ने इसे "लंबे समय से प्रतीक्षित, सुनियोजित कार्रवाई" बताया. संयुक्त संसद ने खतरे को खत्म करने के अधिकार की पुष्टि की; लैपिड-गैंट्ज ने वैश्विक टीवी पर इजरायल की सुरक्षा का समर्थन किया.

राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता

संप्रभु प्रतिक्रियाओं में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जाती है. भारत की संयमित चुप्पी खाड़ी देशों के उन साझेदारों के साथ संबंधों की रक्षा करती है, जिन पर हमला हो रहा है. साथ ही  भारत के मामलों में शत्रुतापूर्ण रवैया रखने वाले खामेनेई की अनदेखी करती है, और वैश्विक लोकतांत्रिक परंपरा का अनुसरण करती है. विपक्ष की मांगें इतिहास और संदर्भ की अनदेखी करती हैं, जिससे अनावश्यक विवाद का खतरा है.

लेखक के बारे में
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अखिलेश शर्मा
Executive Editor, NDTV India
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