उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम का वक्त बचा है. यही नहीं कयास ऐसे भी हैं कि ये चुनाव थोड़ा पहले भी कराए जा सकते हैं. इस बीच सभी दलों ने अपनी तैयारी तेज की है तो वहीं खींचतान भी शुरू है. विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की दावेदारी ही चिंता बढ़ा रही है. यूपी में कांग्रेस के प्रभारी बने राजेंद्र पाल गौतम ने यह करकर सपा को दबाव में लाने का प्रयास किया है कि सीट बंटवारे के लिए बराबरी की बात की जाएगी. इस तरह उन्होंने मजबूत दावेदारी पेश करने की कोशिश की है. सपा का अनुभव 2017 का बेहद खराब रहा है. तब उसने कांग्रेस को 100 सीटें दी थीं और उसे 7 पर ही जीत मिली थी. ऐसे में शायद ही इतनी बड़ी मांग सपा के गलते उतरे.
फिर भी देखना होगा कि दोनों दलों की रस्साकशी कहां जाकर खत्म होती है और सपा-कांग्रेस कितनी सीटों पर चुनाव लड़ते हैं. कांग्रेस ने दबाव बढ़ाने के लिए यहां तक कहा कि हम मायावती का सम्मान करते हैं और बातचीत के लिए खुले हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार कांग्रेस राज्य में 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा ठोक सकती है. वहीं सपा की ओर से अब तक यही संकेत है कि वह कांग्रेस को 70-80 से ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है. साफ है कि सीट बंटवारा आसान नहीं होगा. खासतौर पर अखिलेश यादव यह जरूर चाहेंगे कि सपा ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़े, लेकिन कांग्रेस से दूरी में भी नुकसान का खतरा है. ऐसे में कोई रास्ता निकालना आसान नहीं होगा.
माना जा रहा है कि कांग्रेस ने बराबरी की बात दबाव के लिए की है, लेकिन 200 से 70 तक आने का सफऱ पार्टी कैसे तय करेगी, यह देखना भी दिलचस्प होगा. कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में 6 सीटों पर जीत हासिल की थी और उसका हौसला बढ़ा हुआ है. यही कारण है कि वह बदले स्ट्राइक रेट में अपने सीटें भी ज्यादा चाहती है. 2024 के चुनाव में कांग्रेस को 6 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. एक बात और कि यदि सपा के लिए कांग्रेस जरूरी है तो राहुल गांधी एंड कंपनी को भी साइकिल की सवारी चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि 2022 में अकेले लड़कर भी कांग्रेस ने अपनी ताकत देख ली है, जब उसे महज 2 सीटों पर जीत मिल पाई.
कांग्रेस और सपा दोनों अकेले लड़कर देख चुके, घाटा ही बढ़ा
फिर जब लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ आए तो कांग्रेस को 6 लोकसभा सीटों पर विजय मिल गई. इस तरह कांग्रेस ने भी परख लिया है कि यूपी में वह अकेले किसी भी तरह जीत की स्थिति में फिलहाल नहीं है. वहीं सपा का परफॉर्मेंस भी अलग होकर 2019 के आम चुनाव और 2022 के असेंबली इलेक्शन में खराब रहा था. ऐसे में यदि कांग्रेस के लिए सपा जरूरी है तो वहीं अखिलेश यादव के लिए देश की सबसे पुरानी पार्टी चुनावी मजबूरी है.
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