- नवादा जिले के पान किसान के बेटे रॉकी कुमार ने तीन बार असफलता के बाद बीपीएससी परीक्षा में 880वीं रैंक हासिल की
- रॉकी ने बिना महंगी कोचिंग के गांव में रहकर सेल्फ स्टडी और इंटरनेट स्रोतों से तैयारी की
- आर्थिक संकट के बावजूद रॉकी ने कोचिंग पढ़ाकर परिवार का खर्च संभाला और भाइयों की पढ़ाई में मदद की
Success Story: "तुमसे नहीं हो पाएगा..." यह वह वाक्य है जो किसी भी इंसान के हौसले को तोड़ सकता है. लेकिन बिहार के नवादा जिले के रहने वाले रॉकी कुमार ने इन तानों को अपनी ढाल बनाया और एक नई इबारत लिख दी. तीन बार लगातार असफलता मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. बिना किसी महंगी कोचिंग और बड़े शहर का रुख किए, गांव में रहकर ही सेल्फ स्टडी की. आज वही रॉकी BPSC 70वीं परीक्षा में 880वीं रैंक हासिल कर स्टेट टैक्स असिस्टेंट कमिश्नर बन गए हैं. आइए जानते हैं एक पान किसान के बेटे की शून्य से शिखर तक पहुंचने की पूरी कहानी.
पान किसान के घर से निकला प्रशासनिक अधिकारी
रॉकी के पिता अवध किशोर चौरसिया पेशे से पान किसान हैं. वे केवल नौवीं कक्षा तक ही पढ़ सके और वर्षों से पान की खेती कर परिवार का भरण-पोषण करते आ रहे हैं. उनकी मां बच्ची देवी गृहिणी हैं और वे औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं.
आर्थिक स्थिति मजबूत न होने के बावजूद माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी. जरूरत पड़ने पर उन्होंने अपनी जमीन तक बेच दी, ताकि बेटे बेहतर शिक्षा हासिल कर सकें. रॉकी अपनी इस बड़ी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता के त्याग और अटूट विश्वास को देते हैं.

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Photo Credit: अशोक प्रियदर्शी
गांव के स्कूल से मरीन इंजीनियरिंग तक का सफर
रॉकी ने मैट्रिक की पढ़ाई हाई स्कूल, तुंगी से तथा इंटरमीडिएट बलदेव हाई स्कूल, दानापुर से पूरा किया. इसके बाद उन्होंने कोलकाता के समुद्री विश्वविद्यालय से मरीन इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें मुंबई की एक निजी कंपनी में नौकरी भी मिल गई, लेकिन उनका सपना तो प्रशासनिक सेवा में जाने का था. लिहाजा, छह महीने बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह बीपीएससी की तैयारी में जुट गए.
तीन बार हुए असफल, लेकिन नहीं मानी हार
30 वर्षीय रॉकी का बीपीएससी का यह सफर संघर्षों से भरा रहा. 67वीं बीपीएससी में वे प्रारंभिक परीक्षा के बाद आगे के चरणों तक पहुंचे, लेकिन 68वीं बीपीएससी में पीटी परीक्षा भी पास नहीं कर पाए. 69वीं बीपीएससी में वे पीटी, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम रूप से उनका चयन नहीं हो सका. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. अपनी कमजोरियों का बारीकी से विश्लेषण किया, रणनीति बदली और 70वीं बीपीएससी में 880वीं रैंक हासिल कर स्टेट टैक्स असिस्टेंट कमिश्नर बन गए.

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कोचिंग पढ़ाकर चलाया घर, खुद भी की तैयारी
नौकरी छोड़ने के बाद उनके सामने गहरा आर्थिक संकट था. ऐसे में रॉकी ने गांव के पास स्थित मंझवे और नरहट में कोचिंग पढ़ाना शुरू किया. इसी आय से उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी, परिवार का खर्च संभाला और अपने दोनों छोटे भाइयों की पढ़ाई में भी आर्थिक सहयोग किया. उन्होंने किसी बड़े कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया; बल्कि इंटरनेट, एनसीईआरटी, एम. लक्ष्मीकांत, स्पेक्ट्रम और अन्य मानक पुस्तकों के सहारे सेल्फ स्टडी की तथा सफल अभ्यर्थियों से मार्गदर्शन लेकर अपनी रणनीति मजबूत की.
शादी के बाद बढ़ीं जिम्मेदारियां, लेकिन नहीं डिगा लक्ष्य
वर्ष 2023 में रॉकी का विवाह श्रुति कुमारी से हुआ. श्रुति भी स्नातक तक शिक्षित हैं और घर की जिम्मेदारियां निभाने के साथ स्वयं भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं. इस दंपति का डेढ़ वर्ष का एक बेटा है, जिसका नाम श्रेयस है. रॉकी कहते हैं कि उनकी पत्नी ने हमेशा उनका मनोबल बढ़ाया. परिवार की जिम्मेदारियों और छोटे बच्चे की परवरिश के बीच भी उन्होंने अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटने दिया. उनकी इस सफलता में पत्नी का सहयोग भी बेहद महत्वपूर्ण रहा. रॉकी चार भाइयों में दूसरे स्थान पर हैं. उनके बड़े भाई अजित कुमार बैंक ऑफ बड़ौदा में अधिकारी हैं, जबकि छोटे भाई नूर निरंजन कुमार और विकी कुमार पटना के ए.एन. कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं.
गांव छोड़ने के बजाय गांव में ही रहकर रचा इतिहास
जब बार-बार सफलता नहीं मिल रही थी, तब कई लोग उन्हें पटना या दिल्ली जाकर तैयारी करने की सलाह देते थे. कुछ लोग उनका उपहास भी उड़ाते थे. लोग उनको यहां तक कह देते थे कि बीपीएससी तुमसे नहीं निकल पाएगा. लेकिन उन्होंने गांव नहीं छोड़ा. उन्हें पूरा विश्वास था कि सही रणनीति, अनुशासन और निरंतर मेहनत से गांव में रहकर भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है. आज वही लोग उनकी इस सफलता पर गर्व कर रहे हैं.
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