- मजदूर के संघर्ष को कैनवास पर उतारने वाले तैयब मेहता फिर चर्चा में
- कौन हैं तैयब मेहता? जिनकी पेंटिंग के लिए करोड़पतियों ने लगाई ताबड़तोड़ बोली
- ट्रस्ड बुल के बाद अब ‘रिक्शा पुलर’ ने तोड़ा रिकॉर्ड
भारतीय आधुनिक कला के महान चित्रकार तैयब मेहता एक बार फिर सुर्खियों में हैं. उनकी चर्चित पेंटिंग ‘Rickshaw Puller' आर्ट प्लेटफार्म वोल्टे उना (Volte Una) की पहली नीलामी में 69.1 करोड़ रुपये में बिकी. इसके साथ ही यह कृति तैयब मेहता के लिए विश्व स्तर पर नया नीलामी रिकॉर्ड बन गई और रुपये के हिसाब से नीलामी में बिकने वाली भारतीय कलाकृतियों में चौथी सबसे महंगी कृति बन गई. इस रिकॉर्ड बिक्री ने न केवल कला संग्रहकर्ताओं का ध्यान खींचा है, बल्कि यह सवाल भी चर्चा में ला दिया है कि आखिर तैयब मेहता कौन थे, जिनकी एक पेंटिंग खरीदने के लिए देश और दुनिया के संपन्न संग्रहकर्ताओं के बीच इतनी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिली.
69.1 करोड़ में बिकी ‘रिक्शा पुलर', बना नया रिकॉर्ड
तैयब मेहता की 2002 में बनी एक्रिलिक ऑन कैनवास पेंटिंग ‘रिक्शा पुलर' को आर्ट प्लेटफॉर्म वोल्टे उना की पहली नीलामी में 69.1 करोड़ रुपये में खरीदा गया. इसके साथ ही कलाकार ने अपना ही पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया. इससे पहले अप्रैल 2025 में उनकी पेंटिंग ‘ट्रस्ड बुल' 61.80 करोड़ रुपये में बिकी थी.
यह सिर्फ एक पेंटिंग की बिक्री नहीं, बल्कि भारतीय आधुनिक कला की बढ़ती वैश्विक पहचान का संकेत है. इस नीलामी में बोली 33 करोड़ रुपये से शुरू हुई और कुछ ही घंटों में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई.

भारत के प्रसिद्ध चित्रकार तैयब मेहता
Photo Credit: The Indian Portrait
आखिर कौन थे तैयब मेहता?
तैयब मेहता भारतीय आधुनिक कला आंदोलन के सबसे प्रभावशाली चित्रकारों में गिने जाते हैं. उनका जन्म 1925 में गुजरात के कपड़वंज में हुआ था और बाद में उनका परिवार मुंबई में बस गया. उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा प्राप्त की. वह 1947 में बने प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के शुरुआती सदस्यों में शामिल थे. इस समूह में मकबूल फिदा हुसैन, एफ.एन. सूजा, एस.एच. रज़ा और अकबर पदमसी जैसे दिग्गज कलाकार भी थे. इस समूह ने भारतीय कला को पारंपरिक सीमाओं से निकालकर आधुनिक वैश्विक मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
विभाजन की त्रासदी ने बदल दी कला की दिशा
तैयब मेहता ने भारत विभाजन के दौरान मुंबई की सड़कों पर हुई हिंसा को करीब से देखा था. इस अनुभव का गहरा असर उनकी कला पर पड़ा. उनकी शुरुआती पेंटिंग्स में मानव पीड़ा, हिंसा, संघर्ष और सामाजिक असुरक्षा की झलक स्पष्ट दिखाई देती है. समय के साथ उनकी शैली अभिव्यक्तिवाद (Expressionism) से निकलकर न्यूनतमवादी (Minimalist) रूप में विकसित हुई, लेकिन मनुष्य के संघर्ष का विषय उनकी कला का केंद्र बना रहा.

तैयब मेहता की रिक्श पुलर पेटिंग
Photo Credit: सोशल मीडिया X से स्क्रीनशॉट
क्यों खास है ‘रिक्शा पुलर'?
तैयब मेहता ने 1960 के दशक से कई बार रिक्शा खींचने वाले पात्र को अपनी कला में जगह दी. उनके लिए यह सिर्फ एक श्रमिक नहीं था, बल्कि संघर्ष, शोषण और मानवीय बंधन का प्रतीक था. कला समीक्षक उमा नायर के अनुसार, रिक्शा पुलर की आकृति मेहता की संवेदनशीलता और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाती है. यही वजह है कि अलग-अलग दशकों में बनी उनकी प्रत्येक ‘रिक्शा पुलर' कृति रंगों, संरचना और भावनात्मक गहराई के स्तर पर अलग पहचान रखती है.
करोड़ों में बिकती रही हैं तैयब मेहता की कृतियां
तैयब मेहता भारतीय कला बाजार में रिकॉर्ड बनाने वाले पहले आधुनिक कलाकारों में शामिल रहे हैं. उनकी 1995 की पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन' ने करोड़ों की नीलामी का रास्ता खोला, जबकि ‘महिषासुर' जैसी कृतियों ने भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. हाल के वर्षों में राजा रवि वर्मा और एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग्स ने 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया है, लेकिन तैयब मेहता का नाम आज भी भारतीय आधुनिक कला के सबसे प्रभावशाली और संग्रहणीय कलाकारों में शुमार किया जाता है.
वोल्टे उना की अगली नीलामी नवंबर के अंत में आयोजित होगी, जिसमें प्रसिद्ध हेरविट्ज़ कलेक्शन से एम.एफ. हुसैन की एक कलाकृति पेश की जाएगी
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