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45 डिग्री से अधिक खतरनाक क्यों है 38 डिग्री का तापमान, कब और कहां बन जाता है जानलेवा

कोलकाता मुंबई का 38 डिग्री सेल्सियस तापमान राजस्थान के किसी शहर के 45 डिग्री सेल्सियस तापमान से अधिक खतरनाक क्यों हो जाता है. क्या है वेट बल्ब टेंपरेचर.

45 डिग्री से अधिक खतरनाक क्यों है 38 डिग्री का तापमान, कब और कहां बन जाता है जानलेवा
नई दिल्ली:

मौसम विभाग ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के विदर्भ, बिहार और गुजरात में लू चलने की संभावना जताई है. उत्तर और पश्चिम भारत में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक दर्ज किया जा रहा है. गर्मी के इस मौसम में समुद्र तटीय इलाके में 38 डिग्री सेल्सियस का 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक खतरनाक हो जाता है. इसे तापमान को वेट बल्ब टेंपरेचर कहा जाता है. आइए हम आपको बताते हैं कि क्या है वेट बल्ब टेंपरेचर और यह कहां और कितना खतरनाक हो सकता है. 

कैसे नापा जाता है वेट बल्ब टेंपरेचर

वेट बल्ब टेंपरेचर दरअसल इंसान के शरीर पर तापमान के असर को नापने का एक तरीका है. इसमें तापमान और आर्द्रता को देखा जाता है. इसे नापने के लिए एक थर्मामीटर पर एक गीला कपड़ा लपेट दिया जाता है और उसके ऊपर हवा चलने दी जाती है. इससे पानी सूखता है और थर्मामीटर ठंडा हो जाता है. इस तरह जो अंतिम तापमान मिलता है, उसे ही वेट बल्ब टेंपरेचर कहा जाता है. 

कैसे ठंडा रहता है इंसान का शरीर

इंसान का शरीर आमतौर पर 37 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान ही सहन कर पाता है. इससे अधिक के तापमान में इंसान का शरीर पसीना छोड़कर खुद को ठंडा रखता है. इंसान का शरीर खुद को पसीने के जरिए ठंडा रखता है. लेकिन यह तभी काम करता है, जब वह भाप बन कर उड़ (वाष्पीकृत) जाए. जब केवल गर्मी पड़ती है तो पसीना सूख जाता है, उससे शरीर ठंडा रहता है. वहीं नमी या आर्द्रता युक्त गर्मी में पसीना सूखता नहीं है, इससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है. इसलिए एक तरह के तापमान वाली दो जगहें अलग-अलग महसूस हो सकती हैं. इसमें से एक इंसान के लिए काफी खतरनाक हो सकती है. 

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आर्द्रता या नमी का मतलब होता है कि हवा में पानी की मात्रा पहले से मौजूद है. यह नमी शरीर पर पसीने को सूखने नहीं देती है. ऐसे में अगर पसीना सूख नहीं रहा है तो शरीर का तापमान कम नहीं होगा. ऐसे में पसीना छोड़कर शरीर का ठंडा रखने का तरीका काम नहीं आएगा. यह वेट बल्ब टेंपरेचर ही खतरनाक हो जाता है.

जब वेट बल्ब टेंपरेचर करीब 35 डिग्री सेल्सियस हो जाता है, तो इंसान का शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता है. 
इस स्थिति में शरीर जितनी गर्मी छोड़ता है, उससे अधिक वह अवशोषित करता है. इससे शरीर का तापमान खतरनाक रूप से कम होता है. वेट बल्ब टेपंरेचर गर्मी और नमी की वह सीमा है, जहां से आगे इंसान उच्च तापमान सहन नहीं कर सकता है. इस स्थिति में एक स्वस्थ इंसान भी किसी छायादार जगह पर बैठकर और पानी पीकर भी, ज्यादा देर तक जीवित नहीं रह सकता है.

वेट बल्ब टेंपरेचर भारत में बड़ा खतरा क्यों है

भारत में लू का चलना इन वजहों से खतरनाक हो जाता है. 

  • अधिक तापमान और अधिक नमी, खासकर कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे पूर्वी और समुद्र तटीय इलाकों में.
  • शहरी गर्मी का प्रभाव, जब शहर कंक्रीट और कम हवा की वजह से गर्म हो जाते हैं.
  • निर्माण कार्यों में लगे लोग, खेती-बाड़ी करने वाले और डिलेवरी के काम करने वाले लोग अधिक समय तक खुले में काम करते हैं.
  • सबके लिए एयरकंडीशनिंग और बिजली की पहुंच समान नहीं है.   

कब खतरनाक हो जाता है वेट बल्ब टेंपरेचर

ऐसे में राजस्थान के 45 डिग्री सेल्सियस के तापमान में शरीर पसीने के साथ खुद को ठंडा रख सकता है. लेकिन कोलकाता या मुंबई जैसे शहरों में अधिक नमी वाला 38 डिग्री सेल्सियस का तापमान अधिक खतरनाक हो सकता है. क्योंकि इस वेट बल्ब टेंपरेचर में शरीर खुद को ठंडा नहीं रख सकता है. 

28-30 डिग्री सेल्सियस के वेट बल्ब टेंपरेचर में अधिक समय तक रहना खतरनाक हो सकता है. 

31-33 डिग्री सेल्सियस का वेट बल्ब टेंपरेचर हीट एग्जॉशन और हीटस्ट्रोक का खतरा अधिक होता है. 35 डिग्री सेल्सियस का वेट बल्ब टेंपरेचर इंसान के जिंदा रहने की सीमा है. 

भारत में हीटवेव का असली खतरा केवल तापमान नहीं है, बल्कि  तापमान और नमी का मिलना है, जब यह बढ़ जाता है तो वेट बल्ब टेंपरेचर खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है. 

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