- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मुस्लिम वोटरों के बंटवारे के कारण तृणमूल कांग्रेस की हार हुई है
- मुस्लिम वोट बैंक में वाम-आईएसएफ, कांग्रेस और एजेयूपी ने तृणमूल को भारी नुकसान पहुंचाया है
- मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बीजेपी ने तृणमूल से बढ़त हासिल की है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इतिहास एक बार फिर दोहराया गया है. साल 2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा से तृणमूल कांग्रेस की ओर मुस्लिम वोटों के ट्रांसफर के कारण ममता बनर्जी सत्ता में आईं थीं. 15 साल बाद 2026 के विधानसभा में ममता बनर्जी की हार की एक वजह मुस्लिम वोटर रहे हैं. अल्पसंख्यक वोटरों का टीएमसी से दूर होना भी ममता बनर्जी की हार की एक वजह बनी है, आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे है. अगर मुस्लिम वोटर न बंटते, तो बंगाल में आज तस्वीर कुछ और भी हो सकती थी.
क्या फेल हो गया TMC का थिंकटैंक?
पश्चिम बंगाल चुनाव रिजल्ट के आंकड़े काफी हैरान करने वाले हैं. अगर देखा जाए, तो टीएमसी के वोट शेयर में सिर्फ 4% अंतर आया है, लेकिन बीजेपी सीटों में 123 की बढ़त हासिल करने में कामयाब रही है. आखिर, ये कैसे मुमकिन हो पाया? पिछले कई चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ा रहा मुस्लिम वोट बैंक में 2026 के विधानसभा चुनावों में फूट पड़ गई, जिसमें वाम-आईएसएफ गठबंधन, कांग्रेस और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) ने तृणमूल पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया. मुस्लिम वोटरों में इस बिखराव की उम्मीद शायद ममता सरकार के थिंकटैंक ने नहीं की थी. अगर टीएमसी सही समय पर कांग्रेस जैसे दलों के साथ गठबंधन कर लेती, तो बिखराव कम किया जा सकता था. बस, यही चूक टीएमसी सरकार पर भारी पड़ गई.

मालदा और मुर्शिदाबाद में छिटके TMC के मुस्लिम वोटर्स!
बंगाल में मुस्लिम वोटों के बंटने का सीधा-सीधा फायदा बीजेपी को हुआ. यही वजह है कि मालदा की 12 सीटों में से छह पर पार्टी के उम्मीदवार या तो जीतते हुए या आगे बढ़ते हुए नजर आ रहे थे, लेकिन जीत की दजलीज तक ये नहीं पहुंच पाए. बता दें कि मालदा में 50% मतदाता मुस्लिम हैं. इसी तरह की स्थिति पड़ोसी मुर्शिदाबाद जिले में भी देखने को मिली, जहां 70% मुस्लिम आबादी वाले मुर्शिदाबाद जिले की 22 सीटों में से आठ पर बीजेपी के उम्मीदवार जीतते हुए या आगे बढ़ते हुए नजर आ रहे थे. ये ऐसे इलाके हैं, जिन्हें टीएमसी का गढ़ कहा जाता रहा है. अगर ऐसे इलाकों में भी बीजेपी को बढ़त मिल रही है, तो खेला समझा जा सकता हे.
SIR का ममता पर डबल अटैक
पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणाम में SIR ने भी बड़ा अहम रोल निभाया, इसमें कोई दो राय नहीं है. टीएमसी को एसआईआर से डबल झटका लगा. एक तो बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटरों का नाम कटा, जो टीएमसी का वोट बैंक कहा जाता है. वहीं, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जहां एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए थे, लोगों में आक्रोश था. कई लोगों का मानना था कि तृणमूल ने अंतिम मतदाता सूची में उनके नाम शामिल करने के लिए ठंग से कोशिश नहीं की. इधर, मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग में असंतोष इस मुद्दे को लेकर भी था कि बंगाल के खजाने से मंदिरों का निर्माण और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में विकास की कमी शामिल है.
हुमायूं कबीर जैसे नेताओं ने भी टीएमसी की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एजेयूपी के संस्थापक हुमायूं कबीर ने नोआडा और रेजिनगर दो सीटों से चुनाव लड़ा, वे दोनों सीटों से विजयी घोषित किए गए. मुर्शिदाबाद के डोमकल से सीपीआई (एम) के मोहम्मद मुस्तफिजुर रहमान विजयी घोषित हुए, जबकि दक्षिण 24 परगना के भंगर से इंडियन सेकुलर फ्रंट के नवसाद सिद्दीकी ने अपनी सीट बरकरार रखी. कांग्रेस के उम्मीदवार मोहताब शेख फरक्का से जीते और दूसरी पार्टी के उम्मीदवार जुल्फिकार अली रानीनगर सीट से सफल रहे.
ये भी पढ़ें :- रत्ना, संदेशखाली की रेखा, कालिता... बीजेपी के टिकट पर बंगाल चुनाव जीतने वाली इन महिलाओं की कहानी जरूर जानें
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ममता के साथ हो गया खेला
मालदा की मानिकचक सीट जैसी जगहों पर भाजपा के गौर चंद्र मंडल ने तृणमूल की कविता मंडल को 13,938 वोटों के अंतर से हराया. हालांकि, कांग्रेस और सीपीआई (एम) को मिलाकर 15,000 से अधिक वोट मिले, जिससे जीत का अंतर कम हो गया. 2021 में गौर चंद्र मंडल टीएमसी की सबित्री मित्रा से कम से कम 33,000 वोटों से हार गए थे. मुर्शिदाबाद के जंगीपुर, जो एक मुस्लिम बहुल इलाका है, उसमें टीएमसी के मौजूदा विधायक और 2026 के उम्मीदवार जाकिर हुसैन भाजपा की चित्ता मुखर्जी से 10,542 वोटों से हार गए, जबकि कांग्रेस को 31,000 से अधिक वोट मिले. हालांकि, 2021 में हुसैन ने भाजपा के हेमंत घोष के खिलाफ 92,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की थी.
इसी तरह, कई अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर, 2026 में बीजेपी उम्मीदवारों को तृणमूल के प्रतिद्वंद्वियों पर मिले वोटों का अंतर अन्य पार्टियों को उन्हीं सीटों पर मिले वोटों के लगभग बराबर था, जो मुस्लिम वोटों में स्पष्ट विभाजन को दर्शाता है. वहीं, दूसरी ओर चुनाव में हिंदू मतदाताओं में एकता नजर आई, जिससे बीजेपी को पूरे राज्य में और खासतौर पर बांग्लादेश की सीमा से लगे निर्वाचन क्षेत्रों में फायदा हुआ.
ये भी पढ़ें :- चुनाव नतीजों ने Axis My India के एग्जिट पोल पर लगाई मुहर, सभी पोल में टॉप पर रहा प्रदीप गुप्ता का अनुमान
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं