- प्रदीप गुप्ता के अनुसार पश्चिम बंगाल में सर्वे के दौरान उनकी टीम के छह सर्वेक्षक 24 दिन जेल में रहे
- बंगाल में सर्वेक्षण के दौरान 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपनी पार्टी पसंद बताने से इनकार कर दिया
- मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) ने लोगों के अंदर डर पैदा किया है
एक्सिस माय इंडिया के चेयरमैन और मैनेजिंग डॉयरेक्टर प्रदीप गुप्ता ने एनडीटीवी के एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल से साथ बातचीत में पश्चिम बंगाल में सर्वे के दौरान आई कठिनाईयों का किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी के छह सर्वे करने वाले लोगों को 24 दिनों तक जेल में रहना पड़ा और उनकी गलती बस इतनी थी कि सर्वे के दौरान उन्होंने मतदाताओं से ये पूछ लिया कि वो किस पार्टी को ज्यादा पसंद करते हैं.
उन्होंने कहा कि ये घटना इस बात की झलक देती है कि पश्चिम बंगाल "बाकी भारत की तुलना में बहुत अलग और चुनौतीपूर्ण" क्यों है.
2013 से अब तक 81 चुनावों में से 74 में सही अनुमान लगाने का रिकॉर्ड रखने वाले प्रदीप गुप्ता का ने कहा कि उनकी टीमों को जमीनी स्तर पर जो मिला, वह इस बात की मौन स्वीकृति थी कि बंगाल शायद एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां एक सक्षम सर्वेक्षक भी आंशिक रूप से अंधेरे में ही काम कर रहा है.

उन्होंने बंगाल में अपनी पसंद बताने से इनकार करने वाले मतदाताओं के प्रतिशत का जिक्र करते हुए कहा, "जब हमने 10 लोगों से बात की, तो उनमें से केवल दो-तीन ही यह बताने को तैयार थे कि उन्होंने किसे वोट दिया. जिन लोगों ने अभी तक अपनी राय नहीं दी है, उनमें से किस पार्टी की हिस्सेदारी उस विशेष 60 प्रतिशत में अधिक या कम है, यह बताना काफी कठिन है.”

उन्होंने कहा, "डर और विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) का डर इस चुप्पी का कारण है." हालांकि डर दशकों से बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, लेकिन नया कारक मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) है, जिसके परिणामस्वरूप चुनाव से पहले बड़ी संख्या में नाम हटा दिए गए. उन्होंने कहा कि एसआईआर ने मौजूदा चिंता में एक और चिंता जोड़ दी है.
गुप्ता ने कहा, "लोगों को लगता है कि वे नहीं जानते कि हम कौन हैं, हम क्या पूछना चाह रहे हैं और अगर वे किसी पार्टी का नाम लेते हैं, तो उनका नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है. इसलिए यह एक और डर है."
मतदान वरीयताओं के कारण मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने के इसी डर ने गुप्ता के सर्वेक्षकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का आधार बनाया.

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पहले चरण में लगभग 93 प्रतिशत मतदान के बारे में प्रदीप गुप्ता ने कहा कि अगर मतदाता सूचियों में लगभग 10 से 11 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं, तो भी संख्या कम हो जाती है. यदि 2016 में मतदान करने वाले लोगों की समान संख्या, जब मतदान प्रतिशत लगभग 82 से 83 प्रतिशत था, इस बार भी वोट करती है, तो अब यही संख्या कम हुए मतदान प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक प्रतिशत दर्शाती है.
उन्होंने कहा, "यदि आप 84 मतदाताओं को 90 से भाग दें, तो आपको 92 प्रतिशत से अधिक का कुल मतदान प्रतिशत हासिल होगा."
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