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सुखोई को मिलेगी 'तीसरी आंख': स्वदेशी रडार से कांपेंगे चीन-पाकिस्तान, एक साथ 100 टारगेट होंगे ट्रैक

भारत का स्वदेशी AESA रडार 'विरुपाक्ष' जल्द ही सुखोई-30 MKI फाइटर जेट में लगाया जाएगा, जिससे उसकी निगरानी और मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.

सुखोई को मिलेगी 'तीसरी आंख': स्वदेशी रडार से कांपेंगे चीन-पाकिस्तान, एक साथ 100 टारगेट होंगे ट्रैक
सुखोई पर लगने जा रहा एशिया का सबसे एडवांस रडार
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भारत लगातार रक्षा क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ा रहा है. हमारी वायुसेना के पास बेहद एडवांस और घातक फाइटर जेट हैं. अब इन फाइटर जेट की ताकत और ज्यादा बढ़ने वाली है. जल्द ही सुखोई जैसे फाइटर जेट पर हमारा स्वदेशी रडार 'विरुपाक्ष' इंटीग्रेट किया जाएगा. यह रडार एशिया का सबसे बेहतरीन रडार है. इसे DRDO ने डेवलेप किया है. इसके इंटीग्रेशन के बाद भारत के सबसे ताकतवर लड़ाकू विमान सुखोई-30 MKI और ज्यादा घातक बन जाएगा. आखिर विरुपाक्ष रडार क्या है, यह क्यों खास है और इससे दुश्मन क्यों थर-थर कांपेगा? आइए बताते हैं.

क्या है विरुपाक्ष रडार?

विरुपाक्ष भारत द्वारा पूरी तरह से स्वदेशी रूप से विकसित एक Active Electronically Scanned Array (AESA) रडार सिस्टम है. इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने साथ मिलकर विकसित किया है. यह रडार एडवांस गैलियम नाइट्राइड टेक्नोलॉजी पर आधारित है. यह टेक्नोलॉजी पारंपरिक रडार की तुलना में बहुत कम बिजली की खपत करती है, कम गर्म होती है और इसकी सिग्नल भेजने व पकड़ने की क्षमता काफी ज्यादा तेज होती है.

यह रडार सिस्टम अपने अहम चरण में पहुंच चुका है. इसे जमीनी परीक्षण चल रहे हैं. 2026 के अंत तक इसकी पहला लॉट तैयार होने की उम्मीद है. यह रडार सबसे पहले सुखोई-30 MKI फाइटर जेट में अपग्रेड किया जाएगा. भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी ताकत ही सुखोई विमान हैं. वायुसेना के पास कुल फाइटर जेट का करीब 40 फीसदी हिस्सा सुखोई का है. फिलहाल हमारे पास करीब 250 सुखोई हैं. पहले चरण में 84 सुखोई को विरुपाक्ष से इंटीग्रेट किया जाएग. इसके बाद 200 अन्य फाइटर जेट में भी यह खास रडार लगाए जाएंगे. करीब 63000 करोड़ के सुखोई अपडेट पर काम चल रहा है.

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क्यों खास है विरुपाक्ष रडार?

विरुपाक्ष रडार लगने के बाद सुखोई 'सुपर सुखोई' अवतार में आ जाएंगे. यह रडार लगने के बाद सुखोई खुद एक 'मिनी अवाक्स' की तरह काम करेगा जो नेटवर्क-सेंट्रिक वॉर सिस्टम के जरिए अन्य विमानों और मिसाइल सिस्टम को भी निर्देश दे सकेगा. रिपोर्ट के अनुसार विरुपाक्ष रडार 300 से 400 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के विमान को ट्रैक कर सकता है. यानी दिल्ली में हमारा सुखोई लखनऊ में दूसरे विमान को डिटेक्ट कर पाएगा.

जहां सुखोई का मौजूदा रडार सिस्टम केवल 15 टारगेट को ट्रैक कर पाता है, वहीं विरुपाक्ष एक साथ 64 से 100 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है. यानी हमारे 10 सुखोई ही पाकिस्तान की पूरी एयरफोर्स को ट्रैक कर पाएंगे. इसकी एक खासियत इसका वजन भी है. यह नया रडार पुराने रडार की तुलना में 40% तक हल्का है, जिससे सुखोई की रफ्तार, कलाबाजी खाने की क्षमता और ईंधन की बचत में सुधार होगा. 

भारतीय वायुसेना के सबसे एडवांस और स्वदेशी फाइटर जेट तेजस MK-2 में भी विरुपाक्ष रडार को अपग्रेड करने की योजना है. वहीं अगर जमीनी परीक्षण सफल रहते हैं साल 2028 तक इसे सुखोई में अपग्रेड करने का काम पूरा हो जाएगा.

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दुश्मन की कैसे बढ़ेगी टेंशन? 

विरुपाक्ष रडार से लैस होने के बाद सुखोई फाइटर जेट चीन और पाकिस्तान की टेंशन बढ़ा देगा. चीन की सबसे बड़ी ताकत उसका J-20 फाइटर जेट है. यह पाकिस्तान के पास भी है. यह एक स्टेल्थ विमान है, जो रडार से बच सकता है. लेकिन विरुपाक्ष स्टेल्थ विमानों को भी ट्रैक कर सकता है. हमारा रडार सिस्टम करीब 200 किलोमीटर की दूरी से ही स्टेल्थ फाइटर जेट को ट्रैक कर सकता है. किसी भी फाइटर जेट को इतनी दूरी से ट्रैक करके खत्म करने की क्षमता सुखोई के पास पहले से ही है.

भारत के लिए कैसे फायदेमंद?

विरुराक्ष रडार पूरी तरह स्वदेशी है. अब तक हम अपने रडार सिस्टम और सोर्स कोड के लिए रूस और फ्रांस जैसे देशों पर निर्भर थे. लेकिन विरुपाक्ष के आने के बाद भारत रडार के मामले में आत्मनिर्भर बन जाएगा. वहीं इसे सुखोई में बिना किसी बड़े बदलाव के फिट किया जा सकत है. इससे अपग्रेड की लागत बेहद कम हो जाती है. भविष्य में भारत इसे एक्सपोर्ट भी कर सकता है, जो भारत को ग्लोबल डिफेंस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित कर सकता है.

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