- असदुद्दीन ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को 2 अक्टूबर तक गठबंधन का जवाब देने को कहा है वरना अकेले चुनाव लड़ेंगे
- उत्तरप्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 20 प्रतिशत है और करीब दस जिलों में यह 33 से 50 प्रतिशत के बीच है
- कांग्रेस मुस्लिम वोटर को लेकर सतर्क है और ओवैसी के खतरे के बावजूद गठबंधन को लेकर कोई कदम उठाने से बच रही है
उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों में अलग-अलग समुदाय और जातियों को लेकर रणनीति बना कर उन्हें अपने पाले में करने की कवायद शुरू हो गई है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तो पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला पर पिछले लोकसभा चुनाव से ही काम कर रहे हैं. हालांकि आजकल पीडीए के पी को पंडित भी बताने से नहीं भूलते.
मगर उत्तरप्रदेश में एक और वोट बैंक है जिसे परंपरागत तौर पर समाजवादी पार्टी का माना जाता है मगर अब इसमें उसको चुनौती मिल रही है और चुनौती दे रहे हैं एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी.
ओवैसी ने कहा है कि कोई भी पार्टी अकेले दम पर उत्तरप्रदेश में बीजेपी को नहीं हरा सकती है.ओवैसी ने कहा है कि वो उत्तरप्रदेश में सपा और कांग्रेस से गठबंधन करना चाहते हैं कि इन पार्टियों को 2 अक्टूबर तक का वक्त दिया है. यदि 2 अक्टूबर तक सपा और कांग्रेस ने जवाब नहीं दिया तो वो अकेले चुनाव लड़ेंगे और 150 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे.
यूपी में कितनी मुस्लिम आबादी?
उत्तरप्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 20 फीसदी है और करीब दस जिलों में इनकी आबादी 33 से 50 फीसदी तक है. उत्तरप्रदेश की 57 ऐसी सीटें हैं जिसे मुस्लिम बहुल माना जाता है मगर करीब 120-130 सीटों को यह वोट बैंक प्रभावित करता है.
मुस्लिम वोटरों का प्रभाव पश्चिमी उत्तरप्रदेश में ज्यादा देखने को मिलता है जैसे रामपुर, मुरादाबाद, संभल, बिजनौर, सहारनपुर, शामली और अमरोहा में 40 से 50 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. यही वजह है कि ओवैसी भी इन्हीं इलाकों में घूम रहे हैं.
14 जून को ओवैसी ने सबसे पहली रैली बहराइच में की थी फिर वो बिजनौर, मुरादाबाद, सहारनपुर, कानपुर, श्रावस्ती और आजमगढ़ में सभाएं कर चुके हैं.
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Photo Credit: IANS
मुस्लिम वोट पर किसका दबदबा?
परंपरागत रूप से मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी की झोली में जाता है. 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को करीब 80 फीसदी वोट मिले थे जबकि 8 फीसदी वोट बीजेपी को मिला था.
ऐसा माना जाता है कि शिया समुदाय परंपरागत तौर पर बीजेपी को भी वोट करता रहा है खासकर लखनऊ और उसके आसपास के इलाकों में जहां शिया आबादी है.
अब ओवैसी यह तर्क दे रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने इसी तरह सीट शेयरिंग की बात राष्ट्रीय जनता दल से की थी और महागठबंधन के सभी दलों के नेताओं को पत्र लिखा था. यही नहीं उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी यादव को भी खत लिखकर 6 सीटें देने की मांग की थी. मगर ओवैसी की पार्टी और महागठबंधन के बीच कोई समझौता नहीं हुआ, ओवैसी अलग लड़े और सीमांचल में पांच सीट जीत गए और कई सीटों पर मुस्लिम वोटों के बंटवारे की वजह से जेडीयू और बीजेपी जीती.
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ओवैसी के आने से क्या असर होगा?
वैसे 2017 में ओवैसी की पार्टी 38 सीटों पर और 2022 में 85 सीटों पर लड़ी थी और अधिकतर सीटों पर उनकी जमानत जब्त हो गई थी. 2017 में ओवैसी को 0.24 फीसदी वोट मिला था जो 2022 में 0.49 फीसदी हो गया. मगर कई सीटों पर ओवैसी की पार्टी को मिले वोट हार जीत के अंतर से अधिक थे जैसे कुर्सी, बिजनौर, नकुर और सुल्तानपुर.
यहां पर इसकी वजह से बीजेपी को फायदा हुआ. चुनाव में सीटों का महत्त्व तो होता है मगर उससे ज्यादा महत्व वोटों का भी होता है. ओवैसी अपनी सीटों पर कितना वोट ले जाते हैं यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है.
2027 के चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन का बहुत कुछ दांव पर लगा है मगर अखिलेश यादव ने अभी तक अपने गठबंधन के दरवाजे बंद ही रखे हैं. उनको लगता है अभी इंडिया गठबंधन में छेड़छाड़ की जरूरत नहीं है. मगर कांग्रेस ओवैसी को लेकर सतर्क है.

कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि ओवैसी कुछ सीटें जीत भी सकते हैं और इससे बीजेपी को ही फायदा पहुचाऐंगे, मगर क्या ओवैसी को गठबंधन में लाना चाहिए उस पर चुप्पी साध लेते हैं.
जाहिर है कांग्रेस को लगता है कि मुस्लिम वोटरों में राहुल गांधी की पैठ बहुत गहरी हो चुकी है और ओवैसी का डर दिखा कर कांग्रेस सीटों के बंटवारे पर समाजवादी पार्टी से तगड़ी सौदेबाजी करने वाली है. यही वजह है कि आजकल कांग्रेस में बड़ी संख्या में मुस्लिम नेताओं को शामिल कराया जा रहा है क्योंकि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी दो बड़े नेता तो होते ही हैं.
जैसे कैराना के आमिर आलम को कांग्रेस में लाना इसी रणनीति का हिस्सा है. दूसरी तरफ ओवैसी का प्लान है कि उत्तरप्रदेश में वे आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर के साथ भी जा सकते हैं.
फिलहाल ओवैसी की 2 अक्टूबर की डेडलाइन में चंद दिन बचे हैं. देखना होगा कि उसके बाद ओवैसी क्या करते हैं और इंडिया गठबंधन की प्रतिक्रिया क्या रहती है? फिलहाल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता साथ बैठेंगे तब ही कुछ कहा जा सकता है कि आगे वो ओवैसी के बारे में कुछ सोचते भी हैं या नहीं?
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