- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं
- अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या साजिश की सामग्री मौजूद है
- दिल्ली पुलिस ने दोनों पर UAPA और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या साजिश की सामग्री मौजूद है और उनकी भूमिका अन्य आरोपियों से अलग है. उमर खालिद करीब 5 साल से जेल में है. उसकी गिरफ्तारी सितंबर 2020 में हुई थी. खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि उसके खिलाफ कोई हिंसक कार्रवाई का सबूत नहीं है और वह सिर्फ भाषण देने के आरोप में जेल में है. हालांकि, शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों से अलग है और दोनों के खिलाफ साजिश के पर्याप्त सबूत हैं. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर आरोपियों की भूमिका की तुलना अन्य लोगों से नहीं की जा सकती.
दिल्ली पुलिस ने दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. आरोप है कि दोनों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने की साजिश रची थी.
इस फैसले के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम को जेल में ही रहना होगा. बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि लंबे समय से ट्रायल लंबित है और आरोपियों को बिना सुनवाई के जेल में रखना अनुचित है. लेकिन अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी जा सकती. यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आतंकवाद कानून की व्याख्या के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
UAPA को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े संवेदनशील मामलों से संबंधित है. अदालत ने कहा कि चर्चा सिर्फ देरी और लंबे समय तक जेल में रखने तक सीमित रही है. UAPA के तहत अपराध शायद ही कभी अलग-थलग कामों तक सीमित होते हैं. धारा 43D(5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है, लेकिन यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता और न ही डिफ़ॉल्ट रूप से जमानत देने से इनकार करता है.
जमानत पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत बचाव का मूल्यांकन करने का मंच नहीं है. न्यायिक संयम का मतलब कर्तव्य से पीछे हटना नहीं है. अदालत को सही आवेदन के लिए एक व्यवस्थित जांच करनी होगी. यह देखना जरूरी है कि क्या जांच में प्रथम दृष्टया अपराध सामने आया है और क्या आरोपी की भूमिका का अपराध से कोई उचित संबंध है.
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