- उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ 2028 के लिए सड़क चौड़ीकरण में शाही मस्जिद के 11 फुट हिस्से को हटाने का विरोध हो रहा है
- प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी हुई और पुलिसकर्मियों पर भी पत्थर फेंके गए जिससे स्थिति तनावपूर्ण बनी रही
- भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत धार्मिक स्थलों, निजी संपत्ति को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए सरकार ले सकती है
उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ 2028 की तैयारियों के बीच सड़क चौड़ीकरण को लेकर तनाव बढ़ गया है. कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक सड़क को चौड़ा करने के लिए शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाया जाना है, जिसको लेकर विरोध शुरू हो गया. सोमवार को प्रदर्शन के दौरान हालात उस वक्त बिगड़ गए, जब मौके पर पत्थरबाजी की घटना सामने आई. पुलिसकर्मियों पर भी पत्थर फेंके गए. प्रदर्शनकारी गलियों से आगे बढ़ने की कोशिश करते दिखे. स्थिति को देखते हुए शाही मस्जिद परिसर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है.
कथित तौर पर यह मस्जिद 600 साल पुरानी है और इसलिए इसके 11 फुट हिस्से को तोड़ने को लेकर विरोध हो रहा है. उज्जैन में सिंहस्थ 2028 मेले से पहले सड़क चौड़ी करने के प्रोजेक्ट के तहत 272 ढांचों को गिराने के लिए चिह्नित किया गया है. इनमें 7 धार्मिक ढांचें भी शामिल हैं जो किसी एक धर्म से नहीं जुड़े. सवाल है कि आपके घर से लेकर मंदिर-मस्जिद जैसे धार्मिक स्थल को सड़क बनाने या किसी विकास योजना के लिए तोड़ने को लेकर क्या कानून है.
भूमि अधिग्रहण कानून 2013
सरकार किसी भी निजी घर, दुकान, जमीन और यहां तक कि मंदिर या मस्जिद जैसी धार्मिक संपत्ति की जमीन भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित कर सकती है, लेकिन मनमाने ढंग से नहीं. इसके लिए कानून और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है. इसको लेकर केंद्रीय स्तर पर सबसे मुख्य कानून भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013. इसे शॉर्ट में भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 भी कहा जाता है.
सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है?
संवैधानिक स्तर पर अनुच्छेद 300A के तहत किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के अधिकार के तहत ही वंचित किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहण राज्य की शक्ति है, लेकिन उसके साथ उचित मुआवजा देना राज्य का दायित्व है.
यहां यह ध्यान देना भी जरूरी है कि सिर्फ धार्मिक स्थल होने से वह ढांचा हर परिस्थिति में अधिग्रहण से पूरी तरह बाहर नहीं हो जाता. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में यह सिद्धांत दोहराया गया है कि चर्च, मस्जिद और मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी राज्य की विशेषाधिकार शक्ति के अधीन आ सकते हैं. हालांकि कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण अपवाद बताया कि यदि कोई स्थान उस धर्म के लिए इतना विशेष और अनिवार्य है कि उसके अधिग्रहण से धार्मिक अभ्यास का अधिकार ही प्रभावित हो जाए, तो संवैधानिक सवाल अलग हो सकता है.
क्या आप कोर्ट जा सकते हैं?
यदि आपको नीचे लिखीं बातें लगती हैं तो आप हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं-
- जमीन अधिग्रहण का कोई वैधानिक आधार नहीं है
- कथित सार्वजनिक उद्देश्य वास्तविक नहीं है
- जरूरी नोटिस/आपत्ति की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई
- मुआवजा कानून के अनुसार नहीं दिया गया
- अधिग्रहण मनमाना या भेदभावपूर्ण है
- सरकार ने कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया
भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा कितना मिलता है?
2013 के केंद्रीय कानून के तहत जमीन का मुआवजा उसकी बाजार कीमत और इलाके के आधार पर तय किया जाता है. शहरी क्षेत्र में जमीन की बाजार कीमत का 1 गुना, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 1 से 2 गुना तक मुआवजा दिया जाता है. इसके अलावा तय मुआवजे के ऊपर 100% अतिरिक्त प्रतिकर भी मिलता है. यानी जमीन की कीमत के साथ अतिरिक्त रकम भी दी जाती है. इसके अलावा जमीन या उस पर बने भवन से जुड़ी अन्य संपत्तियों की कीमत भी मुआवजे में शामिल की जाती है.
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