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पश्चिम बंगाल उपचुनाव: कांग्रेस ने ममता बनर्जी के साथ क्यों नहीं मिलाया हाथ?

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव से पहले टीएमसी ने कांग्रेस को गठबंधन का प्रस्ताव दिया, लेकिन सीटों को लेकर सहमति नहीं बन सकी.

पश्चिम बंगाल उपचुनाव: कांग्रेस ने ममता बनर्जी के साथ क्यों नहीं मिलाया हाथ?
फाइल फोटो
NDTV
  • नंदीग्राम सीट पर शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद उपचुनाव हो रहा है.
  • रेजीनगर सीट पर हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को टीएमसी ने उम्मीदवार बनाया है
  • कांग्रेस स्थानीय नेताओं का मानना है कि टीएमसी में फूट और लोगों की नाराजगी के कारण उसकी वापसी संभव है

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में दो विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहती थी लेकिन उसकी कोशिश विफल रही. सूत्रों के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस को नंदीग्राम सीट लड़ने का सुझाव दिया था और खुद रेजीनगर लड़ना चाहती थी. लेकिन टीएमसी के इस प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस राजी नहीं हुई.

दोनों दलों के उच्च सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है हालांकि आधिकारिक तौर पर इस सिलसिले में कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है. उप-चुनाव के लिए छह अक्टूबर को वोटिंग होगी और नौ तारीख को नतीजे आएंगे.  दोनों सीटों पर कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम के साथ ममता बनर्जी की टीएमसी और नेता विपक्ष ऋतब्रत बनर्जी की अगुआई में टीएमसी के बागी गुट ने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है.

नंदीग्राम सीट शुभेंदु के इस्तीफे से खाली हो गया

नंदीग्राम सीट सीएम शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे की वजह से खाली हुई है. पूर्वी मेदिनीपुर जिले की इस सीट पर हो रहे उपचुनाव के लिए बीजेपी ने उनके पूर्व सहयोगी चंद्रनाथ रथ की मां हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है. चन्द्रनाथ रथ की बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों के दो दिन बाद छह मई की शाम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. नंदीग्राम सीट से शुभेंदु अधिकारी पहली बार 2016 में विधायक चुने गए और 2021 में उन्होंने तब की सीएम ममता बनर्जी को हराकर सबको चौंका दिया था.

इस बार के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी अपनी सीट नंदीग्राम के अलावा ममता बनर्जी को सीधी टक्कर देने के लिए भवानीपुर से भी मैदान में उतरे थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कोलकाता स्थित भवानीपुर सीट रखते हुए नंदीग्राम छोड़ दी. 

विधानसभा उपचुनाव की दूसरी सीट मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर है जहां से हुमायूं कबीर ने इस्तीफा दिया है. हुमायूं कबीर इस बार के बंगाल चुनाव में बड़े मुस्लिम नेता के तौर पर उभरे हैं. उन्होंने रेजिनगर के अलावा बगल की नओदा सीट से भी जीत दर्ज की. रेजीनगर सीट पर उपचुनाव में उन्होंने अपने बेटे गुलाम नबी आजाद को मैदान में उतारा है.

मुस्लिम बहुल इस सीट पर पिछली बार बीजेपी दूसरे नंबर पर रही. 2021 में जीत दर्ज करने वाली टीएमसी तीसरे स्थान पर आई जबकि कांग्रेस को 2% से भी कम वोट मिले. भले ही पिछले चुनाव में कांग्रेस टक्कर नहीं दे पाई लेकिन ये इलाके कभी उसका मजबूत गढ़ रहे हैं. 

रेजीनगर सीट का अतीत क्या है?

रेजीनगर सीट से 2011 में हुमायूं कबीर कांग्रेस की टिकट पर जीते थे. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और टीएमसी का गठबंधन था. बाद में कबीर टीएमसी में शामिल हो गए लेकिन दो साल बाद हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर कबीर तीसरे स्थान पर खिसक गए. 2016 में एक बार फिर कांग्रेस ने यह सीट जीती.

निर्दलीय चुनाव लड़ कर हुमायूं कबीर दूसरे स्थान पर रहे जबकि टीएमसी एक बार फिर तीसरे स्थान पर रही. हालांकि 2021 में टीएमसी ने यहाँ से दो बार से कांग्रेस की टिकट पर जीत रहे रबीउल आलम चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया और पहली बार जीत दर्ज की. कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही जो पाँच साल बाद दो फ़ीसदी वोट से भी कम वोट पर सिमट गई. 

कांग्रेस को लगता है कि टीएमसी के दो फाड़ होने के बाद वो मुख्य मुक़ाबले में वापसी कर सकती है. टीएमसी के दोनों गुट दोनों सीटों पर उपचुनाव लड़ रहे हैं. यही वजह है कांग्रेस रेजीनगर सीट ममता बनर्जी की टीएमसी के लिए छोड़ने को तैयार नहीं हुई.

यह सीट बहरामपुर लोकसभा में आती है जहां से पिछली बार टीएमसी उम्मीदवार यूसुफ पठान ने लगातार पाँच बार के कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी को हराया था. पठान अब टीएमसी से अलग होकर एनसीपीआई नाम की पार्टी में शामिल हो चुके हैं जो एनडीए का हिस्सा है. कांग्रेस इसे भी बिधानसभा उपचुनाव में मुद्दा बना सकती है. 

कांग्रेस के स्थानीय नेता टीएमसी से गठबंधन के पक्ष में नहीं

कांग्रेस के एक सूत्र ने कहा कि अगर टीएमसी को गठबंधन करना ही था तो उसे रेजीनगर कांग्रेस के लिए छोड़कर खुद नंदीग्राम सीट पर लड़ना चाहिए था. नंदीग्राम में टीएमसी मात्र दस हजार वोटों से हारी थी और दूसरी तरफ कांग्रेस को नोटा से भी कम वोट मिले थे. बंगाल कांग्रेस के स्थानीय नेता टीएमसी से गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं.

उन्हें लगता है कि पंद्रह सालों के शासन के बाद सत्ता से बाहर हुई टीएमसी में एक तो फूट पड़ चुकी है साथ ही लोगों की नाराजगी भी बरकरार है. जाहिर है ममता बनर्जी का प्रभाव कम होने के बाद ही बंगाल में कांग्रेस की वापसी हो सकती है.

हालांकि पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी प्रकाश जोशी ने गठबंधन से चर्चा से इंकार करते हुए कहा कि इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पूरी ताकत से उपचुनाव लड़ेगी. पार्टी का पूरा जोर अपने संगठन को फिर से मजबूत बनाने पर है. जोशी के मुताबिक़, “बंगाल के लोग अब विकल्प के तौर पर कांग्रेस से उम्मीद लगा रहे हैं क्यूंकि हाल में ही उन्होंने पंद्रह साल पुरानी सरकार को बदला है और नई सरकार से लोग कुछ महीनों में ही निराश हो चुके हैं.”

विधानसभा चुनाव में हार और सांसदों-विधायकों की बगावत के बीच ममता बनर्जी ने दिल्ली आकर सोनिया गांधी से मुलाकात की थी. उसके अगले दिन अभिषेक बनर्जी और राहुल गांधी की लंबी बातचीत हुई. तब टीएमसी के विलय की अटकलें भी लगाई गईं थीं जिनका बाद में कांग्रेस ने खंडन किया था. हालांकि तब से इस बात के साफ़ संकेत मिल रहे थे कि भविष्य में कांग्रेस और ममता बनर्जी गठबंधन कर सकते हैं. लेकिन उपचुनाव में कांग्रेस ने जिस तरह के तेवर दिखाए हैं उससे साफ़ है दोनों दलों का साथ आना इतना आसान नहीं रहने वाला. हालांकि लोकसभा की सीट बँटने में ज़्यादा पेंच नहीं फंसेगा.

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