- मालेगांव की डिप्टी मेयर शान‑ए‑हिंद ने टीपू सुल्तान की तस्वीर कार्यालय में दोबारा लगाने की बात कही है
- नितेश राणे ने कहा कि स्थानीय माहौल और जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए ऐसे विवादास्पद कदम नहीं उठाने चाहिए
- राणे ने टीपू सुल्तान को लेकर सामाजिक मतभेदों का हवाला देते हुए राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने पर चिंता जताई है
मालेगांव में टीपू सुल्तान की तस्वीर को लेकर शुरू हुआ विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. शहर की डिप्टी मेयर शान‑ए‑हिंद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि दफ्तर की मरम्मत पूरी होते ही वे अपनी कुर्सी के पीछे टीपू सुल्तान की तस्वीर दोबारा लगाएँगी. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है. डिप्टी मेयर के इस निर्णय पर बीजेपी नेता नितेश राणे ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि मालेगांव जैसे शहर में चुने हुए प्रतिनिधियों को ऐसे कदम उठाने से पहले स्थानीय माहौल और जनभावनाओं का ध्यान रखना चाहिए. राणे ने आरोप लगाया कि टीपू सुल्तान को लेकर समाज में अलग‑अलग मत हैं और ऐसे प्रतीकों को कार्यालय में लगाने से विवाद पैदा हो सकता है.
नितेश राणे ने क्या कहा?
राणे ने अपने बयान में कहा कि टीपू सुल्तान को लेकर ऐतिहासिक चर्चाएं हमेशा विवादित रही हैं, और किसी सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को उन प्रतीकों को चुनने में सावधानी बरतनी चाहिए जो किसी समुदाय में असहमति या तनाव पैदा कर सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़े.
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाई जा रही है, तो उन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को क्यों नहीं शामिल किया जा रहा जिनका योगदान सामाजिक समरसता और न्याय से जुड़ा है. उनका कहना है कि सार्वजनिक दफ्तरों में वही तस्वीरें लगाई जानी चाहिए जिन पर समाज में व्यापक सहमति हो.
डिप्टी मेयर शान‑ए‑हिंद का क्या कहना है?
इस पूरे विवाद पर डिप्टी मेयर शान‑ए‑हिंद का कहना है कि यह उनका वैचारिक निर्णय है और वे इसे बदलने वाली नहीं हैं. उनका दावा है कि टीपू सुल्तान को लेकर उनकी सोच ऐतिहासिक नजरिये पर आधारित है, न कि किसी तरह के राजनीतिक संदेश पर. उन्होंने कहा कि तस्वीर लगाने का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है.
स्थानीय राजनीति जानने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मुद्दे अक्सर चुनावी मौसम में ज्यादा उभरते हैं और फिर प्रतीकों की राजनीति तेजी से बढ़ने लगती है. टीपू सुल्तान की तस्वीर पर शुरू हुआ यह विवाद अब सिर्फ एक फोटो तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मालेगांव की राजनीतिक स्थितियों और सामाजिक वातावरण को प्रभावित करने लगा है. फिलहाल दोनों पक्ष अपने रुख पर कायम हैं और देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में स्थानीय प्रशासन और नगर निगम इस विवाद को कैसे संभालते हैं ताकि शहर का माहौल शांत रहे.
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