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ठोंगे में लोकतंत्र: वादे का खेला और झालमुड़ी सी चटपटी बंगाल की राजनीति

बंगाल के विधानसभा चुनाव में हर पार्टी ये दावा कर रही है कि उसके वादे ही सबसे सटीक हैं और जनता के सामने यही असमंजस है कि वो क्या खाए जिसे अगले पांच साल तक पचा पाए.

ठोंगे में लोकतंत्र: वादे का खेला और झालमुड़ी सी चटपटी बंगाल की राजनीति
  • पीएम ने झालमुड़ी क्या खरीदी, बंगाल की राजनीति तीखी, चटपटी और हर किसी के स्वाद के हिसाब से अलग दिखने लगी.
  • बंगाल के चुनाव में आरोप, प्रत्यारोप, रैलियां और 'खेला' का मिक्चर चला, अब जनता जनार्दन के वोट डालने का वक्त है.
  • मतदान का दिन झालमुड़ी के अंतिम दाने की तरह, फर्क बस इतना कि यहां दांव पर लोकतंत्र होता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 रुपये की झालमुड़ी का एक ठोंगा क्या उठाया, पश्चिम बंगाल की चुनावी नैरेटिव ही इसके ईर्द-गिर्द घूमने लगी. विधानसभा चुनाव झालमुड़ी के स्वाद सा चटपटा हो चला है. फर्क बस इतना है कि यहां प्लेट की जगह मंच सजे हैं. झालमुड़ी के चटपटे स्वाद की जगह मसालेदार शब्द बाण चल रहे हैं. वादों के रंग-बिरंगे पिटारे में पार्टियां सरसों तेल का तड़का लगा रही हैं. विकास के वादे को चनाचूर का टेक्सचर दिया जा रहा है. पर जनता को क्या पहले की तरह ही मिर्ची का स्वाद ही अधिक मिलेगा? जैसे झालमुड़ी की अपनी रेसिपी को दुकानदार यूनिक बताता है, बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी हर पार्टी यही दावा कर रही है कि उसके वादे ही सबसे सटीक हैं और जनता के सामने यही असमंजस है कि वो क्या खाए जिसे अगले पांच साल तक पचा पाए.

प्रधानमंत्री ने 10 रुपये देकर झालमुड़ी क्या खरीदी, विरोधियों को लगा कि उन्होंने पूरे बंगाल का 'पॉलिटिकल टेस्ट' ही ले लिया. ममता बनर्जी ने इसे 'ड्रामा' करार दिया, मानो झालमुड़ी खाना भी किसी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा हो. राज्य की राजनीति अब झालमुड़ी जैसी हो गई है- तीखी, चटपटी और हर किसी के स्वाद के हिसाब से अलग.

जैसे झालमुड़ी में मुड़ी (मुरमुरा), चनाचूर, आलू, नींबू, सरसों का तेल और तीखी मिर्च का तालमेल होता है, वैसे ही बंगाल के चुनाव में आरोप, प्रत्यारोप, रैलियां और 'खेला' का मिक्चर चल रहा है. बस फर्क इतना है कि झालमुड़ी में नींबू का रस गले को राहत देता है, पर बंगाल के चुनाव में तीखे भाषण का रस विपक्षी खेमे में मिर्ची लगा रहे हैं.

जनता जनार्दन के सामने 'यूनिक' रेसिपी

सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप डर की मिर्च कूट रहे हैं. टीएमसी की सीएम और उनकी सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के नेतृत्व वाले केंद्र सरकार पर केंद्रीय बलों और एजेंसियों के इस्तेमाल से राज्य में डर फैलाने का आरोप लगाती है और दावा करती हैं कि चुनाव से पहले डर का माहौल बना कर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है. तो विपक्ष की बीजेपी टीएमसी के राज में राजनीतिक हिंसा और सिंडिकेट राज के साये में राज्य के हिंदुओं में डर की बात कह रही है. उनके आरोप टीएमसी पर भय की राजनीति करने का है.

झालमुड़ी की खासियत होती है कि हर दुकानदार अपनी रेसिपी को सबसे यूनिक बताता है. बंगाल की राजनीति में भी यही हो रहा है. हर पार्टी दावा कर रही है कि उसका मिक्स सबसे सटीक है- बस जनता ही तय नहीं कर पा रही कि वो क्या खाए जिसे अगले पांच सालों के लिए पचा सके.

झालमुड़ी की तरह चटपटे वादे

वादा- महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का.
वादा- सुशासन सुनिश्चित करने का.
वादा-  समान नागरिक संहिता लागू करने का
वादा- हर साल एक लाख नौकरियां सृजित करने का.
वादा- हर घर पाइप से पीने का पानी पहुंचाने का.
वादा- पक्के घर उपलब्ध कराने का.
वादा- किसानों के लिए बड़ा बजट लाने का.
वादा- हर ब्लॉक में कम से कम एक स्कूल का.
वादा- घर-घर चिकित्सा पहुंचाने का.
वादा- महिलाओं को मासिक सहायता बढ़ाने का.
वादा- बेरोजगारों से आजीविका के लिए मासिक सहायता जारी रखने का.

तीखी मिर्च की तरह आरोप

आरोप- दार्जिलिंग और गोरखा दोनों के साथ अन्याय करने का.
आरोप- भ्रष्टाचार और अराजकता का.
आरोप- महिलाओं के असुरक्षित होने का. 
आरोप- पैसों के लिए नौकरियां बेचने का.
आरोप- अवैध खनन की अनुमति देने का.
आरोप- गैरकानूनी तस्करी में शामिल होने का. 
आरोप- मतदाता सूची में हेरफेर का.
आरोप- केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का.

दांव पर लोकतंत्र

वादों के पिटारे क्या अखबार से बने उस ठोंगे की तरह होंगे, जिसे खाने के बाद डस्टबिन में डाल दिया जाता है. चिंता इस बात की कि क्या चुनाव खत्म होने के बाद वादों की छपाई भी अगली बार अखबार पर ही दोबारा दिखेगी, वास्तविकता में नहीं.

बंगाल में 'खेला' सिर्फ चुनावी मैदान में नहीं, दिमाग में हो रहा है. नेता वादों के मसाले बदल रहे हैं, पर रेसिपी वही है- दूसरी पार्टी से डराना, और अपनी पार्टी के पिटारे से निकले वादों से जनता का ध्यान भटकाने का चटपटा सा लगने वाला स्वाद.

फिर आता है मतदान का वो दिन जो झालमुड़ी के उस अंतिम दाने की तरह होता है, जिसके लिए हर पार्टी हाथ फैलाए खड़ी है.  जैसे झालमुड़ी की आखिरी मूंगफली की लड़ाई हो. फर्क बस इतना है कि यहां दांव पर मूंगफली का दाना नहीं लोकतंत्र होता है.

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