- देश में बड़ी संख्या में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स की शिकायत, 12-12 घंटे काम, न पीएफ और न सैलरी
- ऑनलाइन डिलिवरी के बाद काम का बोझ दोगुना बढ़ा पर सैलरी वहीं के वहीं ठहर गई
- आरडब्ल्यूए और बिल्डर से भी सिक्योरिटी गार्ड्स को मदद नहीं, सिक्योरिटी एजेंसी के ठेकेदार नहीं सुनते
दिल्ली, नोएडा गाजियाबाद से लेकर पूरे एनसीआर में धड़ाधड़ ऊंची इमारतें बन रही हैं. इन इमारतों में सुरक्षा, जरूरी कामकाज के लिए सिक्योरिटी गार्ड की पूरी फौज रहती है. दिल्ली एनसीआर समेत देश भर में इनकी तादाद 90 लाख से एक करोड़ के करीब है. लेकिन इनकी हालत मजदूरों से भी दयनीय है. 12 घंटे की ड्यूटी, महीने या साल में कोई छुट्टी नहीं उन्हें बंधुआ मजदूर जैसा अहसास कराती है. अगर कभी बीमारी, त्योहार जैसी वजहों पर छुट्टी ली तो उस दिन की सैलरी कट. ज्यादातर सिक्योरिटी एजेंसी उन्हें बीमा, पेंशन या फंड भी नहीं देतीं.
हालत मजदूरों से भी बदतर -अखिलेश
हमने नोएडा, गाजियाबाद की ऐसी कुछ सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड्स की बात की तो उनकी दयनीय हालत सामने आई. गौर सोसायटी में काम करने वाले सिक्योरिटी गार्ड लवकुश कुमार का कहना है कि उनकी हालत मजदूरों से भी बदतर है. 12 घंटे लगातार काम के साथ हमें कोई भी छुट्टी नहीं मिलती. बीमारी या जरूरी काम पर छुट्टी लेने पर पैसा कट जाता है.साल के 365 दिन एक जैसा हाल. पिछले कुछ सालों से सैलरी भी नहीं बढ़ी. सिक्योरिटी एजेंसी सिर्फ भरोसा दे रही है, लेकिन जितना दूध, चाय-चीनी का रेट बढ़ता है, उतनी भी सैलरी नहीं बढ़ रही. लेकिन नौकरी गंवाने के डर से वो कहीं शिकायत नहीं करते हैं.
यूपी, बिहार से पलायन कर आए नोएडा, गाजियाबाद
दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे शहरों की सोसायटी और सिक्योरिटी एजेंसी का बिजनेस तेजी से बढ़ा है. यूपी, बिहार से लाखों की तादाद में लोग दिल्ली एनसीआर की इन्हीं सिक्योरिटी एजेंसी में काम कर रहे हैं. परिवार सहित उनका यहां रहना मुश्किल है. बहरामपुर, छिजारसी जैसी गांवों में 1-1 कमरे में उनका पूरा परिवार रहता है. दिहाड़ी मजदूरों जैसी उनकी हालत है, लेकिन उनके बराबर भी वेतन नहीं है. नोएडा में हाल ही में श्रमिकों का न्यूनतम 17 हजार रुपये तक किया गया है. उन्हें पीएफ-पेंशन, ईएसआई का लाभ भी मिलता है.
पंजीकृत नहीं तमाम सिक्योरिटी एजेंसियां
लेकिन इनमें से तमाम सिक्योरिटी एजेंसी रजिस्टर्ड नहीं है. ठेकेदारी की तरह ऐसी कंपनियां सिक्योरिटी गार्ड महीने की एकमुश्त रकम पर रखती हैं. उन्हें न तो कोई ट्रेनिंग दी जाती है और न ही ज्वाइनिंग के पहले कोई मेडिकल फिटनेस. एसजी सोसायटी के राम लखन का कहना है कि 15 हजार में 4-5 हजार रुपये किराये पर चला जाता है. बाकी शहर की महंगाई में कुछ नहीं बचता है. गांव से शहर आकर कमाई की उम्मीद टूट गई.
बीमारी पर छुट्टी ली तो कट गई सैलरी
एक अन्य सोसायटी के ही 55 साल के अखिलेश प्रताप ने कहा, दस दिन पहले वो अचानक बीमार पड़ गए, अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. सिक्योरिटी एजेंसी से कोई मदद तो दूर, लगातार नौकरी से निकालने के फोन आते रहे. करीब 10 दिन न आने पर सैलरी काट ली. आंखों से आंसू पोछते हुए उन्होंने कहा, ESI जैसी कोई सुविधा उनके पास नहीं है. पहले भी एक सोसायटी में कांट्रैक्टर ने उनके कई महीनों का बकाया पैसा आज तक नहीं दिया.
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लेबर कमिश्नर से करें शिकायत
पूर्व लेबर अफसर सतीश त्यागी का कहना है कि दिल्ली एनसीआर में कुकुरमुत्तों की तरह ऐसी सोसायटी हैं. तमाम सोसायटी पंजीकृत नहीं हैं और न ही वो सिक्योरिटी गार्ड को पीएफ, पेंशन के लिए योगदान देती है. ऐसी सिक्योरिटी एजेंसियों के खिलाफ शिकायत लेबर कमिश्नर के पास की जा सकती है. श्रम विभाग अपने स्तर पर भी अभियान चला सकता है. नए या पुराने श्रम कानूनों के हिसाब से सिक्योरिटी गार्ड भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के हकदार हैं.

बीएस वोहरा
सिक्योरिटी एजेंसी का अपना दावा
नोएडा, गाजियाबाद में MI सिक्योरिटी एजेंसी के प्रबंधन से जुड़े अरुण कुमार का दावा है कि उनके यहां सिक्योरिटी गार्ड को पीएफ-पेंशन का लाभ मिलता है. हालांकि उनके यहां के निजी सुरक्षाकर्मियों ने इसे गलत बताया.पैसे न बढ़ने की बात भी बताई. वहीं सिक्योरिटी गार्ड्स को छुट्टी देने के सवाल पर वो चुप्पी साध गए.
श्रम संस्थान की रिपोर्ट चौंकाने वाली
देश में लगभग 80 लाख से 1 करोड़ लोग इस पेशे से जुड़े हैं. वीवी गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान (VVGNLI) ने दिल्ली-एनसीआर के सिक्योरिटी गार्डों पर एक लंबी केस स्टडी की थी.ये रिपोर्ट बताती है कि देश में हजारों ऐसी अनरजिस्टर्ड या फर्जी सिक्योरिटी एजेंसियां चल रही हैं, जो श्रम कानूनों का पालन नहीं करतीं.निजी सुरक्षा अभिकरण विनियमन कानून (PSARA) तो है, जमीनी लेवल पर सिक्योरिटी गार्डों को बुनियादी सुविधाएं या कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) और ग्राउंड सर्वे में पता चलता है कि कई राज्यों में तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर काम कराया जा रहा है.चौकीदार के साथ दुर्व्यवहार या मानसिक प्रताड़ना की घटनाएं होती हैं. अधिकांश गार्ड बिना किसी बुनियादी सुरक्षा ट्रेनिंग या बिना जरूरी उपकरणों के सीधे ड्यूटी पर तैनात किए जाते हैं. जबकि बहुत से सिक्योरिटी गार्ड तो शारीरिक रूप से सक्षम भी नहीं होते.
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क्या कहता है भारतीय श्रम कानून
भारतीय श्रम कानून जैसे नया लेबर कोड और शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट एक्ट में श्रमिकों, कामगारों और ऐसे प्राइवेट सिक्योरिटी कर्मियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़े नियम तय हैं. कानून के अनुसार, एक दिन में 8 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे ड्यूटी का नियम है. अगर 12 घंटे की शिफ्ट कराई जाए तो 4 दिन काम और 3 दिन छुट्टी होनी चाहिए. 8 घंटे से ऊपर काम करने पर दोगुना ओवरटाइम मिलना अनिवार्य है.
12-12 घंटे की शिफ्ट
हकीकत में लगभग 90 फीसदी गार्ड से बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के रोजाना 12 घंटे काम लिया जाता है. यानी सिंगल ड्यूटी के पैसे पर डबल काम. आठ घंटों के अलावा ड्यूटी का कोई ओवरटाइम नहीं मिलता. जरूरत पड़ने पर 24 घंटे की डबल शिफ्ट में भी काम लिया जाता है.कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) कानून के तहत, हर पंजीकृत सिक्योरिटी एजेंसी को गार्ड के वेतन से 12 फीसदी पीएफ अंशदान देना होता है और इतना ही कर्मियों की सैलरी से हिस्सा उसमें जमाक करना होता है. इसी का हिस्सा पेंशन फंड में जाता है. अनरजिस्टर्ड एजेंसियां गार्ड की इन हैंड सैलरी से पीएफ का पैसा तो काट लेती हैं, लेकिन उसे उनके पीएफ खाते में जमा ही नहीं करतीं. सिक्योरिटी गार्ड के पास यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) तक नहीं होता.
हफ्ते में कोई छुट्टी नहीं
श्रम कानूनों के हिसाब से हर कर्मचारी को हफ्ते में 1 दिन का अवकाश अनिवार्य है. बीमार होने पर मेडिकल लीव और बड़े त्योहारों पर छुट्टी या उसके बदले एक्स्ट्रा पैसे मिलने का हक है. लेकिन गार्ड के लिए छुट्टी लेने का मतलब सैलरी में कटौती. बीमारी में भी कोई नरमी नहीं. त्योहारों पर भी ड्यूटी का कोई ओवरटाइम नहीं मिलता. राज्य सरकारों के श्रम विभाग भी इन कानूनों का पालन कराने की कोई जहमत नहीं उठाते.
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