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तमिलनाडु चुनाव 2026: DMK के लिए कैसे 'संजीवनी' बन गया है परिसीमन का मुद्दा, क्या है BJP-AIADMK का हाल

संसद के बजट सत्र का तीन दिन का विस्तारित सत्र आज शुरू हुआ. इसमें सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर विधेयक लाएगी. तमिनाडु में चल रहे चुनाव प्रचार के दौरान यह सत्र बुलाने को लेकर कुछ लोग आश्चर्य जता रहे हैं, तमिलनाडु में परिसीमन पर राजनीति को समझिए.

तमिलनाडु चुनाव 2026: DMK के लिए कैसे 'संजीवनी' बन गया है परिसीमन का मुद्दा, क्या है BJP-AIADMK का हाल
चेन्नई:

इन दिनों तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं. इस चुनाव में सत्ताधारी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) इस चुनाव को 'तमिलनाडु बनाम दिल्ली' बनाने की कोशिश कर रहा है. डीएमके का प्रचार तंत्र यह काम 2019 के लोकसभा चुनाव से करता आ रहा है. वह लगातार इस बात का प्रचार कर रहा है कि बीजेपी तमिलनाडु की पहचान के लिए एक बड़ा खतरा है. वह एआईएडीएमके को बीजेपी का गुलाम बताता है. वह बताता है कि तमिलनाडु में डीएमके ही एकमात्र ऐसा दल है जो नई दिल्ली के सामने खड़ा हो सकता है. 

दिल्ली बनाम तमिलनाडु की लड़ाई

यह स्टालिन सरकार की कल्याणकारी योजनाएं और चुनावी घोषणाओं के साथ डीएमके प्रचार अभियान का हिस्सा है. इस रणनीति के दो हिस्से हैं, विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीको) को चर्चा से बाहर रखना और 'केंद्र बनाम राज्य' के टकराव को बनाए रखना, जो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में काफी प्रभावी सिद्ध हुआ था. लेकिन यह मुद्दा अब थका हुआ लगने लगा है. लगातार तीन चुनाव में मुख्य मुद्दा बने रहने के बाद अब स्थानीय मुद्दे हावी होने लगे थे. टीवीके के समर्थकों की ताकत मौजूदा स्थिति को बदलने की चुनौती दे रही थी. इसके अलावा एआईएडीएमके का संगठन फिर से मजबूत होता दिख रहा था. इन सब वजहों से डीएमके असहज महसूस कर रही थी.

इसी बीच परिसीमन का मुद्दा सामने आया. संसद के विशेष सत्र के समय ने तमिलनाडु के कई विश्लेषकों को चौंकाया है, क्योंकि संसद की घटनाएं राज्य के चुनावी नैरेटिव को निर्णायक रूप से प्रभावित करेंगी. यह मुद्दा डीएमके के अनुकूल है. यह उस राजनीतिक नैरेटिव को नई ऊर्जा देता है जो कमजोर पड़ रही थी. डीएमके ने इस मुद्दे को तमिलनाडु के खिलाफ भेदभाव के सबसे बड़े सबूत के तौर पर पेश करने की रणनीति में महारत हासिल कर ली है.

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क्या एआईएडीएमके को होगा नुकसान

केंद्र सरकार क्या कहती है और तमिलनाडु के चुनावी माहौल में उसे कैसे सुना जाता है, इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क होगा. यह बदलाव चुनावी मुकाबले को साफ तौर पर डीएमके बनाम बीजेपी की सीधी लड़ाई में बदल देता है. इस वजह से एआईएडीएमके काफी असहज स्थिति में पहुंच गई है. 

यह मुद्दा केवल परिसीमन तक सीमित नहीं है, यह केंद्र के खिलाफ अविश्वास का एक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश भी है. इसको  लेकर डीएमके के तर्क इस प्रकार हैं-

बिल में हर राज्य के लिए सीट बढ़ोतरी के फॉर्मूले को लेकर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं है. 

केंद्र पर भरोसा नहीं किया जा सकता, बल्कि उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

विधानसभा चुनाव के बीच अचानक इस मुद्दे का आना संदिग्ध बनाता है.

इस बिल के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने वाली एकमात्र ताकत डीएमके ही है.

केंद्र सरकार क्या प्रस्ताव ला रही है

केंद्र सरकार की ओर से लाया जा रहा यह बिल लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव करता है, हालांकि, बिल में लिखित रूप से किसी अनुपात या फॉर्मूले की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन केंद्र ने संसद में यह आश्वासन देने की बात कही है कि सभी राज्यों के लिए एक समान 50 फीसदी की बढ़ोतरी होगी न कि जनसंख्या के आधार पर बढ़ोतरी. 

हालांकि, इस तरह का आश्वासन भी विवादास्पद है, क्योंकि यह सभी नागरिकों के समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के उद्देश्य को ही कमजोर करता है. आखिर यह बढ़ोतरी क्यों की जा रही है और इतनी जल्दबाजी क्यों है, यह बात अभी भी एक पहेली बना हुआ है. ये तर्क इतने जटिल हैं कि चुनाव के शोर में आम जनता के लिए इन्हें समझ पाना मुश्किल है. इस समय यह मुद्दा संतुलित बहस की बजाय भावनाओं और प्रचार को ज्यादा बढ़ावा देगा, जबकि वास्तव में यह एक ऐसा विषय है जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को आकार देने वाला है.

दरअसल, कुछ दिन पहले एआईएडीएमके के एक रणनीतिकार ने परिसीमन बिल की संभावना के सवाल पर कहा था,''हमें भरोसा है कि वे इसे नहीं लाएंगे.'' लेकिन अब इसके आ जाने से पार्टी को नुकसान हुआ है, खासकर तब जब डीएमके लगातार एडप्पडी के पलानीस्वामी (ईपीएस) पर बीजेपी के सामने झुकने का आरोप लगाती रही है.

टीवीके और बीजेपी का फायदा नुकसान

इसका एक और बड़ा असर यह है कि यह मुद्दा टीवीके को नैरेटिव से बाहर कर सकता है. यह डीएमके को अपनी स्थिति मजबूत करने का एक मौका देता है और जमीनी स्तर पर ऐसा तर्क देता है जिससे विजय की एंट्री से ध्यान हटाया जा सके.
हालांकि इससे विजय की फैन फॉलोइंग या उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता कम नहीं होगी, लेकिन यह डीएमके के मुख्य वोट बैंक को कमजोर होने से बचाता है. यह मुद्दा दुविधा में फंसे वोटरों को वापस डीएमके की ओर लाने का एक ठोस आधार देता है. लेकिन डीएमके के लिए अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए इतना ही काफी हो सकता है.

बीजेपी की रणनीति में महिलाओं वोटरों को लुभाने के लिए महिला आरक्षण बिल को आगे बढ़ाना शामिल हो सकता है. यह इस अचानक बुलाए गए विशेष सत्र की एक संभावित वजह हो सकती है. इस रणनीति का लाभ बीजेपी को पश्चिम बंगाल में कितना मिलता है, यह देखना अभी बाकी है. लेकिन तमिलनाडु में यह डीएमके के हित में जाता हुआ दिख रहा है. यह डीएमके को वह ताकत देता है, जिससे वह विपक्ष की रक्षा पंक्ति को भेद सकता है. 

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