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तमिलनाडु में मौजूदा राजनीतिक हालात के बीच प्रमोद महाजन का ये पुराना भाषण क्यों हो रहा वायरल?

महाजन का करीब 45 मिनट का यह भाषण चुटीले अंदाज और राजनीतिक प्रहारों से लैस था. इस भाषण का सत्ता पक्ष के सांसदों ने भी खूब आनंद उठाया था.

तमिलनाडु में मौजूदा राजनीतिक हालात के बीच प्रमोद महाजन का ये पुराना भाषण क्यों हो रहा वायरल?
  • 1996 के लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी
  • प्रमोद महाजन ने 1997 में लोकसभा में गठबंधन राजनीति की विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक भाषण दिया
  • महाजन ने बताया कि सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी विपक्ष में थी, जबकि एकल सदस्य वाली पार्टी से मंत्री बने थे
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नई दिल्ली:

तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा और सरकार बनाने की खींचतान के बीच बीजेपी के दिवंगत नेता प्रमोद महाजन का एक पुराना भाषण लोगों को याद आ रहा है. तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद टीवीके को पहले सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाया गया. टीवीके को सरकार बनाने के लिए एक-एक, दो-दो विधायकों की पार्टियों के आगे-पीछे घूमना पड़ा, जबकि दो विपरीत विचारधारा की पार्टियों डीएमके और एआईएडीएमके के गठबंधन की अटकलें भी लगीं. ऐसे में प्रमोद महाजन की गठबंधन की राजनीति और उसकी मजबूरी पर तीखी और व्यंग्यात्मक अंदाज में की गईं टिप्पणियां याद आ रही हैं.

प्रमोद महाजन का यह भाषण भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे यादगार और मजाकिया भाषणों में से एक माना जाता है. यह भाषण अप्रैल 1997 का है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी. तब प्रमोद महाजन ने अपने भाषण में गठबंधन राजनीति पर टिप्पणी की थी.

दरअसल, 1996 के लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया था. बीजेपी के पास अपने सहयोगियों (शिवसेना आदि) को मिलाकर भी केवल 194 के करीब सीटें थीं. वाजपेयी को उम्मीद थी कि क्षेत्रीय दल (जैसे टीडीपी, डीएमके या एजीपी) उन्हें समर्थन देंगे. लेकिन "धर्मनिरपेक्षता" के नाम पर सभी क्षेत्रीय दल एकजुट हो गए और बीजेपी को समर्थन नहीं मिला.

जब यह साफ हो गया कि सदन में उनके पास बहुमत नहीं है, तो वोटिंग से ठीक पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐतिहासिक भाषण दिया और 13 दिन में ही इस्तीफा दे दिया.

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वाजपेयी सरकार गिरने के बाद, गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चा  बनाया. 140 सीटों वाली कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया. संयुक्त मोर्चे के पास लगभग 190 सीटें थीं. कांग्रेस के 140 वोटों के सहारे देवेगौड़ा ने आसानी से बहुमत पा लिया. वे 1 जून 1996 को प्रधानमंत्री बने थे.

लेकिन जल्दी ही यह सरकार संकट में आ गई. उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने थे. उन्हें लगा कि देवेगौड़ा उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दे रहे हैं. देवेगौड़ा के कार्यकाल में कांग्रेस के कई नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने मामलों में जांच तेज हो गई थी. केसरी चाहते थे कि देवेगौड़ा दखल दें, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. 30 मार्च 1997 को, जब पूरा देश ईस्टर मना रहा था, सीताराम केसरी अचानक राष्ट्रपति भवन पहुंचे और समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया.

इसके बाद देवेगौड़ा सरकार का विश्वास प्रस्ताव लाया गया, जिस पर 11 अप्रैल 1997 को सदन में वोटिंग हुई. संयुक्त मोर्चे को 190 वोट मिले, जबकि विरोध में 292 वोट पड़े. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने खिलाफ वोट किया था.

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इसी दौरान प्रमोद महाजन ने यह भाषण दिया था. वे गठबंधन सरकार की विसंगतियों पर कटाक्ष कर रहे थे. उन्होंने एक किस्सा सुनाया कि जब वह चीन की यात्रा पर थे, तो वहां के सांसदों ने उनसे भारतीय लोकतंत्र के बारे में पूछा. उन्होंने इसे बड़े ही मजाकिया ढंग से समझाया.

उन्होंने कहा, "मैं प्रमोद महाजन हूं, सबसे बड़ी पार्टी से आता हूं, लेकिन मैं विपक्ष में हूं." महाजन की इस बात पर जोर से ठहाका लगा. फिर उन्होंने कांग्रेस सांसद चिंतामन पाणिग्रही की ओर इशारा करते हुए कहा, "यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी से हैं, यह सरकार के बाहर रहकर सरकार चला रहे हैं." लोकसभा में हंसी फिर बिखर गई. उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों के सांसदों की ओर इशारा कर कहा, "फिर मैंने एम ए बेबी को उठा दिया. उनका परिचय देते हुए कहा कि यह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी से हैं, यह मोर्चे के अंदर हैं लेकिन सरकार के बाहर हैं." इस पर कम्युनिस्ट पार्टियों के सांसद भी मुस्कराने लगे.

सबसे मज़ेदार टिप्पणी उन्होंने तत्कालीन मंत्री रमाकांत खलप पर की. महाजन ने कहा, "मैंने खलप का परिचय कराया. मैंने कहा वह अपनी पार्टी के अकेले सदस्य हैं और वह सरकार में हैं." इस पर पूरा सदन ठहाकों में डूब गया. दरअसल, महाजन इस उदाहरण के जरिए यह बता रहे थे कि 1997 में गठबंधन की राजनीति कितनी अजीब हो गई थी. जहां सबसे बड़ी पार्टी बाहर बैठी थी और एक अकेले सांसद वाली पार्टी का व्यक्ति मंत्री बना हुआ था. उन्होंने इसे 'विचित्र विसंगति' कहा था.

हालांकि इसके बाद भी देश में गठबंधन सरकारों का दौर चलता रहा. देवेगौडा की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस ने इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनवाया और कुछ समय बाद उनकी सरकार भी गिरा दी. इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में एक बार फिर खंडित जनादेश मिला और अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने. बाद में एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई. इसके बाद हुए चुनाव में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 2004 तक एनडीए की गठबंधन सरकार चलाई. 

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2004 से 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की गठबंधन सरकार रही. 2014 में 30 साल बाद ऐसा हुआ जब किसी एक पार्टी के अपने बूते बहुमत मिला हो. हालांकि इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में सहयोगियों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व दिया था, क्योंकि यह एनडीए की सरकार थी. 2019 में और अधिक सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी ने सरकार में सहयोगियों को बनाए रखा. 2024 में बीजेपी को अपने बूते बहुमत नहीं मिला और अभी वह सहयोगियों दलों के समर्थन से सत्ता में है.

महाजन का करीब 45 मिनट का यह भाषण चुटीले अंदाज और राजनीतिक प्रहारों से लैस था. इस भाषण का सत्ता पक्ष के सांसदों ने भी खूब आनंद उठाया था.

प्रमोद महाजन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की सार्वजनिक कार्यक्रमों में झपकियों का भी जिक्र किया था. उन्होंने कहा था, "पूरा देश इस बात को लेकर परेशान है कि सरकार गिरेगी या बचेगी, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री इतने निश्चिंत हैं कि उन्हें इस शोर-शराबे में भी गहरी नींद आ जाती है. शायद वे ही अकेले व्यक्ति हैं जो संकट के इस समय में भी शांति से सो सकते हैं."

उन्होंने कांग्रेस और संयुक्त मोर्चा के रिश्तों पर चुटकी ली थी. उन्होंने कहा था कि यह एक तरह का अजीब निकाह है. महाजन बोले, "यह एक ऐसी अजीब शादी है जिसमें दूल्हा (देवेगौड़ा) और दुल्हन के पिता (कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी) के बीच पहले दिन से ही झगड़ा चल रहा है. अभी तो हनीमून शुरू भी नहीं हुआ और तलाक की नौबत आ गई है."

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13 दलों के संयुक्त मोर्चा को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया हुआ था. महाजन ने इस पर भी व्यंग्य किया. उन्होंने कहा, "बाहर से समर्थन देना वैसा ही है जैसे कोई आपकी सीढ़ी पकड़कर खड़ा हो और जैसे ही आप आखिरी पायदान पर पहुंचें, वह सीढ़ी खींच ले. यह समर्थन नहीं, बल्कि सरकार को गिराने की तैयारी ज्यादा लगती है."

सहयोगी दलों में कुर्सी की खींचतान पर भी महाजन ने चुटकी ली थी. उन्होंने कहा था, "यह सरकार नहीं, बल्कि एक रेलवे स्टेशन का 'वेटिंग रूम' है. यहां हर कोई अपनी घड़ी देख रहा है और अगली ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है, ताकि इस डूबती नाव से बाहर निकल सके."

प्रमोद महाजन वाजपेयी सरकार में संसदीय कार्य मंत्री भी रहे. वे अपनी त्वरित टिप्पणियों, विपक्षी नेताओं से मधुर संबंधों और सदन को सुचारु रूप से चलाने के कारण सर्वश्रेष्ठ संसदीय कार्य मंत्रियों में भी माने जाते हैं.

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