- सुप्रीम कोर्ट ने 75 वर्षीय उम्रकैद दोषी को उसकी अपील लंबित होने के कारण जमानत दे दी
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा और चुनौती खारिज की
- ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले में यह कहते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे 75 साल के दोषी को दी गई जमानत को बरकरार रखा कि वह शायद अपने जीवनकाल में अपनी अपील का फैसला होते नहीं देख पाएगा. जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि भले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट को सजा पर रोक नहीं लगानी चाहिए थी लेकिन आरोपी की उम्र 75 साल है और उसकी अपील 2025 की है. ऐसे में यह संभव है कि वह अपने केस का अंतिम फैसला देखने के लिए जीवित ही न रहे.
ट्रायल कोर्ट ने दी उम्रकैद, हाई कोर्ट ने दी जनामत
दरअसल आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी थी. उसने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की और हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी. इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया.
1.83 लाख से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित
बता दें कि 2021 में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश आंकड़ों के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपीलों के निपटारे में औसतन करीब 35 साल लग जाते हैं. निपटान दर सिर्फ लगभग 18% है.1.83 लाख से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर दी जमानत
इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ पीठ दोनों में भारी लंबित मामलों का बोझ है. इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश में अगर कोई व्यक्ति ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाता है, तो उसे न्याय पाने के लिए दशकों तक इंतज़ार करना पड़ सकता है. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर फैसला देते हुए माना कि न्याय में अत्यधिक देरी भी एक महत्वपूर्ण कारक है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
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