सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के प्रसिद्ध चिदंबरम नटराज मंदिर के प्रशासन को लेकर मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. हाईकोर्ट ने मंदिर का प्रशासन परंपरागत पुजारी समुदाय ‘पोडु दीक्षितरों' से लेकर पांच सदस्यीय बोर्ड को सौंपने का निर्देश दिया था. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने दीक्षितरों की अपील पर तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया. पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि क्या ऐसा कोई सबूत है जिससे यह साबित हो कि मंदिर में हुए निर्माण संबंधी बदलावों के लिए दीक्षितर जिम्मेदार थे?
पीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद हमारा सुविचारित मत है कि विवादित फैसले पर रोक लगाई जानी चाहिए. उस फैसले पर रोक लगाई जाती है.
हाईकोर्ट ने पांच सदस्यीय बोर्ड को सौंपी थी प्रशासन की जिम्मेदारी
मद्रास हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर को अपने फैसले में मंदिर के प्रशासन की जिम्मेदारी पांच सदस्यीय बोर्ड को तत्काल सौंपने का निर्देश दिया था. बोर्ड में हाईकोर्ट के दो सेवानिवृत्त जज, एक सेवानिवृत्त IAS अधिकारी, पोडु दीक्षितरों के सचिव और राज्य के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के सचिव को शामिल किया गया था.
बोर्ड को मंदिर में दर्शन की व्यवस्था नियंत्रित करने, वित्तीय मामलों की निगरानी करने और मंदिर की संपत्तियों की वसूली का अधिकार दिया गया था. हालांकि, दैनिक पूजा-पाठ और समय-समय पर होने वाले धार्मिक उत्सवों की जिम्मेदारी दीक्षितरों के पास ही रखी गई थी.
कनक सभा से दर्शन की अनुमति को लेकर शुरू हुआ था विवाद
यह विवाद मई 2022 के तमिलनाडु सरकार के उस आदेश से शुरू हुआ था, जिसमें श्रद्धालुओं को मंदिर के भीतर स्थित ऊंचे मंच ‘कनक सभा' से दर्शन करने की अनुमति दी गई थी. इस मंच पर परंपरागत रूप से विशेष पूजा-अर्चना की जाती है
मंदिर का प्रशासन संभालने वाले वंशानुगत पुजारी दीक्षितरों ने इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सरकार का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक मामलों के प्रबंधन के उनके अधिकार में हस्तक्षेप करता है
हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि कनक सभा से श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति देने से धार्मिक अनुष्ठानों में कोई बाधा नहीं आएगी. हालांकि, हाईकोर्ट ने मंदिर में आधुनिक निर्माण के कारण कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचने और मंदिर के खातों तथा संपत्ति के रिकॉर्ड की जांच की जरूरत पर भी टिप्पणी की थी. इसी आधार पर पांच सदस्यीय बोर्ड के गठन का निर्देश दिया गया था.
दीक्षितरों ने 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट में दीक्षितरों की ओर से वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने कनक सभा से दर्शन के विवाद से आगे बढ़कर पूरे मंदिर का प्रशासन ही दीक्षितरों से छीन लिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2014 के सुब्रमण्यम स्वामी फैसले का हवाला दिया. उस फैसले में मंदिर के प्रशासन के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी.
वैद्यनाथन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही दीक्षितरों को एक धार्मिक संप्रदाय के रूप में मान्यता देते हुए मंदिर के प्रशासन के उनके अधिकार को स्वीकार कर चुका है. उन्होंने मंदिर में बदलाव के लिए दीक्षितरों को जिम्मेदार ठहराने के दावे का भी विरोध किया. साथ ही कहा कि मंदिर के ऑडिट किए गए खाते पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं.
तमिलनाडु सरकार ने हेरिटेज कमीशन की रिपोर्ट का दिया हवाला
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील ने हेरिटेज कमीशन की रिपोर्ट का हवाला दिया. रिपोर्ट में मंदिर की संरचना में किए गए बदलावों का उल्लेख किया गया था. इसमें नटराज मंदिर के गर्भगृह की ओर जाने वाले रास्ते में बदलाव भी शामिल था. सरकार ने मंदिर के खातों को लेकर भी चिंता जताई और सुप्रीम कोर्ट से जवाब दाखिल करने तक अंतरिम राहत पर फैसला टालने का आग्रह किया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी.
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