1991 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के दोषी अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को अपनी मांग का समर्थन करते हुए फैसलों पर लिखित दलीलें एक हफ्ते में दाखिल करने को कहा है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सलेम के वकील ऋषि मल्होत्रा से पूछा कि आप सलेम के 25 साल जेल में रहने का गणित हमें समझा दीजिए. इस पर मल्होत्रा ने कहा कि इसी कोर्ट ने 2022 में व्यवस्था दी थी कि जेल में अच्छा बर्ताव भी समय पूर्व रिहाई का आधार हो सकता है.
सलेम की वकील ने क्या दलील दी?
सलेम के वकील ने कहा, "मेरी तो जेल में अर्जित छूट यानी रियायत भी है. उसकी गिनती भी सजा घटाने में की जाती है. कैद के 25 साल का वक्त पूरा होते ही सीआरपीसी की धारा 432 के तहत कैदी रिआयत का पात्र होता है."
दरअसल पुरानी अपराध प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 432 और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 473 के तहत सरकार को किसी भी दोषी की सजा को पूरी तरह या आंशिक रूप से माफ करने, निलंबित करने या कम करने की शक्ति दी गई है. इसमें अदालत की राय लेना और शर्तें पूरी न होने पर छूट रद्द करना शामिल है.
भारतीय एजेंसियों ने एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी सलेम को 11 नवंबर 2005 को पुर्तगाल से प्रत्यर्पित कराया गया था. वहीं, सलेम का कहना है कि भारत द्वारा पुर्तगाल को उसके प्रत्यर्पण के लिए दिए गए आश्वासन के अनुसार, उसकी सजा 25 साल से अधिक नहीं हो सकती.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सलेम से ये बात पूछी है कि साल 2005 से 2026 तक 25 साल कैसे हो सकते हैं और इस सजा की गिनती किस आधार पर कर याचिका दी गई है.
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