- सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि पितृत्व विवाद में शख्स का DNA टेस्ट कराया जा सकता है
- कोर्ट ने कहा कि कथित पिता पहले किसी रेप केस में बरी हो चुका हो फिर भी उसका टेस्ट करया जा सकता है
- आपराधिक मामले में बरी होना यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति जैविक पिता नहीं हो सकता
रेप केस में बरी होने के बावजूद पितृत्व विवाद में आरोपी का DNA टेस्ट कराया जा सकता है, ये सख्त टिप्पणी की है सुप्रीम कोर्ट ने. अदालत ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पितृत्व विवाद के मामलों में अदालत DNA टेस्ट का आदेश दे सकती है, भले ही कथित पिता पहले किसी रेप केस में बरी हो चुका हो. बेंच ने ये भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में बरी होना यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति जैविक पिता नहीं हो सकता.
पितृत्व स्वीकार करने से इनकार तो होगा DNA टेस्ट
यह विवाद साल 1999 से जुड़ा है. एक व्यक्ति ने दावा किया कि उसका जन्म सितंबर 1999 में हुआ था और वह अपीलकर्ता का जैविक बेटा है. उसकी मां का कहना था कि अपीलकर्ता के साथ उसके संबंधों के चलते ही उसका जन्म हुआ. हालांकि, अपीलकर्ता ने शुरू से ही पितृत्व स्वीकार करने से इनकार किया था. अपीलकर्ता ने अपने बचाव में यह दलील दी कि महिला द्वारा दर्ज कराए गए रेप के मामले में वह पहले ही बरी हो चुका है. साथ ही उसने यह भी कहा कि पूर्व में हुए अन्य मुकदमों और अदालत की टिप्पणियों के कारण पितृत्व का मुद्दा दोबारा नहीं उठाया जा सकता.
खुद को बताया रेप केस से बरी शख्स का बेटा
बालिग होने के बाद युवक ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर यह घोषणा करने की मांग की कि वह अपीलकर्ता का जैविक बेटा है और इसलिए उसकी संपत्ति में हिस्सेदारी का हकदार है. मुकदमे की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने DNA टेस्ट कराने का आदेश दिया, जिसे बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा. इसके बाद अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
बरी होने का मतलब सिर्फ इतना कि आरोप साबित नहीं हुए
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने अपील खारिज करते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में बरी होने का मतलब केवल इतना है कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके. इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों बालिगों के बीच कोई जैविक संबंध नहीं था. इसलिए पितृत्व का सवाल अब भी खुला रह सकता है और उसकी जांच की जा सकती है.
पिता कौन है बेटे को से जानने का हक
अदालत ने कहा कि इस मामले में एक ओर अपीलकर्ता का निजता का अधिकार है, जबकि दूसरी ओर युवक का अपने जैविक पिता की पहचान जानने और उससे जुड़े कानूनी अधिकार प्राप्त करने का अधिकार है. युवक ने बचपन से अपनी मां को यह कहते सुना था कि अपीलकर्ता उसका पिता है, जबकि विभिन्न स्तरों पर इस दावे को स्वीकार नहीं किया गया. यदि इस सवाल का कभी अंतिम जवाब नहीं मिला, तो संभव है कि वह उन अधिकारों से वंचित रह जाए जिनका वह वास्तव में हकदार हो सकता है.
DNA टेस्ट कराने से कोई परहेज नहीं
पीठ ने फैसले में कहा कि अगर पितृत्व के सवाल का कोई निश्चित जवाब कभी सामने नहीं आता, तो संभव है कि संबंधित व्यक्ति उन अधिकारों से हमेशा के लिए वंचित रह जाए, जिनका वह जैविक पुत्र होने के नाते हकदार हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामले के निपटारे के लिए DNA परीक्षण आवश्यक है इसलिए अदालत ने अपील खारिज कर दी और अपीलकर्ता को DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया.
रेप केस में बरी होना पितृत्व विवाद का अंतिम समाधान नहीं
इस फैसले से ये साफ कर दिया गया है कि रेप केस में बरी होना पितृत्व विवाद का अंतिम समाधान नहीं है. संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े मामलों में DNA परीक्षण महत्वपूर्ण सबूत हो सकता है. अदालतों को निजता के अधिकार और किसी व्यक्ति के अपनी पहचान जानने के अधिकार के बीच संतुलन बनाकर फैसले लेने होंगे.
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