- सुप्रीम कोर्ट ने झूठी FIR दर्ज कराने और सबूत गढ़ने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की याचिका पर नोटिस जारी किया
- याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 और 379 के मौजूदा स्वरूप को चुनौती दी गई है
- वर्तमान में झूठी FIR या झूठे सबूत से जुड़ी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल केस के जज को ही है
झूठी FIR दर्ज कराने और सबूत गढ़ने वाले व्यक्तियों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के साथ‑साथ सभी राज्यों को नोटिस भेजा है. दरअसल, वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 215 और 379 के मौजूदा स्वरूप को चुनौती दी गई है. इस याचिका में कहा गया है कि इन धाराओं के कारण पीड़ित व्यक्ति झूठी शिकायत और झूठी गवाही के मामलों में सीधे कार्रवाई शुरू नहीं कर पाते.
ये भी पढ़ें : ‘जमीन के बदले नौकरी' केस में लालू यादव को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
सिर्फ जज को शिकायत का अधिकार
याचिका के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में झूठी FIR या झूठे सबूत से जुड़े मामलों में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल केस की सुनवाई कर रहे जज को ही है. पीड़ित व्यक्ति खुद इस तरह की कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता. याचिका में यह भी कहा गया है कि व्यवहार में जज इस तरह की शिकायत नहीं करते, क्योंकि शिकायतकर्ता बनने की स्थिति में उन्हें उस केस से अलग होना पड़ता है और मामला दूसरी अदालत में चला जाता है. इसके बाद संबंधित जज को गवाह के तौर पर अदालत में पेश होना पड़ सकता है.
ये भी पढ़ें : सुप्रीम कोर्ट से DNT समुदायों को बड़ा झटका, जानें क्यों अलग पहचान की मांग वाली याचिका हुई खारिज
प्रावधानों की दोबारा व्याख्या की मांग
याचिका में मांग की गई है कि BNSS के प्रावधानों की दोबारा व्याख्या की जाए, ताकि पीड़ितों को अदालत की अनुमति के साथ झूठी FIR और उससे जुड़े अपराधों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार मिल सके.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं