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ट्रंप हट रहे पीछे, फिर भी ईरान जंग खत्म करने को राजी क्यों नहीं है?

कर्नल रिटा. राजीव अग्रवाल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 24, 2026 14:50 pm IST
    • Published On मार्च 24, 2026 14:45 pm IST
    • Last Updated On मार्च 24, 2026 14:50 pm IST
ट्रंप हट रहे पीछे, फिर भी ईरान जंग खत्म करने को राजी क्यों नहीं है?

US Israel War against Iran: 23 मार्च को जब अमेरिका में बाजार खुलने वाले थे और ईरान को हॉर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए दी गई 48 घंटे की समयसीमा खत्म होने वाली थी, ठीक तभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक एक घोषणा कर दी. उन्होंने ईरान की ऊर्जा और परमाणु ठिकानों पर किसी हमलों को अगले पांच दिनों के लिए “रोक” देने का फैसला किया. एक तरफ तो दुनिया भर के बाजारों ने ट्रंप के इस घोषणा पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, लेकिन ईरान ने ट्रंप ने कोई सहमति नहीं दिखाई. ईरान ने साफ-साफ कहा कि उसकी अमेरिका के साथ कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातचीत नहीं हुई है.

इसी तरह इजरायल ने भी ट्रंप की तरह हमलों को रोकने की घोषणा नहीं की. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल वही कदम उठाएगा जो उसके अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए सबसे बेहतर होंगे. इस अचानक घोषणा के बाद चर्चा होने लगी कि शायद अब युद्ध खत्म करने का कोई रास्ता निकल सकता है. लेकिन सच्चाई यह है कि इस बीच, ईरान और इजरायल ने रात भर एक-दूसरे पर मिसाइल हमले जारी रखे. वहीं दुनिया ट्रंप की अचानक घोषणा को लेकर सावधानी भरी उम्मीद के साथ इंतजार कर रही है.

ईरान में जंग अब चौथे हफ्ते में पहुंच चुकी है. अमेरिका की इस “एकतरफा रोक” के बावजूद न तो युद्ध खत्म होने के संकेत हैं और न ही सीजफायर के. राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार दावा कर चुके हैं कि युद्ध के लक्ष्य पूरी तरह हासिल हो चुके हैं, ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया गया है और ईरानी सशस्त्र बलों का 100 प्रतिशत सफाया हो चुका है. उन्होंने यह भी कहा है कि अमेरिका क्षेत्र में अपने सैन्य अभियान को “समेटने” पर विचार कर रहा है.

फिर भी युद्ध लगातार जारी है. दरअसल हर गुजरते दिन के साथ संघर्ष का दायरा बढ़ता जा रहा है और यह खतरा सिर्फ क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए ज्यादा गंभीर होता जा रहा है. अब सवाल यह है कि ये नए खतरे क्या हैं? तनाव इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है? क्या बातचीत के जरिए इस युद्ध को खत्म करने की कोई संभावना है? और क्या जल्द कोई रास्ता निकल सकता है?

अमेरिका और इजराय के 3 शुरुआती उद्देश्य

जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर पहले हमले शुरू किए, तब उनके तीन मुख्य घोषित उद्देश्य थे.

  • पहला- ईरान के नेतृत्व, सेना, ढांचे और अर्थव्यवस्था को इतनी भारी चोट पहुंचाना कि ईरान के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाए. इसके बाद या तो सरकार घुटने टेक दे या जनता सड़कों पर उतरकर सरकार को गिरा दे.
  • दूसरा- ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को नष्ट करना, जिसे दोनों बड़ा खतरा मानते हैं.
  • तीसरा- ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना सके, इसलिए उसके परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना.

इन उद्देश्यों के साथ शुरुआती दिनों में इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर नेतृत्व को खत्म करने वाले हमले किए. पहले ही दिन एक टारगेटेड हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या कर दी गई. इसके अलावा कई टारगेटेड हमलों में सैन्य कमांडरों सहित 40 से ज्यादा सीनियर अधिकारियों को मार दिया गया.

इसी तरह ईरान के हथियार भंडार, मिसाइल साइलो और मोबाइल लॉन्चरों को निशाना बनाया गया, ताकि उसकी मिसाइल क्षमता पूरी तरह कमजोर हो जाए. इसके बाद गैस क्षेत्रों और तेल भंडारों पर हमले किए गए, ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाया जा सके. इन सबको देखते हुए यह अभियान कुछ ही दिनों में खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन उम्मीदों के विपरीत ईरान अभी भी मजबूती से खड़ा है और कड़ी टक्कर दे रहा है. हर नए हमले के साथ ईरान और जोरदार जवाब दे रहा है, जिससे संघर्ष का दायरा और बढ़ रहा है और युद्ध खत्म होने का रास्ता मुश्किल होता जा रहा है.

हॉर्मुज का फांस

तनाव बढ़ाने वाली सबसे बड़ी घटना हॉर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना है. यह दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति (गैस-तेल) के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है. भले इस जलडमरूमध्य में अभी तक बारूदी सुरंगें नहीं बिछाई गई हैं, लेकिन ईरान की ओर से ऐसा करने की चेतावनी और कुछ तेल टैंकरों पर हमलों ने जहाज कंपनियों और बीमा कंपनियों को डरा दिया है. इनके जोखिम लेने को तैयार न होने के कारण जहाज इस रास्ते से गुजर नहीं पा रहे हैं. भले भारत और चीन जैसे कुछ देशों को अपने टैंकरों के लिए सीमित अनुमति मिल गई है, लेकिन यह समुद्री रास्ता वैश्विक यातायात के लिए लगभग बंद है. ऐसे हालात में युद्ध खत्म करना मुश्किल हो गया है. अमेरिका के लिए भी इस मुद्दे का समाधान किए बिना अपना अभियान खत्म करना कठिन होगा.

इसी कारण 21 मार्च को ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर 23 मार्च तक हॉर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोला गया, तो अमेरिका-इज़राइल मिलकर ईरान के ऊर्जा और बिजली ढांचे को निशाना बनाएंगे. ईरान ने इस धमकी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि अगर उसके ऊर्जा ढांचे पर हमला हुआ तो वह पूरे खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ढांचे और समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्रों को निशाना बनाएगा.

खाड़ी के देश पीने के पानी के लिए इन संयंत्रों पर लगभग पूरी तरह निर्भर हैं. इसलिए अगर ईरान ऐसा करता तो बड़ा मानवीय संकट पैदा हो सकती थी. शायद इसी वजह से ट्रंप ने इस खतरे के परिणामों पर दोबारा विचार करने के लिए 5 दिनों की रोक की घोषणा की.

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परमाणु खतरा

युद्ध के शुरुआती चरण में परमाणु ठिकानों पर हमले किए गए थे, लेकिन अब लगता है कि ईरान अपने परमाणु संयंत्रों पर और हमले बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है. 20 मार्च को अमेरिका द्वारा नतांज परमाणु संयंत्र पर हमले के बाद ईरान ने एक बड़ा जवाब दिया. उसने दक्षिणी इजरायल के शहर डिमोना पर सफल मिसाइल हमला किया, जहां एक अत्यंत सुरक्षित और गुप्त परमाणु अनुसंधान केंद्र स्थित है. ईरानी मिसाइलों का इजरायल के बहुस्तरीय एयर डिफेंस सिस्टम को पार कर डिमोना तक पहुंचना इस संघर्ष में तनाव का नया स्तर जोड़ता है. हालांकि ईरान ने सीधे परमाणु केंद्र को निशाना नहीं बनाया, लेकिन अगर तनाव और बढ़ा तो कोई मिसाइल डिमोना परमाणु संयंत्र को भी लग सकती है.

अगर ऐसा हुआ तो न केवल रेडिएशन लीक का गंभीर खतरा पैदा होगा, बल्कि यह भी डर है कि इजरायल या अमेरिका जवाब में सामरिक परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की फैसले तक न पहुंच जाएं.

क्या युद्ध खत्म होने का रास्ता है?

अमेरिका से मिल रहे संकेत बताते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्दी इस युद्ध से निकलना चाहते हैं. इजरायल के कहने पर वे युद्ध में तो शामिल हो गए, लेकिन उन्होंने इतने लंबे संघर्ष या ईरान के इतने मजबूत जवाब की उम्मीद नहीं की थी. लेकिन इस बार युद्ध खत्म करना आसान नहीं होगा. कुछ रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ईरान के खार्ग द्वीप पर विशेष बल उतारकर वहां से तेल और गैस निर्यात पर नियंत्रण करने की योजना पर विचार कर रहा है. मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि अमेरिका 3000 से 5000 मरीन सैनिकों को ईरान में जमीनी अभियान के लिए तैयार कर रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के पास सुरक्षित रखे 60 प्रतिशत तक समृद्ध 440 किलोग्राम यूरेनियम को अपने नियंत्रण में लेना है.

अमेरिका और इजरायल को डर है कि अगर यह यूरेनियम ईरान के पास रहा तो वह तेजी से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ सकता है. वहीं इजरायल के लिए यह युद्ध तब तक खत्म नहीं होगा जब तक वह अपनी मुख्य योजना- ईरान में सत्ता परिवर्तन- पूरा नहीं कर लेता. अब मुजतबा खामेनेई सुप्रीम लीडर बन चुके हैं, और इजरायल के सामने स्थिति पहले से ज्यादा कठिन हो गई है.

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ईरान के लिए सम्मान की लड़ाई

ईरान की मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म करना भी अब अवास्तविक लगता है, क्योंकि हर दिन ईरान और ज्यादा घातक और तेज मिसाइलें दाग रहा है. इनमें से कई अपने लक्ष्य पर लग रही हैं और इजरायल में भारी नुकसान कर रही हैं. इजरायल के नजरिए से परमाणु खतरा भी तब तक बना रहेगा जब तक 440 किलोग्राम समृद्ध यूरेनियम उसके हाथ नहीं लगता.

ईरान के लिए भी यह युद्ध अब सिर्फ तबाही का एक और अध्याय नहीं रह गया है. लगातार हवाई और मिसाइल हमलों से ईरान में भारी तबाही हुई है. उसके सुप्रीम लीडर और शीर्ष नेतृत्व मारे जा चुके हैं, नौसेना और वायुसेना लगभग नष्ट हो चुकी हैं, और उसके परमाणु ठिकानों तथा तेल-गैस क्षेत्रों पर लगातार हमले हुए हैं. इसके अलावा नागरिकों की भी बड़ी संख्या में मौत हुई है. जंग के पहले ही दिन तेहरान के एक स्कूल पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल हमले में 160 से ज्यादा लड़कियों की दुखद मौत हो गई थी.

इसी वजह से ईरान के लिए यह युद्ध अब अंत तक लड़ने की लड़ाई बन गया है. वह चाहता है कि उसकी प्रतिष्ठा बहाल हो, परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के तहत यूरेनियम संवर्धन का उसका अधिकार स्वीकार किया जाए, आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और अमेरिका तथा इजरायल से यह पक्की गारंटी मिले कि वे दोबारा युद्ध शुरू नहीं करेंगे.

इजरायल के पास सीमित विकल्प

हर गुजरते दिन के साथ युद्ध का स्तर और बढ़ता जा रहा है. पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्रों को निशाना बनाने की धमकी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य का बंद रहना न सिर्फ क्षेत्र बल्कि पूरी दुनिया पर आर्थिक और मानवीय असर डाल रहा है. अब उम्मीद केवल यही है कि राष्ट्रपति ट्रंप किसी भी तरह की जीत का दावा कर इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता निकाल लें.

अगर अमेरिका पीछे हट जाता है तो मौजूदा स्थिति में इजरायल अकेले यह युद्ध जारी नहीं रख पाएगा. दुनिया से युद्ध में साथ देने की नेतन्याहू की अपील भी इस बात का संकेत है कि इजरायल अकेले इस लड़ाई को खत्म नहीं कर सकता. इस बीच ईरान सतर्क है और किसी भी नए खतरे का जवाब देने के लिए तैयार बैठा है. इस लड़ाई में उसके लिए केवल अपने शासन का बच जाना ही एक बड़ी जीत माना जाएगा.

(लेखक एक रिटायर्ड सेना अधिकारी और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च कंसल्टेंट हैं. यह एक ओपिनियन पीस है और यह लेखक के निजी विचार हैं. NDTV इंडिया का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है.)

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