दिवाली पर पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पटाखों पर पूरी तरह बैन लगाना सुनने में आदर्श समाधान लगता है, लेकिन अभी ऐसा कोई ठोस डेटा मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि केवल बैन लगाने से वायु प्रदूषण की समस्या हल हो जाती है. कोर्ट ने यह भी कहा कि दिल्ली-एनसीआर में 2024 में पूरी तरह प्रतिबंध लागू होने के बावजूद एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा.
अदालत ने क्या-क्या कहा?
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने दिवाली पर दो दिन ग्रीन पटाखे फोड़ने की अनुमति देते हुए कहा कि फिलहाल उसके पास इतना पर्याप्त डेटा नहीं है कि यह तय किया जा सके कि पूर्ण प्रतिबंध ही प्रदूषण से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है.
राज्य सरकारें डेटा देने में रहीं नाकाम
सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि अक्टूबर 2025 में उसने एक 'टेस्ट केस' के तौर पर अस्थायी राहत देते हुए राज्यों को ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का अध्ययन करने का निर्देश दिया था. लेकिन अदालत के अनुसार राज्यों ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया और आवश्यक आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए.
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्यों और संबंधित एजेंसियों ने वह सामग्री ही पेश नहीं की जिसके आधार पर यह आकलन किया जा सके कि प्रतिबंध का वास्तविक असर क्या पड़ा.
अदालत ने एमिकस क्यूरी की ओर से पेश पृष्ठभूमि रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इस साल दशहरा और उसके अगले दिन भी AQI में भारी उछाल दर्ज किया गया, जबकि पटाखों पर प्रतिबंध लागू था. इससे यह सवाल उठता है कि प्रदूषण के लिए केवल पटाखों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
अदालत ने स्कंद पुराण और पद्म पुराण का किया जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि बाजार में आज भी पारंपरिक पटाखे ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचे जा रहे हैं. अदालत ने कहा कि पूर्ण प्रतिबंध का फायदा अवैध कारोबारियों को मिल रहा है, जबकि असली ग्रीन पटाखे और परीक्षण से प्रमाणित नई पीढ़ी के पर्यावरण-अनुकूल पटाखे खरीदने वाले उपभोक्ता नुकसान में हैं.
अदालत ने यह भी कहा कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण और पद्म पुराण में दीपावली के दौरान दीप जलाने का जिक्र मिलता है. पटाखों का चलन बाद में बारूद आने के साथ शुरू हुआ.
शीर्ष अदालत ने कहा, "'स्कंदपुराण' और 'पद्मपुराण' जैसे पुराने हिंदू धर्मग्रंथों में दीपावली के त्योहार को मनाते समय दीयों के इस्तेमाल को एक रस्म के तौर पर बताया गया है. कुछ सदियों पहले भारत में गन-पाउडर के आने के बाद, इस त्योहार में बदलाव आया. इससे पटाखे फोड़ने की शुरुआत हुई, जो कई सालों से बड़े पैमाने पर किए जा रहे हैं."
अनुच्छेद 25 से ऊपर पर्यावरण का अधिकार नहीं
कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है. यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है. बेंच ने कहा कि किसी धार्मिक रंग वाली प्रथा को अपनाने का अधिकार भी संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही है. वहीं अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ, सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार प्राप्त है.
समस्या बैन नहीं, अमल की है
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पटाखे फोड़ने से प्रदूषण जरूर होता है, लेकिन अब तक लागू किए गए उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं. अदालत के मुताबिक समस्या नियम बनाने से ज्यादा उनके प्रभावी तरीके से अमल में लाने की है. कोर्ट ने कहा कि सभी संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है और निगरानी सिर्फ त्योहारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे साल जारी रहनी चाहिए. तभी प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास असरदार साबित होंगे.
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