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पराली जलाने के मामलों में आई कमी, फिर भी पंजाब सबसे आगे; 7 राज्यों में कितनी घटनाएं दर्ज हुई?

15 सितंबर से 1 नवंबर 2026 के बीच सात राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं में 26.63 प्रतिशत की कमी आई है और कुल 3,316 मामले दर्ज हुए हैं.

पराली जलाने के मामलों में आई कमी, फिर भी पंजाब सबसे आगे; 7 राज्यों में कितनी घटनाएं दर्ज हुई?
सांकेतिक तस्वीर
NDTV

पंजाब में पराली जलाने के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं. हालांकि, 15 सितंबर से एक नवंबर के बीच सात राज्यों में धान की पराली जलाने के मामलों में 26.63 प्रतिशत की कमी आई और इनकी संख्या घटकर 3,316 रह गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के आंकड़ों में यह जानकारी दी गई है.

आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में पंजाब में पराली जलाने की सबसे अधिक 1,514 मामले दर्ज किए गए. इसके बाद राजस्थान में 671, मध्य प्रदेश में 566, उत्तर प्रदेश में 345, उत्तराखंड में 176, हरियाणा में 42 और दिल्ली में दो मामले सामने आए.

राज्यों के किन जिलों में सबसे अधिक मामले दर्ज

पंजाब में अमृतसर, फिरोजपुर, कपूरथला, संगरूर, बठिंडा, फरीदकोट, पटियाला, बरनाला और फाजिल्का में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए.

राजस्थान में बारां, बूंदी, गंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा और सवाई माधोपुर में पराली जलाने के अधिक मामले सामने आए.

वहीं, मध्य प्रदेश के श्योपुर, सीहोर, नर्मदापुरम, गुना, दतिया और अशोकनगर जिलों में ऐसे मामले अधिक दर्ज हुए.

ये आंकड़े खरीफ 2026 के दौरान अंतरिक्ष से कृषि पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी एवं मॉडलिंग के लिए अनुसंधान संघ (क्रीम्स) प्रयोगशाला ने उपग्रह रिमोट सेंसिंग के जरिये जुटाए हैं. यह प्रयोगशाला आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के कृषि भौतिकी विभाग के तहत काम करती है.

पराली जलाना सबसे किफायती

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को महज 10 से 25 दिन का समय मिलता है. ऐसे में खेतों को जल्दी साफ करने के लिए पराली जलाना सबसे सस्ता और आसान तरीका माना जाता है.

मल्चिंग या पराली की गांठें बनाने वाली मशीनें उपलब्ध नहीं होने अथवा महंगी होने के कारण भी किसान पराली जलाने का विकल्प चुनते हैं. मशीनों से कटाई के बाद खेतों में काफी मात्रा में भूसा और फसल अवशेष बच जाते हैं, जिन्हें हाथ से हटाना मुश्किल होता है. इसके अलावा गेहूं की बुवाई में देरी होने से अगली फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है.

केंद्र सरकार फसल अवशेष प्रबंधन योजना के जरिये इस समस्या से निपटने का प्रयास कर रही है. इसके तहत व्यक्तिगत किसानों को कृषि मशीनरी खरीदने पर 50 प्रतिशत और सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) तथा उद्यमियों को 80 प्रतिशत वित्तीय सहायता दी जाती है.

सरकार मशीनों पर देती है सब्सिडी

इस योजना के तहत हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, बेलर, मल्चर और स्ट्रॉ चॉपर जैसी मशीनों की खरीद पर सब्सिडी दी जाती है. छोटे किसानों के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर भी स्थापित किए गए हैं, जहां से वे किराये पर मशीनें ले सकते हैं.

योजना के तहत पराली का खेत में ही प्रबंधन करने के साथ-साथ उसके अन्य उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. इसमें पराली की मल्चिंग, उसे मिट्टी में मिलाना, बायोमास पेलेट और ब्रिकेट बनाना तथा ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ उसका इस्तेमाल करना शामिल है.

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) भी उपग्रहों के जरिये पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रख रहा है और कार्रवाई के लिए विशेष दल तैनात कर रहा है. आयोग ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं.

इसके अलावा, पराली की मात्रा कम करने के लिए किसानों को धान के बजाय दूसरी फसलें उगाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है.

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