शिवसेना के उद्धव बाला साहब ठाकरे गुट ने पार्टी से बगावत करने वालों के खिलाफ विधान सभा स्पीकर की कार्यवाही से निराश होकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ता की पैरवी करते हुए कहा कि बाला साहब ठाकरे पार्टी की स्थापना से 2012 में अपनी मृत्यु पर्यंत पार्टी के मुखिया यानी पक्ष प्रमुख रहे. उनके निधन के बाद उनके पुत्र उद्धव ठाकरे ने जिम्मेदारी संभाली. पार्टी संविधान के मुताबिक कई बार अध्यक्ष चुने गए. एकनाथ शिंदे उनके सहायक रहे. पार्टी में भी और जब उद्धव मुख्यमंत्री बने तब भी.
कोर्ट ने 27 फरवरी की घटना बताने को कहा तो सिब्बल ने पूरा घटनाक्रम सुनाया. 1999 तक संविधान में कोई पक्ष प्रमुख नहीं था. उसके बाद ये पद रखा गया. सिब्बल ने 2012 के बाद अब तक हुए विधान सभा चुनाव में पार्टी को मिली सीटों का ब्यौरा दिया.
14 से 19 तक शिवसेना सरकार बनी उसमें एकनाथ मंत्री थे.
सिब्बल ने कहा कि सरकार में रहने के दौरान इन लोगों ने कभी कोई शिकायत नहीं की. सितंबर 2018 में सीएम उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे को विधान सभा के सदन में शिवसेना का ग्रुप नेता बनाया और सुनील प्रभु को चीफ व्हिप नियुक्त किया.
सिब्बल ने कहा कि पार्टी के संविधान के अनुच्छेद 11A के तहत पार्टी और सदन में की गई इन नियुक्तियों के बारे में विधान सभा स्पीकर और निर्वाचन आयोग को विधिवत सूचित भी किया गया था. हमने संविधान के अनुच्छेद का जिक्र भी किया था. लेकिन आयोग 2018 में कहता है कि उनके पास वह संविधान रिकॉर्ड में नहीं है. उद्धव ठाकरे को फिर से निर्विरोध चुना गया. उन्होंने एकनाथ शिंदे को नेता नियुक्त किया. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि हमारी नियुक्ति एक ऐसे संविधान के तहत हुई थी जिसे किसी भी पक्ष ने चुनौती नहीं दी है.
सीजेआई ने क्या सवाल किए?
इसपर CJI सूर्यकांत ने पूछा कि क्या यह अनुच्छेद 11A जनवरी 2013 में चुनाव आयोग को भेजा गया था? क्या आप दस्तावेज पर इस हस्ताक्षर की पुष्टि कर सकते हैं?
सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा थे. उन्हें पक्ष प्रमुख (उद्धव) द्वारा नियुक्त किया गया था. पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदवार तय किए और चुनाव लड़ा. 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें हासिल कीं. इसके साथ ही अन्य चुनाव भी लड़े. ये सभी 2013 और 2018 के संविधान के तहत हुए. चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि संविधान वैध है या नहीं. फिर भी चुनाव आयोग इस मामले में जाकर कहता है कि वे रिकॉर्ड पर नहीं हैं, इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं करेगा.
2019 से 2022 तक मैं मुख्यमंत्री था और वह कैबिनेट मंत्री थे. उन्होंने कभी यह मुद्दा नहीं उठाया कि 2013 या 2018 का संविधान अस्तित्व में नहीं है. ऐसे में चुनाव आयोग यह कैसे कह सकता है कि मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा?
इसपर अदालत ने पूछा कि क्या हटाने का प्रस्ताव सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित था?
सिब्बल बोले, "इसे पक्ष प्रमुख द्वारा मंजूरी दी गई थी. संविधान पीठ पहले ही मान चुकी है कि दस्तावेज वैध हैं. उन्हें पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुना गया था. उपस्थिति पत्रक से स्पष्ट है कि कौन-कौन उपस्थित थे.
CJI सूर्यकांत ने सिब्बल से कहा, "तो आपका मतलब है कि हमें यह तय करना होगा कि पार्टी में क्या-क्या शामिल है और पार्टी किसे माना जाता है? और आपके अनुसार, यह सिर्फ लेजिस्लेटिव पार्टी नहीं है, बल्कि इसमें पार्टी की लीडरशिप, नेशनल एग्जीक्यूटिव, पार्टी के प्राइमरी सदस्य (नेशनल, स्टेट और डिस्ट्रिक्ट लेवल पर) और पार्टी के ऑर्गनाइजेशनल विंग्स में बहुमत शामिल है."
वहीं जस्टिस बागची ने कहा, ECI गलत सवाल पूछ रहा था (कि क्या विधायक दल में बहुमत था). यह सवाल पॉलिटिकल पार्टी से जुड़ा होना चाहिए. संविधान यह तय करेगा कि पार्टी को कैसे परिभाषित किया जाए और बहुमत को कैसे समझा जाए.
सिब्बल ने कहा कि और यहां कहा जा रहा है कि कोई संविधान ही नहीं है. अगर कोई संविधान नहीं है, तो 2013 के चुनाव गलत थे. कोई पार्टी ही नहीं होती.
CJI ने कहा कि क्या ECI की गाइडलाइंस या पार्टी के संविधान में बहुमत का आकलन करने का कोई तय फॉर्मूला है?
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