- SC ने कहा कि सरकारी कर्मचारी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपनी सेवा वाली सरकार के खिलाफ रुख अपनाए
- मद्रास HC ने एक सरकारी अधिकारी पर नियम उल्लंघन के लिए 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था
- अधिकारी ने सरकारी आदेश के अनुसार एक कॉलेज में निर्धारित संख्या से अधिक भर्ती मंजूर करने से इनकार किया था
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उस सरकार के खिलाफ रुख अपनाए, जिसकी वह सर्विस करता है. शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए साफ कर दिया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह उस सरकार के खिलाफ बगावत या रुख अपनाए, जिसकी वह सेवा करता है.
यह पूरा मामला तमिलनाडु के पूर्व कॉलेज शिक्षा निदेशक सी. पूर्ण चंद्रन से जुड़ा है, जिन पर हाई कोर्ट ने नियमों के पालन को लेकर 25 लाख रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना ठोक दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इस जुर्माने को पूरी तरह से रद्द किया, बल्कि तमिलनाडु सरकार के उस ढुलमुल रवैए पर भी सख्त नाराजगी जताई जो संकट के समय अपने ही ईमानदार अधिकारी के पीछे खड़ी होने के बजाय अदालत में मूकदर्शक बनी रही.
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि नौकरशाही सरकारी नियमों से बंधी होती है और इस तरह के बेतुके जुर्मानों का सीधा बोझ देश के मासूम टैक्सपेयर्स की जेब पर पड़ता है.
क्या है पूरा विवाद?
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब अपीलकर्ता ने एक निजी महिला कॉलेज में 11 ग्रुप-डी पदों से ज्यादा भर्ती को मंजूरी देने से इनकार किया. यह इनकार 24 अक्टूबर 2013 के सरकारी आदेश संख्या 219 पर आधारित था, जिसमें भर्ती पर पाबंदियां लगाई गईं. हाईकोर्ट ने कुछ कर्मचारियों को वेतन देने में देरी के लिए अधिकारियों को दोषी ठहराया और अपीलकर्ता को इसके लिए निजी तौर पर जिम्मेदार माना था.
हाईकोर्ट द्वारा अधिकारी पर लगाए गए जुर्माने को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि एक सरकारी कर्मचारी मौजूदा सरकारी नीति के अनुसार काम करने के लिए बाध्य होता है और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह खुद सरकार के खिलाफ कोई रुख अपनाए. कोर्ट ने कहा, "हमें यह कहना पड़ रहा है कि हाईकोर्ट को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि किसी सरकारी कर्मचारी को सरकार के खिलाफ कोई रुख अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता."
बेंच ने कहा कि अधिकारी ने उस समय लागू सरकारी आदेश के अनुसार ही काम किया और उसने मंजूरी सिर्फ इसलिए नहीं दी थी क्योंकि उस समय 11 पदों से ज्यादा भर्ती की अनुमति नहीं थी. राज्य सरकार ने बाद में जो मंजूरी दी, वह तब दी गई जब हाई कोर्ट ने संबंधित सरकारी आदेश रद्द किया.
'राज्य सरकार क्यों रही चुप?'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसलिए हमारी राय में अपीलकर्ता पर कोई भी प्रतिकूल जवाबदेही नहीं थोपी जा सकती और 25 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाना तो बिल्कुल भी सही नहीं है. इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि जब हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता पर जुर्माना लगाया, तब राज्य सरकार चुप क्यों रही. जबकि अपीलकर्ता ने राज्य सरकार के आदेश को लागू करने के लिए ही काम किया.
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