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क्‍या है 'रोमियो-जूलियट' कानून, नाबालिगों के प्यार का मामला आया तो सुप्रीम कोर्ट ने किया जिक्र

पॉक्सो में रोमियो जूलियट क्लॉज एक प्रावधान है, जिसका उद्देश्य उम्र में करीब-करीब किशोरों के बीच सहमति से चलने वाले यौन संबंधों की रक्षा करना है. उदाहरण के लिए, अगर एक 17 साल की लड़की और एक 18 साल लड़का सहमति से संबंध में हैं, तो अदालतें अधिक उदार दृष्टिकोण अपनाती हैं.

क्‍या है 'रोमियो-जूलियट' कानून, नाबालिगों के प्यार का मामला आया तो सुप्रीम कोर्ट ने किया जिक्र
किशोरों के सच्चे रिश्तों को बचाने के लिए पॉक्सो में ‘रोमियो-जूलियट’(AI इमेज)
  • सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्‍सो अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिए रोमियो-जूलियट धारा जोड़ने का निर्देश दिया है
  • अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया जिसमें नाबालिग से जुड़े मामले में आरोपी को जमानत दी गई थी
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की मेडिकल उम्र निर्धारण जमानत के चरण में अनिवार्य नहीं किया जा सकता है
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नई दिल्‍ली:

बच्‍चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया पॉक्‍सो कानून (POCSO) कई बार उनके खिलाफ ही इस्‍तेमाल किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्‍सो एक्‍ट के गलत इस्‍तेमाल को रोकने के लिए गंभीरता से कदम उठाने के निर्देश दिये हैं. साथ ही इसमें 'रोमियो-जूलियट' धारा जोड़ने का भी निर्देश दिया है, ताकि नाबालिगों को प्‍यार करने पर कठघरे में न खड़ा किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश उत्‍तर प्रदेश से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया. इस मामले में हाई कोर्ट द्वारा नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के आरोपी को जमानत दे दी गई थी.

ताकि रोमियो-जूलियट को मिले छूट

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम का दुरुपयोग कई बार होते देखा गया है. पॉक्‍सो एक्‍ट के दुरुपयोग को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस खतरे को रोकने के लिए 'रोमियो-जूलियट' धारा शामिल करने का निर्देश दिया, ताकि 'वास्तविक किशोर संबंधों' को इसके कठोर प्रावधानों से छूट दी जा सके. शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह भी कहा कि हाई कोर्ट पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों में जमानत के प्रोसेस में पीड़ितों की अनिवार्य मेडिकल उम्र निर्धारण का आदेश नहीं दे सकते.

क्‍या है POCSO का रोमियो जूलियट क्लॉज

पॉक्सो एक्‍ट में रोमियो जूलियट क्लॉज एक प्रावधान है, जिसका उद्देश्य उम्र में करीब-करीब किशोरों के बीच सहमति से चलने वाले यौन संबंधों की रक्षा करना है. यह पॉक्सो अधिनियम में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन कुछ अदालतों ने ऐसे मामलों में विवेक का उपयोग किया है. सरल शब्दों में, इसका मतलब है कि अगर दो किशोर सहमति से संबंध में हैं और उम्र में करीब हैं, तो अदालतें मामले का फैसला करते समय इस पर विचार कर सकती हैं. उदाहरण के लिए, अगर एक 17 साल की लड़की और एक 18 साल लड़का सहमति से संबंध में हैं, तो अदालतें अधिक उदार दृष्टिकोण अपनाती हैं. लेकिन अगर उम्र में बड़ा अंतर है या जबरदस्ती शामिल है, तो कानून अपना काम करेगा.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा, 'चूंकि इन कानूनों के दुरुपयोग का बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है, इसलिए इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए. आज के बच्चों और कल के नेताओं की रक्षा करने के उद्देश्य से न्याय की सबसे गंभीर अभिव्यक्ति करार दिया.' इस संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने माना कि जमानत के चरण में पीड़ितों की मेडिकल ऐज निर्धारण के संबंध में उच्च न्यायालय का निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 (जमानत प्रदान करना) के तहत अधिकार क्षेत्र से बाहर था.

क्‍या है पूरा मामला?
 

यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी गई थी. जमानत देते समय, हाई कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए, जिनमें यह भी शामिल था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रत्येक मामले में, पुलिस को शुरुआत में ही चिकित्सा आयु-निर्धारण परीक्षण करना होगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या कहा

हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने वाले आदेश के हिस्से को ‘अपरिवर्तित' रखा. न्यायमूर्ति करोल द्वारा लिखित फैसले में यह सवाल सामने आया कि क्या हाई कोर्ट, जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय, पॉक्सो अधिनियम से जुड़े सभी मामलों में आयु-निर्धारण परीक्षण आयोजित करने को अनिवार्य करने का निर्देश जारी कर सकता है. फैसले में कहा गया, 'इसमें कोई शक नहीं कि उच्च न्यायालय एक संवैधानिक न्यायालय है. हालांकि, इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि वैधानिक शक्ति के प्रयोग में हुई थी, न कि संविधान के तहत....'

एक प्रहरी के रूप में कार्य करें...

निर्णयों का हवाला देते हुए, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण मुकदमे का विषय है, न कि जमानत के चरण में. अदालत ने कहा, 'यदि आयु पर संदेह हो, तो जमानत न्यायालय आयु सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच कर सकता है, लेकिन वह उन दस्तावेजों के सही या गलत होने के प्रश्न में हस्तक्षेप नहीं करेगा.' पीठ ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वह आवश्यक कार्रवाई के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के साथ फैसले की प्रति साझा करें, साथ ही निचली अदालतों को भी जानकारी दें.
इसने वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी पर भी जोर दिया और कहा कि वे तुच्छ या प्रतिशोधात्मक मुकदमों के खिलाफ एक प्रहरी के रूप में कार्य करें, अन्यथा अनियंत्रित दुरुपयोग न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर करेगा.

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