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2 करोड़ रुपये के ‘डिजिटल अरेस्ट’ केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त, आरोपी को जमानत से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक 84 वर्षीय दंपती से ₹2 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी से जुड़े ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ऐसे अपराधों को गंभीर, संगठित और बुजुर्गों को निशाना बनाने वाला बताया है.

2 करोड़ रुपये के ‘डिजिटल अरेस्ट’ केस में सुप्रीम कोर्ट सख्त, आरोपी को जमानत से इनकार
हाईकोर्ट भी पहले कर चुका है जमानत याचिका खारिज
  • सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के दंपती से ₹2 करोड़ से अधिक की ठगी मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार किया है
  • अदालत ने साइबर ठगी को गंभीर और संगठित अपराध माना, जो विशेष रूप से बुजुर्गों को निशाना बनाता है
  • आरोपी ने गुजरात में हुई इसी तरह की ठगी के मामले को अपनी जमानत याचिका में छिपाने का आरोप लगा है
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साइबर ठगी के बढ़ते मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक 84 वर्षीय दंपती से ₹2 करोड़ से अधिक की ठगी से जुड़े तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने इस तरह के अपराधों को गंभीर और संगठित प्रकृति का बताते हुए कहा कि ये खास तौर पर बुजुर्ग नागरिकों को निशाना बनाते हैं. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने राज्य सरकार के कड़े विरोध के बाद आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने माना कि इस तरह के साइबर अपराधों की प्रकृति बेहद गंभीर है और इनके सामाजिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

गुजरात के मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने अदालत को बताया कि आरोपी ने अपनी जमानत याचिका में गुजरात में इसी तरह के एक अन्य धोखाधड़ी मामले में अपनी संलिप्तता को छिपाया गया है. उन्होंने बताया कि गुजरात में 70 वर्षीय दंपती से भी इसी तरह ठगी की गई थी. इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उस मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और आरोपी को गुजरात से ही दबोचा गया था, जो इस तरह के साइबर फ्रॉड में उसकी लगातार संलिप्तता के पैटर्न को दर्शाता है. सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय ने भी राज्य सरकार के रुख का समर्थन किया.

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हाईकोर्ट भी पहले कर चुका है जमानत याचिका खारिज

आपको बता दें कि इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने भी आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता, मनी ट्रेल और जारी जांच को ध्यान में रखते हुए जमानत से इनकार कर दिया था. हाईकोर्ट ने बढ़ते साइबर अपराधों, खासतौर पर डिजिटल अरेस्ट स्कैम को संगठित और सिस्टेमेटिक खतरा बताया था और सार्वजनिक हित में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे.

हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश

  • राज्य में साइबर पुलिसिंग ढांचे को मजबूत करना
  • तकनीकी रूप से सक्षम विशेष साइबर यूनिट्स की स्थापना
  • इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर और बैंकों के साथ बेहतर समन्वय
  • संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की रियल‑टाइम निगरानी
  • म्यूल अकाउंट, फंड लेयरिंग और क्रिप्टो चैनलों के दुरुपयोग पर अंकुश
  • साइबर शिकायतों के लिए FIR दर्ज करने और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना


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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नहीं दी चुनौती

महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए इन सार्वजनिक हित निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी. इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार साइबर अपराधों से निपटने के लिए प्रणालीगत सुधारों की आवश्यकता से सहमत है. सुप्रीम कोर्ट खुद भी अलग कार्यवाही में “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जता चुका है और देशभर में ऐसे अपराधों से निपटने के लिए सख्त और एकरूप व्यवस्था पर विचार कर रहा है.
 

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