गाजियाबाद में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या की घटना बेहद चौंकाने वाली और दुखद है. यह घटना एक कड़वी सच्चाई को सामने लाती है कि भारत में युवाओं में आत्महत्या की दर दुनिया में सबसे अधिक में से एक है. यह वैश्विक औसत से करीब दोगुनी है. भारतीय लड़कियों में तो यह करीब छह गुना तक पहुंच जाती है.
12, 14 और 16 साल की इन तीनों बहनों ने बुधवार तड़के गाजियाबाद में अपने अपार्टमेंट की नौवीं मंजिल से छलांग लगा दी थी. उनके माता-पिता को एक डायरी में लिखा आठ पन्नों का नोट मिला. इसमें लड़कियों ने कोरियाई संस्कृति के प्रति अपने गहरे लगाव का जिक्र किया था. इन किशोरियों ने अपने माता-पिता पर यह आरोप लगाया था कि वे उनसे उनकी 'भावनात्मक शरण'छीनने की कोशिश कर रहे थे.
आत्महत्या के कितने कारण
आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास के पीछे कोई एक कारण नहीं होता है.यह कई महीनों या कई सालों तक चले भावनात्मक तनाव और मानसिक पीड़ा का नतीजा होता है. इसके आम कारणों में पढ़ाई का दबाव, परीक्षा में असफलता, घर का तनावपूर्ण माहौल, दोस्तों से रिश्तों में समस्या, प्रेम संबंधों का टूटना, गरीबी और आर्थिक नुकसान, यौन शोषण, नशे की लत और दूसरों की नकल (सोशल कंटेजन) शामिल हैं.
एक सफल आत्महत्या के पीछे कम से कम 15 ऐसे युवा होते हैं, जो आत्महत्या की कोशिश करते हैं. यह संख्या इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाने के लिए काफी है.

सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और दूसरों की नकल पहले से मानसिक रूप से परेशान युवाओं के लिए बड़ा ट्रिगर बन सकते हैं. ये चीजें जोखिम भरे व्यवहार और अचानक फैसलों को बढ़ावा देती हैं, जिससे वे कोई खतरनाक कदम उठा सकते हैं. यह समझना बेहद जरूरी है कि खुद को नुकसान पहुंचाने और आत्महत्या की प्रवृत्ति किन कारणों से पैदा होती है, ताकि समय रहते इसे रोका जा सके.इसके साथ ही, मानसिक परेशानी के शुरुआती संकेतों को पहचानना भी जरूरी है, जैसे आत्महत्या के विचार या खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति.
निजी जीवन की परेशानियां और आत्महत्या
अक्सर आत्महत्या के प्रयास को ध्यान खींचने की कोशिश कहकर खारिज कर दिया जाता है और किशोर या युवाओं को स्वार्थी बता दिया जाता है. यह रवैया उसे और ज्यादा अकेलेपन और निराशा की ओर धकेल देता है.यहां यह समझना जरूरी है कि हर अगला प्रयास पहले से ज्यादा गंभीर और जानलेवा हो सकता है. सिर्फ सोशल मीडिया या इंटरनेट कंटेंट को दोष देना इस जटिल समस्या को समझने में मदद नहीं करता. गाजियाबाद की इस घटना में भी देखा जा सकता है कि लड़कियां कोरियाई ड्रामा और के-पॉप की ओर इसलिए आकर्षित हुईं क्योंकि उनके जीवन में कई परेशानियां थीं- जैसे परिवार का असामान्य माहौल, सख्त परवरिश, पढ़ाई में दिक्कतें, स्कूल न जाना, सामाजिक अलगाव और गहरा अकेलापन. उन्हें असली दुनिया में सहारा नहीं मिला, इसलिए उन्होंने वर्चुअल दुनिया में भावनात्मक लगाव ढूंढा.
केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का एक छोटा हिस्सा ही हल होगा. युवाओं को ऐसे विकल्प भी चाहिए, जहां वे अपनी भावनात्मक और सामाजिक जरूरतें पूरी कर सकें, असली दुनिया में सार्थक रिश्ते बना सकें और अपने सपनों को पूरा करने का उद्देश्य पा सकें. उन्हें एक ऐसे सुरक्षित माहौल की जरूरत है, जहां वे बिना डर, जज किए जाने के डर या पनिशमेंट के अपनी बात कह सकें.
माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी क्या है
माता-पिता, शिक्षक और अन्य जिम्मेदार वयस्कों को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए. उनकी दुनिया को समझने की कोशिश करनी चाहिए. उन्हें संवेदनशीलता के साथ सुनना सीखना होगा, बिना तुरंत निष्कर्ष निकालने या जज करने के.
यह एक राष्ट्रीय संकट है, जिसकी जिम्मेदारी हम सभी को मिलकर लेनी होगी. सरकार और उसकी नीतियां, माता-पिता, स्कूल और शिक्षण संस्थान, कानून व्यवस्था और पुलिस- सभी को एक साथ मिलकर बच्चों और युवाओं के भावनात्मक कल्याण और सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करना होगा,जिससे एक पूरी पीढ़ी के सपने सुरक्षित रह सकें.
(डॉक्टर अमित सेन बच्चों और किशोरों के मामलों के मनोचिकित्सक हैं. वे चिल्ड्रन फर्स्ट नाम की संस्था के सह-संस्थापक और निदेशक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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