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फाइटर जेट, युद्ध पोतों से भी पहले DRDO के इन धातुओं ने लिखी ऑपरेशन सिंदूर की जीत

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध मैदान में भारत ने कई हथियार उतारे मगर असली जीत उन धातुओं की हुई जिनसे इन्हें बनाया गया. पर यह आसान नहीं था. फिर कैसे संभव हुआ ये कायाकल्प? पढ़ें पूरी कहानी.

फाइटर जेट, युद्ध पोतों से भी पहले DRDO के इन धातुओं ने लिखी ऑपरेशन सिंदूर की जीत
  • ऑपरेशन सिंदूर की सफलता केवल हथियार से नहीं मिली. DRDO की मटीरियल टेक्नोलॉजी- स्टील, टाइटेनियम और एलॉय थे मारक.
  • गहन रिसर्च के बाद बने INS विक्रांत के स्टील, तेजस के टाइटेनियम पार्ट्स और मिसाइलों के रेडोम ने दिलाई कामयाबी.
  • जेट इंजन के सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और एडवांस्ड आर्मर जैसी तकनीकें भारत के आत्मनिर्भरता की गवाही दे रही हैं.
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आज युद्ध बंदूकों, आसमान चीरते फाइटर जेट, दुश्मनों के छक्के छुड़ाते टैंक, समुद्र के सैलाब पर हिमालय की तरह रक्षा करते युद्ध पोतों, दुश्मन के खेमे में तबाही मचाती मिसाइलों और टेक्नोलॉजी के नए हथियार ड्रोन के बूते लड़ी जाती हैं, पर किसी भी जंग की असली नींव ये हथियार नहीं बल्कि वो धातुएं होती हैं जो आग, दबाव, कंपन और झटकों को झेलकर भी भरोसेमंद बनी रहती हैं. ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के पीछे यही अदृश्य ताकत खड़ी थी. डीआरडीओ की मटीरियल साइंस प्रयोगशालाओं में दशकों से तैयार किए गए स्टील, टाइटेनियम और सुपर-एलॉय आज भारत की सैन्य शक्ति का मजबूत आधार बन चुके हैं.

हैदराबाद में डिफेंस मेटालर्जिकल रिसर्च लेबोरेटरी (Defence Metallurgical Research Laboratory) यानी डीएमआरएल, डीआरडीओ की वो फ्रंटलाइन लैब है जहां भारत की लगभग हर बड़ी सैन्य प्रणाली के मटीरियल का डीएनए तैयार होता है. NDTV से बातचीत में डीएमआरएल के निदेशक और मटीरियल साइंटिस्ट डॉ. आर बालमुरलीकृष्णन कहते हैं कि इस दुनिया की हर चीज मटीरियल से बनी है. लेकिन रक्षा क्षेत्र में मटीरियल का मतलब सिर्फ मजबूती नहीं, बल्कि सटीक व्यवहार, बहुत अधिक तापमान में भी मजबूती से टिके रहना और सालों तक बिना फेल हुए काम करते रहना है. यही कारण है कि किसी भी हथियार को डिजाइन करने से पहले यह तय किया जाता है कि वह किस धातु से बनेगा और इसमें सालों नहीं बल्कि दशकों का समय में लग सकता है.

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आईएनएस विक्रांत के बनने की कहानी

वो बताते हैं कि इसका सबसे लाजवाब उदाहरण भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत है. इसमें जो स्टील लगाया गया है वो रातों रात नहीं बना. करीब 25 साल पहले डीएमआरएल को एक ऐसे स्टील को तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई जो एक साथ बेहद मजबूत भी हो और बेहद ठंडे तापमान पर भी झटकों को सह सके.

डॉ. बालमुरलीकृष्णन बताते हैं, "ताकत हासिल करना मुश्किल नहीं है पर कम तापमान पर इम्पैक्ट के लिए टफनेस हासिल करना सबसे कठिन चुनौती थी. दुनिया में मौजूदा नेवल स्टील की क्वालिटी की जानकारी तो थी पर उसकी प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी बहुत कम देशों के पास थी. भारत को यह तकनीक खुद विकसित करनी पड़ी."

वे कहते हैं, "इसके लिए चुनौती केवल वैज्ञानिक स्तर पर नहीं थी बल्कि औद्योगिक स्तर पर भी थी. तब भारत के स्टील प्लांट्स के पास पश्चिमी देशों के मुकाबले वैसी हाई एंड सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. इसलिए डीएमआरएल ने ऐसा समाधान तैयार किया जो भारतीय उद्योग की क्षमता के भीतर रहकर भी वैश्विक स्तर की परफॉर्मेंस दे सके. इसका नतीजा ऐतिहासिक रहा."

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डॉ. बालमुरलीकृष्णन- मटीरियल वैज्ञानिक और निदेशक, डीएमआरएल

डॉ. बालमुरलीकृष्णन- मटीरियल वैज्ञानिक और निदेशक, डीएमआरएल
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आईएनएस विक्रांत में 20,000 टन से ज्यादा विशेष स्टील इस्तेमाल हुआ, जबकि अकेले फ्लाइट डेक में करीब 1,500 टन हाई-ग्रेड स्टील लगा. ये सभी एक जैसे नहीं थे. पूरे ढांचे के लिए अलग ग्रेड तो फ्लाइट ऑपरेशंस के लिए एक अलग ग्रेड के स्टील का इस्तेमाल किया गया है. फ्लाइट डेक स्टील को बेहद कड़े मानकों पर खरा उतरना था ताकि फाइटर जेट की लैंडिंग और टेकऑफ बेहद सुरक्षित हो. सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों की इंडस्ट्री ने मिलकर एक के बाद एक कई तकनीकी बाधाएं तोड़ीं. डीएमआरएल के वैज्ञानिकों को असली तसल्ली तब मिली जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विक्रांत तैनात हुआ. 

डॉ. बालमुरलीकृष्णन के शब्दों में, "उसका मेटल साबित हुआ. पूरा कैरियर बैटल ग्रुप, जो इसी तरह के स्टील से बना था, दुनिया के सामने खड़ा था. प्रयोगशालाओं में दशकों तक काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए यह एक बेहद अहम जीत थी."

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तेजस में टाइटेनियम और निकेल की मजबूती

समुद्र में जहां भारी और मजबूत स्टील चाहिए, वहीं आसमान में हल्के लेकिन मजबूत मटीरियल की जरूरत होती है. भारत का स्वदेशी फाइटर जेट तेजस इसका उदाहरण है. इसके ढांचे में भले ही कंपोजिट्स (यानी दो या दो से अधिक पदार्थों) का बड़ा रोल हो, लेकिन कई अहम हिस्सों में उन्नत टाइटेनियम और निकेल एलॉय का इस्तेमाल हुआ है. डॉ. बालमुरलीकृष्णन ने टाइटेनियम स्पॉन्ज का एक नमूना दिखाते हुए बताया कि यही कच्चा माल आगे चलकर फाइटर जेट, सैटेलाइट और रॉकेट्स का आधार बनते हैं.

टाइटेनियम एलॉय की सबसे बड़ी खूबी है उसका स्ट्रेंथ टू वेट रेशियो. यानी कम वजन कम होने के बावजूद उसका बहुत ताकतवर होना. लेकिन एयरोस्पेस ग्रेड टाइटेनियम स्पॉन्ज बनाना अपने आप में रणनीतिक तकनीक है. डीएमआरएल ने दशकों की मेहनत से यह क्षमता देश में विकसित की, जिससे भारत दुनिया का ऐसा केवल 7वां देश बन गया जिसने यह तकनीक हासिल की. इसके बाद इस तकनीक को इंडस्ट्री को ट्रांसफर किया गया ताकि बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सके.

स्पॉन्ज से धातु ईंट, धातु ईंटों से पुर्जे के किसी अंग को बनाने तक का सफर बेहद जटिल होता है. टाइटेनियम को अन्य तत्वों के साथ मिलाकर टाइटैनियम के एडवांस्ड एलॉय  (Ti-6Al-4V) बनाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर में होता है. पहले जो हिस्से स्टील से बनते थे, उन्हें अब टाइटेनियम से बदला जा रहा है, जिससे एयरक्राफ्ट के वजन में 40 से 45 फीसद  तक की कमी आ रही है. एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी पहले ही ऐसे कई कंपोनेंट चिन्हित कर चुकी है, जो हल्के लड़ाकू विमानों- एमके 2 और भविष्य के एडवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट में इस्तेमाल होंगे.

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जेट इंजन के लिए क्या जरूरी?

स्टील ताकत है और टाइटेनियम हल्कापन लेकिन जेट इंजन की असली परीक्षा अधिक से अधिक गर्मी में इसका सफलतापूर्वक काम करना है. जेट इंजन के हॉट एंड कंपोनेंट्स ऐसी परिस्थितियों में काम करते हैं जहां तापमान धातु के पिघलने के बिंदु से भी ऊपर होता है. तो ऐसे उच्च तापमान में इनका सफलतापूर्वक काम करना संभव होता है निकेल बेस्ड सुपर-एलॉय, एडवांस्ड कोटिंग्स और अंदरूनी कूलिंग चैनल्स की वजह से. 
डॉ. बालमुरलीकृष्णन बताते हैं कि इन हिस्सों का निर्माण इन्वेस्टमेंट कास्टिंग यानी लॉस्ट वैक्स तकनीक से होता है. यह धातुओं को ढालने की एक प्राचीन पद्धति है. भले ही नाम पुराना हो पर आज की टर्बाइन ब्लेड्स, माइक्रॉन स्तर की टॉलरेंस और बेहद पतले इंटरनल चैनल्स के साथ ज्योमेट्री के लिहाज से बेहद जटिल होती हैं. 

इसमें सबसे अहम है सिंगल क्रिस्टल ब्लेड. सामान्य धातुओं में ग्रेन बॉउंड्री कमजोर होती हैं लेकिन सिंगल क्रिस्टल टेक्नोलॉजी में इसे खत्म कर दिया जाता है, जिससे हाई टेम्परेचर पर क्रिप रेजिस्टेंस और लाइफ कई गुना बढ़ जाती है. यही वजह है कि यह तकनीक दुनिया की सबसे ज्यादा सुरक्षित रक्षा तकनीकों में गिनी जाती है. डॉ. बालमुरलीकृष्णन कहते हैं, "सिद्धांत सब जानते हैं, लेकिन इसे इंजीनियरिंग में बदलना ही असली रहस्य है. यही कारण है कि GE-414 (अमेरिकी आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन) जेट इंजन जैसे जॉइंट प्रोजेक्ट्स में भी सिंगल क्रिस्टल मैन्युफैक्चरिंग का पूरा नॉलेज ट्रांसफर नहीं किया गया है.

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जबरदस्त टेक्नोलॉजी

हवा और समुद्र के अलावा जमीन पर भी डीएमआरएल की सामग्री सुरक्षा कवच बनकर खड़ी है. 1970 के दशक के अंत से लैब आर्मर डेवलपमेंट में लगी हुई है. शुरुआती दौर में मोटी स्टील प्लेट्स से मोनोलिथिक आर्मर बनाए गए. लेकिन जैसे-जैसे खतरे बदले, वैसे-वैसे आर्मर भी बदला. अब कॉम्पोजिट आर्मर सिस्टम विकसित किए गए हैं, जिनमें धातु, सिरेमिक और पॉलिमर की कई परतें मिलकर हल्के वजन में ज्यादा सुरक्षा देती हैं.
युद्ध टैंक अर्जुन पर इस्तेमाल होने वाला कंचन आर्मर इसी विकास यात्रा का नतीजा है. इसके अलावा पहिए वाले बख्तरबंद वाहनों के लिए हल्के ऐड-ऑन आर्मर भी विकसित किए गए हैं. ये सिर्फ डिजाइन फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि फायरिंग रेंज में गोलियों और प्रोजेक्टाइल्स के सामने परखे गए हैं, और यही वजह है कि ये सैनिकों की जान बचाने में सक्षम साबित हुए हैं.

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मिसाइल के नोज पर लगे रेडोम में आत्मनिर्भरता

मिसाइल टेक्नोलॉजी में भी मटीरियल निर्णायक भूमिका निभाता है. मिसाइल की नोज पर एंटेना, रडार और अन्य संचार प्रणालियों की सुरक्षा के लिए लगाया गया रेडोम ऐसा होना चाहिए जो तेज एयरोडायनामिक हीटिंग झेल सके, लेकिन साथ ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स के लिए पारदर्शी भी रहे ताकि गाइडेंस सिस्टम सही काम करे. डीएमआरएल ने सिलिका पर आधारित सिरेमिक रेडोम विकसित किए हैं, जो पहले ही डीआरडीओ के अस्त्र जैसी मिसाइलों में इस्तेमाल हो चुके हैं. यहां चुनौती सिर्फ मजबूती नहीं, बल्कि यांत्रिक स्थिरता और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पारदर्शिता के बीच बेहद सटीक संतुलन बनाना है.

डॉ. बालमुरलीकृष्णन की बातों से एक बात साफ है. मटीरियल हर जगह हैं और ये सबसे कठिन तकनीकों में से एक हैं. हम एक मटीरियल वर्ल्ड में रहते हैं, और जब भी कहीं एडवांस्ड मटीरियल की जरूरत होती है, तो डीएमआरएल भी कहीं न कहीं मौजूद होता है.

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की स्वदेशी सैन्य क्षमता को दुनिया के सामने साबित किया. मिसाइलें लक्ष्य पर सटीक बैठीं. युद्धपोतों ने समुद्र में ताकत दिखाई. फाइटर जेट्स ने आसमान में दबदबा बनाया. लेकिन इस सफलता के पीछे एक अदृश्य कहानी है. ये कहानी है, दशकों तक परखे गए एलॉय की, माइक्रॉन स्तर तक की सूक्ष्मता के साथ ढाले गए धातुओं की कहानी और ऐसी मटीरियल टेक्नोलॉजी की कहानी जिन्हें हथियारों जितना ही गोपनीय और स्ट्रैटेजिक माना जाता है. कुल मिलाकर डीआरडीओ की डीएमआरएल में जीत युद्ध के शुरू होने से बहुत पहले ही गढ़ ली जाती है. जहां भट्टियों, लैब्स, रोलिंग मिल्स में भारत अपनी ताकत को सही मायने में स्टील में ढालता है.

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