- सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट आज PIL पर सुनवाई करेगा.
- याचिका में दावा है कि उनका वजन करीब 9 किलो घट चुका है और तत्काल चिकित्सकीय मदद की जरूरत है.
- मामला जीवन के अधिकार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और राज्य की जिम्मेदारी जैसे संवैधानिक सवालों से जुड़ा है.
जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारों पर मुखर आवाज रहे सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट आज जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा. इस याचिका में बताया गया है कि उनका वजन करीब 9 किलो घट चुका है और स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है. कोर्ट से सरकार को चिकित्सकीय मदद देने, बातचीत शुरू कराने और जरूरत पड़ने पर जीवन बचाने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया है.
दावा किया जा रहा है कि उनकी सेहत तेजी से बिगड़ रही है और उनका वजन करीब 9 किलो कम हो चुका है. इसी बीच दिल्ली हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर आज सुनवाई होनी है. याचिकाकर्ता राकेश कुमार सैनी ने कहा कि स्थिति दुखद और बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है,
सोनम वांगचुक की सेहत पर जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, अनशन शुरू करने के बाद से 59 साल के सोनम वांगचुक का वजन 8.9 किलोग्राम कम हो गया है. वहीं ताजा हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, सोनम वांगचुक का वजन घटकर 57.15 किलोग्राम हो गया है, जो एक दिन पहले दर्ज किए गए 57.55 किलोग्राम से 400 ग्राम कम है."
वहीं उनका ब्लड शुगर लेवल 80 mg/dL है, शरीर में पानी की मात्रा ठीक है, वे मानसिक रूप से सतर्क हैं और उनका ब्लड प्रेशर 105/76 mmHg है."
क्या सरकार किसी अनशनकारी को जबरन इलाज दे सकती है? क्या अदालत हस्तक्षेप कर सकती है? और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार कहां तक जाता है?
पूरा मामला समझिए क्या है?
सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं. उन्होंने नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए अनशन शुरू किया.
जनहित याचिका में कहा गया है कि लगातार उपवास के कारण उनकी हालत बिगड़ रही है और सरकार को तुरंत चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए.
हाई कोर्ट में क्या मांग की गई है?
PIL दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता ने अदालत से मुख्य रूप से ये मांगें हैं कि सरकार फौरन वांगचुक से बातचीत करे उन्हें चिकित्सकीय सहायता देने के निर्देश दिए गए हैं. साथ ही यह भी कहा गया है जरूरत पड़ने पर जीवन बचाने के लिए मेडिकल हस्तक्षेप किया जाए. अदालत यह सुनिश्चित करे कि भूख हड़ताल करते शख्स की मौत न हो, सरकार हर हाल में यह सुनिश्चित करे.
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि सरकार पूरी तरह निष्क्रिय रहती है और किसी नागरिक की भूख से मौत हो जाती है, तो यह बेहद गंभीर संवैधानिक और मानवीय प्रश्न होगा.
पिछली सुनवाई में क्या हुआ?
दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को मामले की सुनवाई गुरुवार तक टाल दी क्योंकि बार एसोसिएशन की हड़ताल के चलते सरकारी पक्ष की ओर से कोई वकील उपस्थित नहीं था.
हालांकि, अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे तत्काल सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तथा दिल्ली सरकार के वकील को आदेश की प्रति भेजने को कहा.
क्या अदालत जबरन खाना खिलाने का आदेश दे सकती है?
अदालतें पहले भी कह चुकी हैं कि जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) सर्वोपरि है. दूसरी ओर, व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और अपने फैसले लेने का अधिकार भी संविधान से जुड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में यह माना है कि चिकित्सा उपचार के लिए व्यक्ति की सहमति महत्वपूर्ण है. हालांकि, यदि किसी व्यक्ति का जीवन तत्काल खतरे में हो और वह निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो परिस्थितियों के आधार पर राज्य हस्तक्षेप कर सकता है.
यानी इस मामले में अदालत को दो संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होगा.
भूख हड़ताल के दौरान शरीर पर क्या असर पड़ता है?
मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक लंबे समय तक केवल पानी या सीमित तरल पदार्थ लेने से शरीर पहले ग्लाइकोजन, फिर वसा और अंत में मांसपेशियों को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने लगता है.
कहने का मतलब ये कि, लगातार उपवास करने से वजन में तेजी से गिरावट आता है. ब्लड प्रेशर कम होता है. इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है. दिल की धड़कन प्रभावित हो सकती है. किडनी और अन्य अंगों पर दबाव बढ़ सकता है. लंबे समय तक ऐसी ही स्थिति बनी रहने पर जान का खतरा भी हो सकता है. इसी वजह से लंबे अनशन पर बैठे लोगों की नियमित मेडिकल मॉनिटरिंग की जाती है.
क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है?
हां. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है.
लेकिन ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं. सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य वैधानिक कारणों से सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है.
आज की सुनवाई में किन बातों पर नजर रहेगी?
क्या हाई कोर्ट सरकार से तुरंत मेडिकल रिपोर्ट मांगेगा? क्या अदालत सरकार को वांगचुक से बातचीत का निर्देश देगी? क्या कोर्ट जबरन इलाज या फोर्स-फीडिंग पर कोई टिप्पणी करेगा? और क्या स्वास्थ्य की निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाने का निर्देश दिया जाएगा?
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