महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने जिस तरह शिवसेना के भीतर बगावत कर सत्ता का समीकरण बदल दिया था, वैसा ही ‘शिंदे मॉडल' अब पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिल रहा है. तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने 59 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए खुद को नेता विपक्ष के तौर पर स्थापित कर दिया है. स्पीकर की मंजूरी के साथ यह बगावत अब सीधे ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ खुली चुनौती बन चुकी है.
विधानसभा में शक्ति प्रदर्शन, LoP का कमरा मिला
बुधवार को बंगाल विधानसभा में बड़ा सियासी ड्रामा देखने को मिला, जब ऋतब्रत बंदोपाध्याय अपने समर्थक विधायकों के साथ पहुंचे और नेता विपक्ष का दावा पेश कर दिया. विधानसभा अध्यक्ष ने उनके दावे को स्वीकार करते हुए उन्हें Leader of Opposition (LoP) के रूप में मंजूरी दी और विपक्ष के कक्ष की चाबी भी सौंप दी. ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने कहा कि उनके साथ 58 विधायक हैं, जबकि दो और विधायक शहर से बाहर हैं और समर्थन में हैं. उनका दावा है कि यह विधानसभा में असली विपक्षी खेमे का प्रतिनिधित्व करता है.
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‘ममता ही रहें सलाहकार'
दिलचस्प बात यह है कि बगावत के बीच ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने ममता बनर्जी को निशाने पर लेने के साथ ही एक नरम राजनीतिक संदेश भी दिया. उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि ममता बनर्जी इस नए विपक्षी मोर्चे की मुख्य सलाहकार बनी रहें. हालांकि, साथ ही उन्होंने पार्टी की मौजूदा हालत के लिए अभिषेक बनर्जी पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अगर सफलता का श्रेय लिया जाता है तो असफलता की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए.
‘दो-तिहाई' विधायकों के समर्थन का दावा
ऋतब्रत बंदोपाध्याय का सबसे बड़ा दावा 60 विधायकों का समर्थन है. यदि यह आंकड़ा सही साबित होता है, तो यह TMC के कुल 80 विधायकों का दो-तिहाई से ज्यादा होगा. यही वह अहम संख्या है जो संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) से बचने का रास्ता देती है.
यह ठीक वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र में शिंदे गुट ने शिवसेना से अलग होकर अपनी राजनीतिक वैधता साबित की थी. यही वजह है कि बंगाल की सियासत में ऋतब्रत को अब ‘TMC का शिंदे' कहा जा रहा है.
TMC में कैसे पड़ी फूट
इस बगावत की जड़ें पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष से जुड़ी मानी जा रही हैं. हाल के दिनों में ममता बनर्जी की बैठकों में विधायकों की उपस्थिति लगातार घटती गई. पहले 70 से ज्यादा, फिर 60 के आसपास और आखिर में सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे. इसके अलावा ‘सिग्नेचर स्कैंडल' को लेकर ऋतब्रत बंदोपाध्याय और संदीपन साहा ने खुलकर सवाल उठाए थे, जिसके बाद दोनों को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. इस कार्रवाई को कई लोग असंतोष दबाने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं.
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कौन हैं ऋतब्रत बंदोपाध्याय?
ऋतब्रत बंदोपाध्याय का राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. वे कभी CPI(M) के नेता रहे और 2014 में राज्यसभा सांसद बने. लेकिन 2017 में पार्टी लाइन से हटने और विवादों के चलते उन्हें CPI(M) से बाहर कर दिया गया. इसके बाद उन्होंने निर्दलीय सांसद के रूप में कार्य किया और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. ममता बनर्जी ने उन्हें राजनीति में नया मौका दिया, लेकिन अब वही नेता उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते दिख रहे हैं.
‘असली TMC' की लड़ाई का खतरा
अगर ऋतब्रत बंदोपाध्याय का दावा सही साबित होता है, तो आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा टकराव देखने को मिल सकता है. पार्टी के अंदर टूट औपचारिक हो सकती है. ‘असली TMC' को लेकर कानूनी लड़ाई छिड़ सकती है. चुनाव चिन्ह और नाम पर भी विवाद संभव है. ठीक वैसे ही जैसे शिवसेना और NCP में हुआ था.
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